भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २७ ]षष्ठ स्कन्ध८५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
क्वासौ भिक्षुः कुरूपः क्व दमयन्ती ममात्मजा।<br>विपरीतमिदं कार्यं न विधेयं कदाचन॥ ४कहाँ भिक्षाटन करनेवाला यह कुरूप भिक्षुक और कहाँ मेरी पुत्री दमयन्ती! ऐसा विपरीत सम्बन्ध कभी नहीं करना चाहिये॥ ४॥
तामेकान्ते सुकेशान्ते निवारय हठात्सुताम्।<br>युक्त्या मुनिरतां मुग्धां शास्त्रवृद्धानुसारया॥ ५हे सुन्दर केशोंवाली! तुम मुनिपर आसक्त अपनी उस भोली पुत्रीको एकान्तमें शास्त्रों तथा वृद्ध पुरुषोंके मर्यादित वचन बतलाकर युक्तिपूर्वक इस हठसे मुक्त करो॥ ५॥
इति भर्तृवचः श्रुत्वा जननी तामथाब्रवीत्।<br>क्व ते रूपं मुनिः क्वासौ वानरास्योऽधनः पुनः॥ ६पतिकी बात सुनकर माताने उस कन्यासे कहा—कहाँ तुम्हारा ऐसा रूप और कहाँ वह धनहीन वानरमुख मुनि!॥ ६॥
कथं मोहमवाप्तासि भिक्षुके चतुरा पुनः।<br>लताकोमलदेहा त्वं भस्मरूक्षतनुस्त्वयम्॥ ७तुम लताके समान कोमल देहवाली हो और यह मुनि भस्म लगानेके कारण कठोर देहवाला है; तुम बुद्धिमान् होकर भी उस भिक्षुकपर मोहित क्यों हो गयी हो?॥ ७॥
वार्ता वानरवक्त्रेण कथं युक्ता तवानघे।<br>का प्रीतिः कुत्सिते पुंसि भविष्यति शुचिस्मिते॥ ८हे अनघे! वानरके समान मुखवाले इस मुनिके साथ तुम्हारा वार्तालाप कैसे उचित होगा? हे पवित्र मुसकानवाली! इस निन्दित पुरुषपर तुम्हारी कौन-सी प्रीति हो सकेगी?॥ ८॥
वरस्ते राजपुत्रोऽस्तु मा कुरु त्वं वृथा हठम्।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति श्रुत्वा धात्रीमुखाद्वचः॥ ९तुम्हारा वर तो कोई राजकुमार होना चाहिये, तुम व्यर्थ हठ मत करो। धात्रीके मुखसे ऐसी बात सुनकर तुम्हारे पिताजीको बहुत दुःख हुआ है॥ ९॥
लग्नां बब्बूलवृक्षेण कोमलां मालतीलताम्।<br>दृष्ट्वा कस्य मनः खेदं चतुरस्य न गच्छति॥ १०<br><br>दासेरकाय ताम्बूलीदलानि कोमलानि कः।<br>ददाति भक्षणार्थाय मूर्खोऽपि धरणीतले॥ ११बबूलके वृक्षसे लिपटी हुई कोमल मालती लताको देखकर किस बुद्धिमान् व्यक्तिका मन दुःखित नहीं होगा? इस पृथ्वीतलपर ऐसा कौन मूर्ख होगा जो खानेके लिये ऊँटको कोमल पानके पत्ते देगा?॥ १०-११॥
वीक्ष्य त्वां करसंलग्नां नारदस्य समीपतः।<br>विवाहे वर्तमाने तु कस्य चेतो न दह्यति॥ १२विवाह होते समय नारदके पास बैठकर तुम्हें उसका हाथ पकड़े हुए देखकर किसका हृदय नहीं जल उठेगा?॥ १२॥
कुमुखेन समं वार्ता न रुचिं जनयत्यतः।<br>आमृतेस्तु कथं कालः क्षपितव्यस्त्वयामुना॥ १३इस कुत्सित मुखवालेके साथ बात करनेमें कोई रुचि भी तो नहीं उत्पन्न होगी; फिर इसके साथ तुम मृत्युपर्यन्त अपना समय कैसे व्यतीत करोगी?॥ १३॥
नारद उवाच<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती भृशातुरा।<br>मातरं प्राह तन्वङ्गी मयि सा कृतनिश्चया॥ १४<br><br>किं मुखेन च रूपेण मूर्खस्य च धनेन किम्।<br>किं राज्येनाविदग्धस्य रसमार्गाविदोऽस्य च॥ १५**नारदजी बोले—**माताकी यह बात सुनकर मेरे प्रति दृढ़ निश्चयवाली उस कोमलांगी दमयन्तीने अत्यन्त व्याकुलतापूर्वक अपनी मातासे कहा—रसमार्गसे अनभिज्ञ तथा कलाज्ञानसे रहित मूर्ख राजकुमारके सुन्दर मुख, रूप, धन तथा राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन?॥ १४-१५॥