देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ८६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भव त्वं चारुवदनो मम पुण्येन नारद।<br>दृष्ट्वा राजसुतां चित्ते कृपा जाता ममाधुना ॥ ४० | हे नारद! अब तुम मेरे पुण्यके प्रभावसे सुन्दर मुखवाले हो जाओ; क्योंकि इस समय राजकुमारीको देखकर मेरे मनमें करुणाभाव उत्पन्न हो गया है ॥ ४० ॥ |
| नारद उवाच<br>मयापि प्रवणं चित्तं कृत्वा श्रुत्वास्य भाषितम्।<br>अनुग्रहः कृतः सद्यस्तस्य शापस्य तत्क्षणात् ॥ ४१<br>भागिनेय तवाप्यस्तु गमनं सुरसद्मनि।<br>शापस्यानुग्रहः कामं कृतोऽयं पर्वताधुना ॥ ४२ | नारदजी बोले—उनकी बात सुनकर मैंने भी अपने मनको विनययुक्त करके उसी क्षण [अपने द्वारा उन्हें प्रदत्त] शापका मार्जन कर दिया। [मैंने कहा—] हे भागिनेय पर्वत! मैं तुम्हें मुक्त कर दे रहा हूँ। अब देवलोकमें तुम्हारा भी गमन हो; यह मैंने शापका विमोचन कर दिया ॥ ४१-४२ ॥ |
| नारद उवाच<br>जातोऽहं चारुवदनो वचनात्तस्य पश्यतः।<br>राजपुत्री तु सन्तुष्टा मातरं प्राह सत्वरम् ॥ ४३<br>मातस्ते सुमुखो जातो जामाता च महाद्युतिः।<br>वचनात्पर्वतस्याद्य मुक्तशापो मुनेर्भूत् ॥ ४४ | नारदजी बोले—पर्वतमुनिके वचनानुसार उनके देखते-देखते मैं सुन्दर मुखवाला हो गया। इससे राजकुमारी बहुत प्रसन्न हो गयी और शीघ्र ही मातासे बोली—हे माता! तुम्हारे परम तेजस्वी जामाता नारद अब सुन्दर मुखवाले हो गये हैं। मुनि पर्वतके वचनसे अब वे शापसे मुक्त हो चुके हैं ॥ ४३-४४ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञ्या कथितं तत्तु राजनि।<br>ययौ द्रष्टुं मुनिं तत्र सञ्जयः प्रीतिमांस्तदा ॥ ४५ | दमयन्तीकी बात सुनकर रानीने उसे राजासे कहा। तब प्रीतियुक्त होकर राजा संजय मुनिको देखनेके लिये वहाँ गये ॥ ४५ ॥ |
| धनं समर्पितं राज्ञा सन्तुष्टेन तदा महत्।<br>मह्यं च भागिनेयाय पारिबर्हं महात्मना ॥ ४६ | तब सन्तुष्ट हुए महात्मा राजाने मुझे तथा भागिनेय पर्वतको बहुत सारा धन एवं उपहार-सामग्री प्रदान की ॥ ४६ ॥ |
| एतत्ते सर्वमाख्यातं वर्तनं यत्पुरातनम्।<br>मायाया बलमाहात्म्यं ह्यनुभूतं यथा मया ॥ ४७ | जैसा मैंने मायाके बलकी महिमाका अनुभव किया है और जो पुरातन वृत्तान्त है, वह सब मैंने आपको बता दिया ॥ ४७ ॥ |
| संसारेऽस्मिन्महाभाग मायागुणकृतेऽनृते।<br>तनुभृत्तु सुखी नास्ति न भूतो न भविष्यति ॥ ४८ | हे महाभाग! मायाके गुणोंसे विरचित इस मिथ्या जगत्में कोई भी जीव न सुखी रहा है, न सुखी है और न तो सुखी रहेगा ॥ ४८ ॥ |
| कामक्रोधौ तथा लोभो मत्सरो ममता तथा।<br>अहङ्कारो मदः केन जिताः सर्वे महाबलाः ॥ ४९ | काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, ममता, अहंकार और मद—इन महाशक्तिशाली विषयोंको कौन जीत सका है ? ॥ ४९ ॥ |
| सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्रय इमे किल।<br>कारणं प्राणिनां देहसम्भवे सर्वथा मुने ॥ ५० | हे मुने! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही प्राणियोंकी देहोत्पत्तिमें सर्वथा कारण होते हैं ॥ ५० ॥ |
| कस्मिंश्चित्समये व्यास वनेऽहं विष्णुना सह।<br>गच्छन्हास्यविनोदेन स्त्रीभावं गमितः क्षणात् ॥ ५१ | हे व्यासजी! किसी समय भगवान् विष्णुके साथ वनमें जाता हुआ मैं परस्पर हास-परिहासमें सहसा स्त्रीभावको प्राप्त हो गया ॥ ५१ ॥ |
| राजपत्नीत्वमापन्नो मायाबलविमोहितः।<br>पुत्राः प्रसूता बहवो गेहे तस्य नृपस्य ह ॥ ५२ | मायाके प्रभावसे विमोहित होकर मैं राजाकी पत्नी बन गया और उस राजाके भवनमें रहकर मैंने अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५२ ॥ |