भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २७ ]षष्ठ स्कन्ध८५९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किन्नरा न प्रियाः कस्य भवन्ति तुरगाननाः।<br>गानविद्यासमायुक्ताः किं मुखेन वरेण ह॥ २८अश्वके समान मुखवाले किन्नर गानविद्यासे सम्पन्न होनेके कारण किसको प्रिय नहीं होते, किसीके सुन्दर मुखसे क्या प्रयोजन ? ॥ २८ ॥
पितरं ब्रूहि मे मातर्वृतोऽयं मुनिसत्तमः।<br>तस्मात्त्वमाग्रहं त्यक्त्वा देहि तस्मै च मां मुदा॥ २९हे माता! आप मेरे पिताजीसे कह दें कि मैं मुनिश्रेष्ठ नारदका वरण कर चुकी हूँ; अतएव हठ छोड़कर आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे उन्हीं नारदको सौंप दें॥ २९॥
नारद उवाच<br>इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा राज्ञी राज्ञे न्यवेदयत्।<br>आग्रहं सुन्दरी ज्ञात्वा सुताया नारदे मुनौ॥ ३०<br>विवाहं कुरु राजेन्द्र दमयन्त्याः शुभे दिने।<br>मुनिना स च सर्वज्ञो वृतोऽसौ मनसानया॥ ३१नारदजी बोले—पुत्रीकी बात सुनकर तथा नारद-मुनिमें उसका अनुराग जानकर परम सुन्दरी रानीने राजासे कहा—हे राजेन्द्र! अब आप किसी शुभ दिनमें नारद-मुनिके साथ दमयन्तीका विवाह कर दीजिये; क्योंकि वह मन-ही-मन उन्हीं सर्वज्ञ मुनिका वरण कर चुकी है॥ ३०-३१॥
नारद उवाच<br>इति सञ्चोदितो राज्ञा सञ्जयः पृथिवीपतिः।<br>चकार विधिवत्सर्वं विधिं वैवाहिकं ततः॥ ३२नारदजी बोले—इस प्रकार रानी कैकेयीके प्रेरित करनेपर राजा संजयने विधि-विधानसे समस्त वैवाहिक क्रिया सम्पन्न की॥ ३२॥
एवं दारग्रहं कृत्वा वानरास्यः परन्तप।<br>स्थितस्तत्रैव मनसा दह्यमानेन चान्वहम्॥ ३३हे परन्तप! इस तरह विवाह हो जानेके पश्चात् वानरके समान मुखवाला मैं अत्यन्त दुःखी मनसे वहीं रहने लगा॥ ३३॥
यदागच्छद्राजसुता सेवार्थं मम सन्निधौ।<br>अभवं दुःखसन्तप्तस्तदाहं वानराननः॥ ३४जब राजकुमारी दमयन्ती सेवाके लिये मेरे पास आती थी तब वानरसद्दश मुखवाला मैं दुःखसे पीड़ित हो उठता था॥ ३४॥
दमयन्ती तु मां वीक्ष्य प्रफुल्लवदनाम्बुजा।<br>शोकं वानरवक्त्रत्वान्न चकार कदाचन॥ ३५किंतु खिले हुए कमलके समान मुखवाली दमयन्ती मुझे देखकर मेरी वानर मुखाकृतिके लिये कभी भी शोक नहीं करती थी॥ ३५॥
एवं गच्छति काले तु सहसा पर्वतो मुनिः।<br>कुर्वंस्तीर्थान्यनेकानि द्रष्टुं मां समुपागतः॥ ३६इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पर्वतमुनि मुझसे मिलनेके लिये अकस्मात् मेरे पास आये॥ ३६॥
मयातिमानितः प्रेम्णा पूजितश्च यथाविधि।<br>आसीन आसने दिव्ये वीक्ष्य मां दुःखितो ह्यभूत्॥ ३७मैंने प्रेमपूर्वक उनका पर्याप्त सम्मान किया तथा विधिवत् पूजा की। दिव्य आसनपर विराजमान मुनि पर्वत मुझे देखकर अत्यन्त दुःखित हो उठे॥ ३७॥
कृतदारं वानरास्यं दीनं चिन्तातुरं भृशम्।<br>दयावान्मामुवाचेदं पर्वतो मातुलं कृशम्॥ ३८वानरमुख होनेके कारण विवाह करके अत्यन्त दयनीय, दुर्बल तथा चिन्तायुक्त दशाको प्राप्त मुझ अपने मामासे पर्वतमुनिने यह वचन कहा॥ ३८॥
मया नारद कोपात्त्वं शप्तोऽसि मुनिसत्तम।<br>निष्कृतिं तस्य शापस्य करोम्यद्य निशामय॥ ३९हे मुनिश्रेष्ठ नारद! क्रोधमें आकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया था, किंतु मैं आज उस शापका निवारण करता हूँ, सुनो॥ ३९॥