देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २६] षष्ठ स्कन्ध ८५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टौ मासांस्तु प्रवसेत्सदा कार्यवशाद् द्विजः।<br>वर्षाकाले न गन्तव्यं प्रवासे सुखमिच्छता॥ १५ | द्विजको चाहिये कि वह आठ महीनेतक अपने कार्यवश देशान्तरमें प्रवास करे, किंतु सुख चाहनेवाले पुरुषको वर्षाकालमें प्रवासके लिये नहीं जाना चाहिये॥ १५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा सञ्जयस्य गृहे तदा।<br>संस्थितौ मानितौ राज्ञा कृतातिथ्यौ महात्मना॥ १६ | ऐसा सोचकर हम दोनों राजा संजयके भवनमें ठहर गये और उन महात्मा नरेशने हमलोगोंका सम्मानपूर्वक आतिथ्य किया॥ १६॥ |
| दमयन्तीति विख्याता तस्य पुत्री महीपतेः।<br>आज्ञाप्ता परिचर्यार्थं सुदती सुन्दरी भृशम्॥ १७ | उन राजा संजयकी परम सुन्दरी तथा मनोहर दाँतोंवाली दमयन्ती नामसे विख्यात एक कन्या थी; उन्होंने उसे हमलोगोंकी सेवाके लिये आदेश दे दिया॥ १७॥ |
| विवेकज्ञा विशालाक्षी राजपुत्री कृतोद्यमा।<br>सेवनं सर्वकाले च व्यदधादुभयोरपि॥ १८ | विवेकका ज्ञान रखनेवाली तथा उद्यमी स्वभाववाली वह विशालनयना राजकुमारी सभी समय हम दोनोंकी सेवा करती रहती थी॥ १८॥ |
| स्नानार्थमुदकं काले भोजनं मृष्टमायतम्।<br>मुखवासं तथा चान्यं यदिष्टं तद्ददाति सा॥ १९ | वह हमारे स्नानके लिये जल, पर्याप्त मधुर भोजन, मुख-शुद्धिके लिये सुगन्धित गन्ध-द्रव्य तथा और भी जो हमारा अभीष्ट रहता, उसे समयसे हमलोगोंको दिया करती थी॥ १९॥ |
| मनोऽभिलषितान्कामानुभयोरपि कन्यका।<br>व्यजनासनशय्यादीन्वाञ्छितानप्यकल्पयत् ॥ २० | वह कन्या हम दोनोंकी मनोभिलषित वस्तुएँ उपस्थित किया करती थी। वह व्यजन (पंखा), आसन तथा शय्या आदि मनोवांछित सामग्रियोंको उपलब्ध कराती रहती थी॥ २०॥ |
| एवं संसेव्यमानौ तु स्थितौ राज्ञो गृहे किल।<br>वेदाध्ययनसंशीलावावां वेदव्रते रतौ॥ २१ | इस प्रकार उसके द्वारा सेवित होते हुए हम दोनों राजा संजयके भवनमें रहने लगे। वेदाध्ययनके स्वभाववाले हम दोनों मुनि सदा वेदव्रतमें संलग्न रहते थे॥ २१॥ |
| अहं वीणां करे कृत्वा साधयित्वा स्वरोत्तमम्।<br>गायत्रं साम सुस्वादमगां कर्णरसायनम्॥ २२ | मैं हाथमें वीणा धारणकर उत्तम स्वरकी साधना करके कानोंके लिये रसायनस्वरूप अत्यन्त मधुर गायत्र-सामका गान करता रहता था॥ २२॥ |
| राजपुत्री तु तच्छ्रुत्वा सामगानं मनोहरम्।<br>बभूव मयि रागाढ्या प्रीतियुक्ता विशारदा॥ २३ | मनोहर सामगान सुनकर वह विदुषी राजकुमारी मेरे प्रति अनुरागयुक्त तथा प्रीतिमय हो गयी॥ २३॥ |
| दिने दिनेऽनुरागोऽस्या मयि वृद्धिं गतः परः।<br>ममापि प्रीतियुक्तायां मनो जातं स्पृहापरम्॥ २४ | मेरे प्रति उस राजकुमारीका अनुराग दिनोदिन बढ़ता ही चला गया और मुझमें प्रेम-भाव रखनेवाली उस कन्याके प्रति मेरा भी मन अत्यन्त आसक्त हो उठा॥ २४॥ |
| मम तस्य च सा कन्या भोजनादिषु कर्हिचित्।<br>अकरोदन्तरं किञ्चित्सेवाभेदं रसान्विता॥ २५ | मुझपर विशेष अनुराग रखनेवाली वह राजकुमारी मेरे तथा उस पर्वतमुनिके लिये किये जानेवाले भोजनादिके प्रबन्धमें तथा सेवाकार्यमें कुछ भेदभाव करने लगी॥ २५॥ |