भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 867
८५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हरिण्योऽपि वने धन्या या नादेन विमोहिताः।<br>मातः प्राणान्प्रयच्छन्ति धिङ्‌मूर्खान्मानुषान्भुवि ॥ १६हे माता! वनमें रहनेवाली वे हरिणियाँ धन्य हैं जो नादसे मोहित होकर अपने प्राण भी दे देती हैं, किंतु इस भूलोकमें रहनेवाले उन मूर्ख मनुष्योंको धिक्कार है, जो मधुर स्वरसे प्रेम नहीं करते हैं! ॥ १६॥
नारदो वेत्ति यां विद्यां मातः सप्तस्वरात्मिकाम्।<br>तृतीयः कोऽपि नो वेद शिवादन्यः पुमान्किल ॥ १७हे माता! नारदजी जिस सप्तस्वरमयी विद्याको जानते हैं, उसे भगवान् शंकरको छोड़कर तीसरा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं जानता है॥ १७॥
मूर्खेण सह संवासो मरणं तत्क्षणे क्षणे।<br>रूपवान्धनवांस्त्याज्यो गुणहीनो नरः सदा ॥ १८<br><br>धिङ्मैत्रीं मूर्खभूपाले वृथा गर्वसमन्विते।<br>गुणज्ञे भिक्षुके श्रेष्ठा वचनात्सुखदायिनी ॥ १९<br><br>स्वरज्ञो ग्रामवित्कामं मूर्च्छनाज्ञानभेदभाक्।<br>दुर्लभः पुरुषश्चाष्टरसज्ञो दुर्बलोऽपि वै ॥ २०<br><br>यथा नयति कैलासं गङ्गा चैव सरस्वती।<br>तथा नयति कैलासं स्वरज्ञानविशारदः ॥ २१<br><br>स्वरमानं तु यो वेद स देवो मानुषोऽपि सन्।<br>सप्तभेदं न यो वेद स पशुः सुरराडपि ॥ २२<br><br>मूर्च्छनातानमार्गं तु श्रुत्वा मोदं न याति यः।<br>स पशुः सर्वथा ज्ञेयो हरिणाः पशवो न हि ॥ २३मूर्खके साथ रहना प्रतिक्षण मृत्युके समान होता है। अतएव सुन्दर रूपसे सम्पन्न तथा सम्पत्तिशाली होते हुए भी गुणरहित पुरुषको सर्वदाके लिये त्याग देना चाहिये। व्यर्थ गर्व करनेवाले मूर्ख राजाकी मित्रताको धिक्कार है; वचनोंसे सुख प्रदान करनेवाली गुणवान् भिक्षुककी मित्रता श्रेष्ठ है। स्वरका ज्ञाता, ग्रामोंकी पूरी जानकारी रखनेवाला, मूर्च्छनाके भेदोंको सम्यक् प्रकारसे समझनेवाला तथा आठों रसोंको जाननेवाला दुर्बल पुरुष भी इस संसारमें दुर्लभ है। जिस प्रकार गंगा तथा सरस्वती नदियाँ कैलास ले जाती हैं, उसी प्रकार स्वरज्ञानमें अत्यन्त प्रवीण पुरुष शिवलोक पहुँचा देता है। जो व्यक्ति स्वरके प्रमाणको जानता है, वह मनुष्य होता हुआ भी देवता है, किंतु जो स्वरोंके सप्तभेदका ज्ञान नहीं रखता, वह पशुके समान होता है, चाहे इन्द्र ही क्यों न हो। मूर्च्छना तथा तानमार्गको सुनकर जो आह्लादित नहीं होता, उसे साक्षात् पशु समझना चाहिये, बल्कि [स्वरप्रेमी] हरिणोंको पशु नहीं समझना चाहिये ॥ १८–२३॥
वरं विषधरः सर्पः श्रुत्वा नादं मनोहरम्।<br>अश्रोत्रोऽपि मुदं याति धिक्सकर्णांश्च मानवान् ॥ २४विषधर सर्प श्रेष्ठ है; क्योंकि वह कान न होनेपर भी मनोहर नाद सुनकर प्रफुल्लित हो जाता है, किंतु उन मनुष्योंको धिक्कार है, जो कर्णयुक्त रहनेपर भी नाद सुनकर आनन्दित नहीं होते ॥ २४॥
बालोऽपि सुस्वरं गेयं श्रुत्वा मुदितमानसः।<br>जायते किन्तु ते वृद्धा न जानन्ति धिगस्तु तान् ॥ २५मधुर स्वरसे गाये गये गीतको सुनकर बालक भी प्रसन्नचित्त हो जाता है, किंतु जो वृद्ध गानके रहस्यको नहीं जानते, उन्हें धिक्कार है ॥ २५॥
पिता मे किं न जानाति नारदस्य गुणान् बहून्।<br>द्वितीयः सामगो नास्ति त्रिषु लोकेषु तत्समः ॥ २६<br><br>तस्मादसौ मया नूनं वृतः पूर्वं समागमात्।<br>पश्चाच्छापवशाज्जातो वानरास्यो गुणाकरः ॥ २७क्या मेरे पिताजी नारदके बहुतसे गुणोंको नहीं जानते? तीनों लोकोंमें उनके समान साम-गान करनेवाला दूसरा कोई भी नहीं है। अतः नारदसे प्रेम हो जानेके कारण मैंने पहलेसे ही इनका वरण कर लिया है। गुणोंके निधान ये नारद शापवश बादमें वानरके समान मुखवाले हो गये ॥ २६-२७॥