भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 861

८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्माविष्णुस्तथा रुद्रः सनकः कपिलस्तथा।<br>मायया वेष्टिताः सर्वे भ्रमन्ति भववर्त्मनि ॥ ३ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सनक तथा कपिल—ये सभी मायाके वशवर्ती होकर संसार-मार्गमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं॥ ३॥
ज्ञानिनं मां जनो वेत्ति भ्रान्तोऽहं सर्वलोकवत्।<br>शृणु मे पूर्ववृत्तान्तं प्रब्रवीमि सुनिश्चितम्॥ ४लोग मुझे ज्ञानी समझते हैं, किंतु मैं भी एक बार सभी लोगोंकी भाँति भ्रमित हो गया था। मैं अपना पूर्व वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये॥ ४॥
दुःखं मया यथा पूर्वमनुभूतं महत्तरम्।<br>स्वकृतेन च मोहेन भार्यार्थे वासवीसुत॥ ५हे व्यासजी! स्त्री-प्राप्तिके लिये अपने द्वारा स्वयं उत्पन्न किये गये मोहके कारण मुझे पूर्वकालमें महान् कष्टका अनुभव करना पड़ा था॥ ५॥
एकदा पर्वतश्चाहं देवलोकान्महीतलाम्।<br>प्राप्तौ विलोकनार्थाय भारतं खण्डमुत्तमम्॥ ६एक बार मैं तथा पर्वतमुनि उत्तम भारतवर्षको देखनेके लिये देवलोकसे पृथ्वीलोकपर आये थे॥ ६॥
भ्रमन्तौ सहितावुर्व्यां पश्यन्तौ तीर्थमण्डलम्।<br>पावनानि च स्थानानि मुनीनामाश्रमाञ्छुभान् ॥ ७विभिन्न तीर्थों, पवित्र स्थानों तथा मुनियोंके पावन आश्रमोंको देखते हुए हम दोनों साथ-साथ पृथ्वीतलपर विचरण करने लगे॥ ७॥
शपथं देवलोकात्तु कृत्वा पूर्वं परस्परम्।<br>चलितौ समयं चेमं सम्मन्त्र्य निश्चयेन वै॥ ८<br><br>चित्तवृत्तिस्तु वक्तव्या यादृशी यस्य जायते।<br>शुभा वाप्यशुभा वापि न गोप्तव्या कदाचन॥ ९देवलोकसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने आपसमें निश्चयपूर्वक सोच-विचारकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जिसके मनमें जैसा भी पवित्र अथवा अपवित्र भाव उत्पन्न होगा, वह उसे कभी गोपनीय नहीं रखेगा॥ ८-९॥
भोजनेच्छा धनेच्छापि रतीच्छा वा भवेदपि।<br>यादृशी यस्य चित्ते तु कथनीया परस्परम्॥ १०भोजनकी इच्छा, धनकी इच्छा अथवा काम-विषयक इच्छा—इनमेंसे जिस तरहकी भी इच्छा जिसके मनमें होगी, एक-दूसरेको बता दी जानी चाहिये॥ १०॥
इत्यावां समयं कृत्वा स्वर्गाद्भूलोकमागतौ।<br>एकचित्तौ मुनीभूतौ विचरन्तौ यथेच्छया॥ ११ऐसी प्रतिज्ञा करके हम दोनों स्वर्गलोकसे पृथ्वीतलपर आये और एकचित्त होकर मुनिरूपमें इच्छापूर्वक विचरण करने लगे॥ ११॥
एवं भ्रमन्तौ लोकेऽस्मिन्ग्रीष्मान्ते समुपागते।<br>सञ्जयस्य पुरं रम्यं सम्प्राप्तौ नृपतेः पुनः॥ १२इस प्रकार इस लोकमें विचरण करते हुए हम दोनों ग्रीष्म ऋतुके समाप्त हो जानेपर राजा संजयके सुरम्य नगरमें पहुँचे॥ १२॥
तेन सम्पूजितौ भक्त्या राज्ञा सम्मानितौ भृशम्।<br>स्थितौ तत्र गृहे तस्य चातुर्मास्यं महात्मनः॥ १३राजा संजयने हम दोनोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की तथा अत्यधिक सम्मान दिया। महान् आत्मावाले उन्हीं संजयके भवनमें रहकर हम दोनों अपना चातुर्मास्य व्यतीत करने लगे॥ १३॥
वार्षिकाश्चतुरो मासा दुर्गमाः पथि सर्वदा।<br>तस्मादेकत्र विबुधैः स्थातव्यमिति निश्चयः॥ १४वर्षाकालके चार महीने मार्गमें बहुत कष्टकारक होते हैं, अतएव विज्ञजनोंको उस अवधिमें एक ही स्थानपर रहना चाहिये—ऐसा सिद्धान्त है॥ १४॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 D

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