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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २७ ]षष्ठ स्कन्ध८५९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किन्नरा न प्रियाः कस्य भवन्ति तुरगाननाः।<br>गानविद्यासमायुक्ताः किं मुखेन वरेण ह॥ २८अश्वके समान मुखवाले किन्नर गानविद्यासे सम्पन्न होनेके कारण किसको प्रिय नहीं होते, किसीके सुन्दर मुखसे क्या प्रयोजन ? ॥ २८ ॥
पितरं ब्रूहि मे मातर्वृतोऽयं मुनिसत्तमः।<br>तस्मात्त्वमाग्रहं त्यक्त्वा देहि तस्मै च मां मुदा॥ २९हे माता! आप मेरे पिताजीसे कह दें कि मैं मुनिश्रेष्ठ नारदका वरण कर चुकी हूँ; अतएव हठ छोड़कर आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे उन्हीं नारदको सौंप दें॥ २९॥
नारद उवाच<br>इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा राज्ञी राज्ञे न्यवेदयत्।<br>आग्रहं सुन्दरी ज्ञात्वा सुताया नारदे मुनौ॥ ३०<br>विवाहं कुरु राजेन्द्र दमयन्त्याः शुभे दिने।<br>मुनिना स च सर्वज्ञो वृतोऽसौ मनसानया॥ ३१नारदजी बोले—पुत्रीकी बात सुनकर तथा नारद-मुनिमें उसका अनुराग जानकर परम सुन्दरी रानीने राजासे कहा—हे राजेन्द्र! अब आप किसी शुभ दिनमें नारद-मुनिके साथ दमयन्तीका विवाह कर दीजिये; क्योंकि वह मन-ही-मन उन्हीं सर्वज्ञ मुनिका वरण कर चुकी है॥ ३०-३१॥
नारद उवाच<br>इति सञ्चोदितो राज्ञा सञ्जयः पृथिवीपतिः।<br>चकार विधिवत्सर्वं विधिं वैवाहिकं ततः॥ ३२नारदजी बोले—इस प्रकार रानी कैकेयीके प्रेरित करनेपर राजा संजयने विधि-विधानसे समस्त वैवाहिक क्रिया सम्पन्न की॥ ३२॥
एवं दारग्रहं कृत्वा वानरास्यः परन्तप।<br>स्थितस्तत्रैव मनसा दह्यमानेन चान्वहम्॥ ३३हे परन्तप! इस तरह विवाह हो जानेके पश्चात् वानरके समान मुखवाला मैं अत्यन्त दुःखी मनसे वहीं रहने लगा॥ ३३॥
यदागच्छद्राजसुता सेवार्थं मम सन्निधौ।<br>अभवं दुःखसन्तप्तस्तदाहं वानराननः॥ ३४जब राजकुमारी दमयन्ती सेवाके लिये मेरे पास आती थी तब वानरसद्दश मुखवाला मैं दुःखसे पीड़ित हो उठता था॥ ३४॥
दमयन्ती तु मां वीक्ष्य प्रफुल्लवदनाम्बुजा।<br>शोकं वानरवक्त्रत्वान्न चकार कदाचन॥ ३५किंतु खिले हुए कमलके समान मुखवाली दमयन्ती मुझे देखकर मेरी वानर मुखाकृतिके लिये कभी भी शोक नहीं करती थी॥ ३५॥
एवं गच्छति काले तु सहसा पर्वतो मुनिः।<br>कुर्वंस्तीर्थान्यनेकानि द्रष्टुं मां समुपागतः॥ ३६इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पर्वतमुनि मुझसे मिलनेके लिये अकस्मात् मेरे पास आये॥ ३६॥
मयातिमानितः प्रेम्णा पूजितश्च यथाविधि।<br>आसीन आसने दिव्ये वीक्ष्य मां दुःखितो ह्यभूत्॥ ३७मैंने प्रेमपूर्वक उनका पर्याप्त सम्मान किया तथा विधिवत् पूजा की। दिव्य आसनपर विराजमान मुनि पर्वत मुझे देखकर अत्यन्त दुःखित हो उठे॥ ३७॥
कृतदारं वानरास्यं दीनं चिन्तातुरं भृशम्।<br>दयावान्मामुवाचेदं पर्वतो मातुलं कृशम्॥ ३८वानरमुख होनेके कारण विवाह करके अत्यन्त दयनीय, दुर्बल तथा चिन्तायुक्त दशाको प्राप्त मुझ अपने मामासे पर्वतमुनिने यह वचन कहा॥ ३८॥
मया नारद कोपात्त्वं शप्तोऽसि मुनिसत्तम।<br>निष्कृतिं तस्य शापस्य करोम्यद्य निशामय॥ ३९हे मुनिश्रेष्ठ नारद! क्रोधमें आकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया था, किंतु मैं आज उस शापका निवारण करता हूँ, सुनो॥ ३९॥
८६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भव त्वं चारुवदनो मम पुण्येन नारद।<br>दृष्ट्वा राजसुतां चित्ते कृपा जाता ममाधुना ॥ ४०हे नारद! अब तुम मेरे पुण्यके प्रभावसे सुन्दर मुखवाले हो जाओ; क्योंकि इस समय राजकुमारीको देखकर मेरे मनमें करुणाभाव उत्पन्न हो गया है ॥ ४० ॥
नारद उवाच<br>मयापि प्रवणं चित्तं कृत्वा श्रुत्वास्य भाषितम्।<br>अनुग्रहः कृतः सद्यस्तस्य शापस्य तत्क्षणात् ॥ ४१<br>भागिनेय तवाप्यस्तु गमनं सुरसद्मनि।<br>शापस्यानुग्रहः कामं कृतोऽयं पर्वताधुना ॥ ४२नारदजी बोले—उनकी बात सुनकर मैंने भी अपने मनको विनययुक्त करके उसी क्षण [अपने द्वारा उन्हें प्रदत्त] शापका मार्जन कर दिया। [मैंने कहा—] हे भागिनेय पर्वत! मैं तुम्हें मुक्त कर दे रहा हूँ। अब देवलोकमें तुम्हारा भी गमन हो; यह मैंने शापका विमोचन कर दिया ॥ ४१-४२ ॥
नारद उवाच<br>जातोऽहं चारुवदनो वचनात्तस्य पश्यतः।<br>राजपुत्री तु सन्तुष्टा मातरं प्राह सत्वरम् ॥ ४३<br>मातस्ते सुमुखो जातो जामाता च महाद्युतिः।<br>वचनात्पर्वतस्याद्य मुक्तशापो मुनेर्भूत् ॥ ४४नारदजी बोले—पर्वतमुनिके वचनानुसार उनके देखते-देखते मैं सुन्दर मुखवाला हो गया। इससे राजकुमारी बहुत प्रसन्न हो गयी और शीघ्र ही मातासे बोली—हे माता! तुम्हारे परम तेजस्वी जामाता नारद अब सुन्दर मुखवाले हो गये हैं। मुनि पर्वतके वचनसे अब वे शापसे मुक्त हो चुके हैं ॥ ४३-४४ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञ्या कथितं तत्तु राजनि।<br>ययौ द्रष्टुं मुनिं तत्र सञ्जयः प्रीतिमांस्तदा ॥ ४५दमयन्तीकी बात सुनकर रानीने उसे राजासे कहा। तब प्रीतियुक्त होकर राजा संजय मुनिको देखनेके लिये वहाँ गये ॥ ४५ ॥
धनं समर्पितं राज्ञा सन्तुष्टेन तदा महत्।<br>मह्यं च भागिनेयाय पारिबर्हं महात्मना ॥ ४६तब सन्तुष्ट हुए महात्मा राजाने मुझे तथा भागिनेय पर्वतको बहुत सारा धन एवं उपहार-सामग्री प्रदान की ॥ ४६ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं वर्तनं यत्पुरातनम्।<br>मायाया बलमाहात्म्यं ह्यनुभूतं यथा मया ॥ ४७जैसा मैंने मायाके बलकी महिमाका अनुभव किया है और जो पुरातन वृत्तान्त है, वह सब मैंने आपको बता दिया ॥ ४७ ॥
संसारेऽस्मिन्महाभाग मायागुणकृतेऽनृते।<br>तनुभृत्तु सुखी नास्ति न भूतो न भविष्यति ॥ ४८हे महाभाग! मायाके गुणोंसे विरचित इस मिथ्या जगत्में कोई भी जीव न सुखी रहा है, न सुखी है और न तो सुखी रहेगा ॥ ४८ ॥
कामक्रोधौ तथा लोभो मत्सरो ममता तथा।<br>अहङ्कारो मदः केन जिताः सर्वे महाबलाः ॥ ४९काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, ममता, अहंकार और मद—इन महाशक्तिशाली विषयोंको कौन जीत सका है ? ॥ ४९ ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्रय इमे किल।<br>कारणं प्राणिनां देहसम्भवे सर्वथा मुने ॥ ५०हे मुने! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही प्राणियोंकी देहोत्पत्तिमें सर्वथा कारण होते हैं ॥ ५० ॥
कस्मिंश्चित्समये व्यास वनेऽहं विष्णुना सह।<br>गच्छन्हास्यविनोदेन स्त्रीभावं गमितः क्षणात् ॥ ५१हे व्यासजी! किसी समय भगवान् विष्णुके साथ वनमें जाता हुआ मैं परस्पर हास-परिहासमें सहसा स्त्रीभावको प्राप्त हो गया ॥ ५१ ॥
राजपत्नीत्वमापन्नो मायाबलविमोहितः।<br>पुत्राः प्रसूता बहवो गेहे तस्य नृपस्य ह ॥ ५२मायाके प्रभावसे विमोहित होकर मैं राजाकी पत्नी बन गया और उस राजाके भवनमें रहकर मैंने अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५२ ॥

अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१

अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१

व्यास उवाच
संशयोऽयं महान्साधो श्रुत्वा ते वचनं किल।<br>कथं नारीत्वमापन्नस्त्वं मुने ज्ञानवान्भृशम्॥ ५३व्यासजी बोले— हे साधो! हे मुने! आपकी बात सुनकर मुझे यह महान् सन्देह हो रहा है कि आप महान् ज्ञानी होते हुए भी नारी-रूपमें कैसे परिणत हो गये? आप पुनः पुरुष किस प्रकार हुए? यह सब पूर्णरूपसे बताइये। आपने पुत्र कैसे उत्पन्न किये तथा किस राजाके घरमें आप भलीभाँति रहे?॥ ५३-५४॥
कथं च पुरुषो जातो ब्रूहि सर्वमशेषतः।<br>कथं पुत्रास्त्वया जाताः कस्य राज्ञो गृहेऽज्जसा॥ ५४
एतदाख्याहि चरितं मायाया महदद्भुतम्।<br>मोहितं च यया सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्॥ ५५आप उन महामायाके अत्यन्त अद्भुत चरित्रका वर्णन कीजिये, जिन्होंने स्थावर-जंगमात्मक समग्र जगत्को विमोहित कर रखा है॥ ५५॥
न तृप्तिमधिगच्छामि शृण्वंस्तव कथामृतम्।<br>सर्वग्रन्थार्थतत्त्वं च सर्वसंशयनाशनम्॥ ५६सभी ग्रन्थोंके अर्थतत्त्वोंसे युक्त तथा समस्त संशयोंका नाश करनेवाले आपके कथामृतका श्रवण करता हुआ मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ ५६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य मायादमयन्त्या सह विवाहवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥


अथाष्टाविंशोऽध्यायः

भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय-निवेदन करना

नारद उवाच
निशामय मुनिश्रेष्ठ गदतो मम सत्कथाम्।<br>मायाबलं सुदुर्जेयं मुनिभिर्योगवित्तमैः॥ १नारदजी बोले— हे मुनिवर! अब आप मेरे द्वारा कही जा रही सत्कथाका श्रवण कीजिये। श्रेष्ठ योगवेत्ता मुनियोंके लिये भी मायाका बल अत्यन्त दुर्जेय है॥ १॥
मायया मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमजया दुर्विभाव्यया॥ २उस अजेय तथा दुश्चिन्त्य मायाने ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत्को मोहित कर रखा है॥ २॥
कदाचित्सत्यलोकाद्वै श्वेतद्वीपे मनोहरे।<br>गतोऽहं दर्शनाकाङ्क्षी हरेरद्भुतकर्मणः॥ ३किसी समय मैं स्वर तथा तानसे विभूषित महती वीणा बजाता हुआ एवं सप्त स्वरोंसे युक्त गायत्र-सामका गान करता हुआ अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके दर्शनकी अभिलाषासे सत्यलोकसे मनोहर श्वेतद्वीपमें गया था॥ ३-४॥
वादयन्महतीं वीणां स्वरतानविभूषिताम्।<br>गायत्रं गायमानस्तु साम सप्तस्वरान्वितम्॥ ४
दृष्टो मया देवदेवश्चक्रपाणिर्गदाधरः।<br>कौस्तुभोद्भासितोरस्को मेघश्यामश्चतुर्भुजः॥ ५वहाँ मैंने देवाधिदेव विष्णुभगवान्‌को देखा। वे हाथमें चक्र तथा गदा धारण किये हुए थे, उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रही थी, वे मेघ-सदृश श्याम वर्णवाले थे, उनकी चार भुजाएँ थीं। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे, मुकुट तथा बाजूबन्दसे सुशोभित थे तथा वे विलासमयी लक्ष्मीके साथ प्रमुदित होकर क्रीडा कर रहे थे॥ ५-६॥
पीताम्बरपरीधानो मुकुटाङ्गदराजितः।<br>लक्ष्म्या सह विलासिन्या क्रीडमानो मुदा युतः॥ ६

८६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८

वीक्ष्य मां कमला देवी गतान्तर्धानमन्तिकात्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वभूषणभूषिता॥ ७<br><br>नारीणां प्रवरा कान्ता रूपयौवनगर्विता।<br>सुप्रिया वासुदेवस्य वरचामीकरप्रभा॥ ८सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, कान्तियुक्त, अपने रूप-यौवनपर गर्व करनेवाली, नारियोंमें सर्वश्रेष्ठ, भगवान् विष्णुको अतिप्रिय तथा स्वर्णके समान आभावाली भगवती लक्ष्मी मुझे देखकर उनके पाससे अन्तःपुरमें चली गयीं॥ ७-८॥
अन्तर्गृहं गतां दृष्ट्वा सिन्धुजां व्यञ्जनान्विताम्।<br>मया पृष्टो देवदेवो वनमाली जगत्प्रभुः॥ ९<br><br>भगवन्देवदेवेश पद्मनाभ सुरारिहन्।<br>कथं च मा गता दृष्ट्वा मामागच्छन्तमन्तिकात्॥ १०<br><br>नाहं विटो न वा धूर्तः तापसोऽहं जगद्गुरो।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितमायो जनार्दन॥ ११व्यंजित अंगोंवाली लक्ष्मीजीको भवनमें गयी देखकर मैंने वनमाला धारण करनेवाले देवाधिदेव जगन्नाथ विष्णुसे पूछा—हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे पद्मनाभ! हे असुरविनाशन! मुझे आते हुए देखकर माता लक्ष्मीजी आपके पाससे क्यों चली गयीं? हे जगद्गुरो! मैं न तो कोई नीच हूँ और न धूर्त! हे जनार्दन! मैं इन्द्रियों, क्रोध तथा मायाको जीत लेनेवाला एक तपस्वी हूँ॥ ९-११॥
नारद उवाच<br>निशम्य वचनं किञ्चिद् गर्वयुक्तं जनार्दनः।<br>उवाच मां स्मितं कृत्वा वीणावण्मधुरां गिरम्॥ १२**नारदजी बोले—**मेरा कुछ-कुछ अभिमानपूर्ण वचन सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराकर वीणाके समान मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे॥ १२॥
विष्णुरुवाच<br>नारदैवंविधा नीतिर्न स्थातव्यं कदाचन।<br>पतिं विनान्यसान्निध्ये कस्यचिद्योषया क्वचित्॥ १३**भगवान् विष्णु बोले—**हे नारद! ऐसी नीति है कि पतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी पुरुषके सांनिध्यमें स्त्रीको कभी नहीं रहना चाहिये॥ १३॥
माया सुदुर्जया विद्वन् योगिभिर्जितमारुतैः।<br>सांख्यविद्भिर्निराहारैस्तापसैश्च जितेन्द्रियैः॥ १४<br><br>देवैश्च मुनिशार्दूल यत्त्वयोक्तं वचोऽधुना।<br>जितमायोऽस्मि गीतज्ञ नैवं वाच्यं कदाचन॥ १५हे विद्वन्! वायु (श्वास)-को जीत लेनेवाले योगियों, सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओं, निराहार रहनेवाले तपस्वियों तथा जितेन्द्रिय पुरुषों एवं देवताओंके लिये भी माया अत्यन्त दुर्जय है। हे मुनिवर! अभी आपने जो कहा है कि ‘मैंने मायापर विजय प्राप्त कर ली है’ तो हे गीतज्ञ! आपको ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिये॥ १४-१५॥
नाहं शिवो न वा ब्रह्मा जेतुं तां प्रभवोऽप्यजाम्।<br>मुनयः सनकाद्याश्च कस्त्वं केऽन्ये क्षमा जये॥ १६जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा मायापर विजय नहीं प्राप्त कर सके तब आप तथा अन्य कौन हैं, जो उसे जीतनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ १६॥
देवदेहं नृदेहं वा तिर्यग्देहमथापि वा।<br>बिभृयाद्यः शरीरं च स कथं तां जयेदजाम्॥ १७देवता, मानव तथा पशु-पक्षी अथवा जो कोई शरीर धारण करनेवाला प्राणी हो, वह उस अजन्मा मायाको कैसे जीत सकता है?॥ १७॥
त्रियुतस्तां कथं मायां जेतुं शक्तः पुमान्भवेत्।<br>वेदविद्योगविद्वापि सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः॥ १८वेदका ज्ञाता, योगी, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय एवं सत्त्व-रज-तमसे युक्त कोई भी पुरुष मायाको जीतनेमें कैसे समर्थ हो सकता है?॥ १८॥
अ० २८ ]षष्ठ स्कन्ध८६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कालोऽपि तस्या रूपं हि रूपहीनः स्वरूपकृत्।<br>तद्वशे वर्तते देही विद्वान्मूर्खोऽथ मध्यमः॥ १९काल भी उसी मायाका ही रूप है। वह रूपहीन होते हुए भी स्वरूप धारण कर लेता है। विद्वान्, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणीका कोई भी व्यक्ति हो, वह उसके वशमें रहता है॥ १९॥
कालः करोति धर्मज्ञं कदाचिद्विकलं पुनः।<br>स्वभावात्कर्मतो वापि दुर्ज्ञेयं तस्य चेष्टितम्॥ २०कभी-कभी काल धर्मज्ञ पुरुषको भी उद्विग्न कर देता है। स्वभाव अथवा कर्मसे उस कालकी चेष्टा नहीं जानी जा सकती॥ २०॥
नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा विरतो विष्णुरहं विस्मयमानसः।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्॥ २१<br><br>रमापते कथंरूपा माया सा कीदृशी पुनः।<br>कियद्बला क्वसंस्थाना कस्याधारा वदस्व मे॥ २२<br><br>द्रष्टुकामोऽस्मि तां मायां दर्शयाशु महीधर।<br>ज्ञातुमिच्छामि तां सम्यक्प्रसादं कुरु मापते॥ २३**नारदजी बोले—**ऐसा कहकर विष्णुके चुप हो जानेपर मेरा मन सन्देहसे भर गया और मैंने उन जगन्नाथ सनातन वासुदेवसे पूछा—हे रमाकान्त! आप मुझे यह बतायें कि उस मायाका रूप क्या है, उसकी आकृति कैसी है, उसमें कितनी शक्ति है, वह कहाँ रहती है तथा उसका आधार क्या है? हे महीधर! मैं उस मायाको देखना चाहता हूँ, अतः मुझे उसका शीघ्र दर्शन कराइये। हे लक्ष्मीकान्त! मैं उसके विषयमें सम्यक् जानना चाहता हूँ; मुझपर कृपा कीजिये॥ २१—२३॥
विष्णुरुवाच<br>त्रिगुणा साखिलाधारा सर्वज्ञा सर्वसम्मता।<br>अजेयानेकरूपा च सर्वं व्याप्य स्थिता जगत्॥ २४**भगवान् विष्णु बोले—**अखिल जगत्‌को धारण करनेवाली वह माया त्रिगुणात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वसम्मता, अजेया, अनेकरूपा तथा सम्पूर्ण संसारको अपनेमें व्याप्त करके स्थित है॥ २४॥
दिदृक्षा यदि ते चित्ते नारदारोहणं कुरु।<br>गरुडे मत्समेतोऽद्य गच्छावोऽन्यत्र साम्प्रतम्॥ २५हे नारद! यदि तुम्हारे मनमें उस मायाको देखनेकी इच्छा है तो मेरे साथ अभी गरुडपर आरूढ़ हो जाओ; हम दोनों अन्य लोकमें इसी समय चलते हैं॥ २५॥
दर्शयिष्यामि ते मायां दुर्जयामजितात्मभिः।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मपुत्र त्वं विषादे मा मनः कृथाः॥ २६हे ब्रह्मपुत्र! वहाँ मैं तुम्हें अजितात्माओंके लिये अजेय मायाका दर्शन कराऊँगा, किंतु उसे देखकर तुम अपने मनको विषादग्रस्त मत होने देना॥ २६॥
इत्युक्त्वा देवदेवो मां सस्मार विनतासुतम्।<br>स्मृतमात्रस्तु गरुडस्तदागाद्धरिसन्निधौ॥ २७मुझसे ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने विनतापुत्र गरुडका स्मरण किया। स्मरण करते ही गरुड भगवान् विष्णुके समक्ष उपस्थित हो गये॥ २७॥
आगतं गरुडं वीक्ष्य आरुरोह जनार्दनः।<br>समारोप्य च मां पृष्ठे गमनाय कृतादरः॥ २८गरुडको आया हुआ देखकर भगवान् विष्णु मुझे अत्यन्त आदरपूर्वक पीछे बैठाकर प्रस्थान करनेके लिये उसपर आरूढ़ हो गये॥ २८॥
चलितो विनतापुत्रो वैकुण्ठाद्वायुवेगवान्।<br>प्रेरितो यत्र कृष्णेन गन्तुकामेन काननम्॥ २९जिस वन-प्रदेशमें भगवान् विष्णु जाना चाहते थे, वहाँके लिये प्रेरित किये गये वायुसदृश वेगवान् विनतापुत्र गरुडने वैकुण्ठसे प्रस्थान किया॥ २९॥
८६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २८
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महावनानि दिव्यानि सरांसि सरितस्तथा।<br>पुरग्रामाकरादींश्च खेटखर्वटगोव्रजान्॥ ३०<br>मुनीनामाश्रमान् रम्यान् वापीश्च सुमनोहराः।<br>पल्वलानि विशालानि ह्रदान् पङ्कजभूषितान्॥ ३१<br>मृगाणां च वराहाणां वृन्दान्यप्यवलोक्य च।<br>गतावावां कान्यकुब्जसमीपं गरुडासनौ॥ ३२गरुडपर आसीन हम दोनों बहुत-से विशाल वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम-नगरों, पर्वतके आस-पासकी बस्तियों, गायोंके गोष्ठों, मुनियोंके मनोहर आश्रमों, सुन्दर बावलियों, छोटे-बड़े तालाबों, कमलोंसे सुशोभित विस्तृत तथा गहरे ह्रदों एवं मृगों तथा वराहोंके बहुतसे समूहोंको देखते हुए कान्यकुब्जनगरके पास पहुँच गये॥ ३०—३२॥
तत्र रम्यं सरो दिव्यं दृष्टं पङ्कजमण्डितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्॥ ३३<br>नानावर्णैः प्रफुल्लैश्च पङ्कजैरुपराजितम्।<br>शुचि मिष्टजलं भृङ्गयूथनादविराजितम्॥ ३४वहाँ कमलोंसे मण्डित, हंस तथा सारसोंसे युक्त, चक्रवाकोंसे सुशोभित, अनेक वर्णोंवाले खिले हुए कमलोंसे शोभायमान, झुण्ड-के-झुण्ड भौरोंकी ध्वनिसे गुंजित एवं पवित्र तथा मधुर जलवाला एक दिव्य तथा रमणीय सरोवर दिखायी पड़ा॥ ३३-३४॥
मामाह भगवान् वीक्ष्य तडागं परमाद्भुतम्।<br>स्पर्धकं चोदधेः क्षीरं मिष्टं वारि विशेषतः॥ ३५क्षीरसागरके मधुर दुग्धकी समानता करनेवाले विशिष्ट जलसे युक्त उस परम अद्भुत सरोवरको देखकर भगवान् विष्णु मुझसे कहने लगे॥ ३५॥
श्रीभगवानुवाच<br>पश्य नारद गम्भीरं सरः सारसनादितम्।<br>सर्वत्र पङ्कजैश्छन्नं स्वच्छनीरप्रपूरितम्॥ ३६श्रीभगवान् बोले— हे नारद! सर्वत्र कमलोंसे आच्छादित, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा सारसकी ध्वनिसे निनादित हो रहे इस अगाध सरोवरको देखो॥ ३६॥
अत्र स्नात्वा गमिष्यावः कान्यकुब्जं पुरोत्तमम्।<br>इत्युक्त्वा गरुडादाशु मामुत्तार्य व्यतारयत्॥ ३७इसीमें स्नान करके हमलोग श्रेष्ठ नगर कान्यकुब्जमें चलेंगे—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु मुझे शीघ्र ही गरुडसे उतारकर आगे ले गये॥ ३७॥
विहस्य भगवांस्तत्र जग्राह मम तर्जनीम्।<br>स्तुवन्सरोवरं भूयस्तीरे मामनयत्प्रभुः॥ ३८उन्होंने हँसते हुए मेरी तर्जनी अँगुली पकड़ी और बार-बार उस सरोवरकी प्रशंसा करते हुए वे मुझे तीरपर ले गये॥ ३८॥
विश्रम्य तटभागे तु स्निग्धच्छाये मनोहरे।<br>मामुवाच मुने स्नानं कुरु त्वं विमले जले॥ ३९<br>पश्चादहं करिष्यामि तडागेऽस्मिन्सुपावने।<br>साधूनामिव चेतांसि जलानि निर्मलानि च॥ ४०<br>सुरभीणि परागैस्तु पङ्कजानां विशेषतः।वृक्षोंकी घनी छायावाले मनोहर तटभागपर कुछ समय विश्राम करनेके बाद भगवान् विष्णुने मुझसे कहा—हे मुने! आप इस स्वच्छ जलमें पहले स्नान कर लें, तत्पश्चात् मैं इस परम पवित्र सरोवरमें स्नान करूँगा। इस सरोवरका जल साधुजनोंके चित्तकी भाँति निर्मल तथा कमलोंके परागसे विशेषरूपसे सुगन्धित है॥ ३९-४० १/२॥
इत्युक्तोऽहं भगवता मुक्त्वा वीणां मृगाजिनम्॥ ४१भगवान्के ऐसा कहनेपर मैंने स्नान करनेका मन बना लिया और अपनी वीणा तथा मृगचर्म वहीं रखकर मैं प्रेमपूर्वक तटपर चला गया॥ ४१ १/२॥
स्नानाय कृतधीस्तीरे गतः प्रेमसमन्वितः।<br>पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च शिखां बद्ध्वा कुशग्रहम्॥ ४२<br>कृत्वाचम्य शुचिस्तोये स्नातवानस्मि तज्जले।हाथ-पैर धोकर और शिखा बाँधकर मैंने हाथमें कुश ले लिया। पुनः पवित्र जलसे आचमन करके मैं उस जलमें स्नान करने लगा। जब मैं उस मनोहर

अ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६५

अ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६५


यदा तस्मिञ्जले रम्ये स्नातोऽहं पश्यतो हरेः ॥ ४३ <br><br> विहाय पौरुषं रूपं प्राप्तः स्त्रीत्वमनुत्तमम् ।<br>हरिर्गृहीत्वा वीणां मे तथा कृष्णाजिनं शुभम् ॥ ४४<br><br>आरुह्य गरुडं तूर्णं जगाम स्वगृहं क्षणात् ।<br>ततोऽहं स्त्रीत्वमापन्नश्चारुभूषणभूषितः ॥ ४५जलमें स्नान कर रहा था, उसी समय भगवान्‌के देखते-देखते मैं अपना पुरुषरूप छोड़कर एक सुन्दर नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ ४२-४३ १/२॥<br><br>उसी क्षण मेरी वीणा तथा पवित्र मृगचर्म लेकर भगवान् विष्णु गरुडपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपने धाम चले गये। इधर मैं सुन्दर भूषणोंसे भूषित होकर स्त्रीके रूपमें हो गया॥ ४४-४५॥
तत्क्षणान्मनसो जाता पूर्वदेहस्य विस्मृतिः ।<br>विस्मृतोऽसौ जगन्नाथो महती विस्मृता पुनः ॥ ४६उसी समयसे मेरे मनमें पूर्वदेहकी विस्मृति हो गयी। मैं भगवान् विष्णु तथा अपनी महती वीणाको भी भूल गया॥ ४६॥
सम्प्राप्य मोहिनीरूपं तडागान्निर्गतो बहिः ।<br>अपश्यं नलिनीजुष्टं सरस्तद्विमलोदकम् ॥ ४७मोहिनीरूप प्राप्त करके मैं सरोवरसे बाहर निकला और स्वच्छ जलवाले तथा कमलोंसे परिपूर्ण उस सरोवरको देखने लगा॥ ४७॥
किमेतदिति मनसाकरवं विस्मयं मुहुः ।<br>एवं चिन्तयमानस्य नारीरूपधरस्य मे ॥ ४८ <br><br> सहसा दृक्पथं प्राप्तस्तत्र तालध्वजो नृपः ।<br>गजाश्वरथवृन्दैश्च संवृतो रथसंस्थितः ॥ ४९ <br><br> युवा भूषणसंवीतो देहवानिव मन्मथः ।मैं मनमें बार-बार विस्मय कर रहा था कि ‘यह क्या है!’ नारीरूपको प्राप्त मैं ऐसा सोच ही रहा था कि मुझे तालध्वज नामक राजा अचानक दिखायी पड़े। हाथीके समूहोंसे घिरे हुए वे रथपर बैठे हुए थे। युवावस्थावाले तथा आभूषणोंसे सुशोभित राजा तालध्वज शरीर धारण किये साक्षात् कामदेवके समान प्रतीत हो रहे थे॥ ४८-४९ १/२॥
वीक्ष्य मां भूपतिस्तत्र दिव्यभूषणभूषिताम् ॥ ५० <br><br> राकाचन्द्रमुखीं योषां विस्मयं परमं गतः ।<br>पप्रच्छ कासि कल्याणि कस्य पुत्री सुरस्य वा ॥ ५१ <br><br> मानुषस्य च वा कान्ते गन्धर्वस्योरगस्य च ।<br>एकाकिनी कथं बाला रूपयौवनभूषिता ॥ ५२पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली तथा दिव्य आभूषणोंसे मण्डित मुझ रमणीको देखकर राजाको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझसे पूछा—हे कल्याणि! तुम कौन हो? हे कान्ते! तुम किस देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नागकी पुत्री हो? रूप तथा यौवनसे सम्पन्न युवती होते हुए भी तुम यहाँ अकेली क्यों हो?॥ ५०-५२॥
विवाहिताथ कन्या वा सत्यं वद सुलोचने ।<br>किं पश्यसि सुकेशान्ते तडागेऽस्मिन्सुमध्यमे ॥ ५३हे सुनयने! तुम सच-सच बताओ कि तुम विवाहिता हो अथवा कुमारी! हे सुकेशान्ते! हे सुमध्यमे! तुम इस सरोवरमें क्या देख रही हो?॥ ५३॥
चिकीर्षितं पिकालापे ब्रूहि मन्मथमोहिनि ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मरालाक्षि मया सह कृशोदरि ।<br>वाञ्छितान्मनसा नूनं कृत्वा मां पतिमुत्तमम् ॥ ५४हे पिकभाषिणि! मन्मथमोहिनि! तुम अपनी अभिलाषा व्यक्त करो। हे मरालाक्षि! हे कृशोदरि! मुझ उत्तम राजाको अपना पति बनाकर मेरे साथ तुम निःसन्देह मनोवांछित सुखोंका उपभोग करो॥ ५४॥
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
नारदेन स्वस्त्रीत्वप्राप्तिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
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८६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र-पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध

नारद उवाच
इत्युक्तोऽहं तदा तेन राज्ञा तालध्वजेन च।<br>विमृश्य मनसात्यर्थं तमुवाच विशांपते॥ १<br>राजन्नाहं विजानामि पुत्री कस्येति निश्चयम्।<br>पितरौ क्व च मे केन स्थापिता च सरोवरे॥ २नारदजी बोले—हे विशाम्पते! राजा तालध्वजके यह पूछनेपर मैंने अपने मनमें सम्यक् प्रकारसे विचार करके उनसे कहा—हे राजन्! मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती कि मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं और मुझे इस सरोवरपर कौन लाया है॥ १-२॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं मे सुकृतं भवेत्।<br>निराधारास्मि राजेन्द्र चिन्तयामि चिकीर्षितम्॥ ३अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरा कल्याण कैसे हो सकेगा, मैं आश्रयहीन हूँ। हे राजेन्द्र! यही बात सोचती रहती हूँ॥ ३॥
दैवमेव परं राजन्नास्त्यत्र पौरुषं मम।<br>धर्मज्ञोऽसि महीपाल यथेच्छसि तथा कुरु॥ ४हे राजन्! दैव ही सर्वोपरि है; इसमें मेरा पौरुष व्यर्थ ही है। हे भूपाल! आप धर्मज्ञ हैं; आप जैसा चाहते हों, वैसा करें॥ ४॥
तवाधीनास्म्यहं भूप न मे कोऽप्यस्ति पालकः।<br>न पिता न च माता च न स्थानं न च बान्धवाः॥ ५हे राजन्! मैं आपके अधीन हूँ; क्योंकि मेरा यहाँ कोई भी रक्षक नहीं है। मेरे न पिता हैं, न माता हैं, न बन्धु-बान्धव हैं और न तो मेरा कोई स्थान ही है॥ ५॥
इत्युक्तोऽसौ मया राजा बभूव मदनातुरः।<br>मां निरीक्ष्य विशालाक्षीं सेवकानित्युवाच ह॥ ६मेरे ऐसा कहनेपर वे राजा तालध्वज कामासक्त हो उठे और मुझ विशाल नयनोंवालीकी ओर दृष्टि डालकर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा—॥ ६॥
नरयानमानयध्वं चतुर्वाहं मनोहरम्।<br>आरोहणार्थमस्यास्तु कौशेयाम्बरवेष्टितम्॥ ७<br>मृद्वास्तरणसंयुक्तं मुक्ताजालविभूषितम्।<br>चतुरस्रं विशालं च सुवर्णरचितं शुभम्॥ ८तुमलोग इस सुन्दर स्त्रीके आरोहणके लिये रेशमी वस्त्रसे आवेष्टित एक मनोहर पालकी ले आओ, जिसे ढोनेवाले चार पुरुष हों, उसमें कोमल आस्तरण बिछा हो तथा वह मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित हो, वह सोनेकी बनी हुई हो, चौकोर हो तथा पर्याप्त विशाल हो॥ ७-८॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भृत्याः सत्वरगामिनः।<br>आनिन्युः शिबिकां दिव्यां मदर्थे वस्त्रवेष्टिताम्॥ ९राजाकी बात सुनकर शीघ्रगामी सेवकोंने मेरे लिये वस्त्रसे ढकी हुई दिव्य पालकी लाकर उपस्थित कर दी॥ ९॥
आरूढाऽहं तदा तस्यां तस्य प्रियचिकीर्षया।<br>मुदितोऽसौ गृहे नीत्वा मां तदा पृथिवीपतिः॥ १०उन राजा तालध्वजका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे मैं उस पालकीपर आरूढ़ हो गया। मुझे अपने भवन ले जाकर राजा तालध्वज अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥
विवाहविधिना राजा शुभे लग्ने शुभे दिने।<br>उपयेमे च मां तत्र हुतभुक्सन्निधौ ततः॥ ११किसी शुभ लग्न तथा उत्तम दिनमें राजाने वैवाहिक विधि-विधानसे अग्निके साक्ष्यमें मेरे साथ विवाह कर लिया॥ ११॥
तस्याहं वल्लभा जाता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।<br>सौभाग्यसुन्दरीत्येवं नाम तत्र कृतं मम॥ १२उस समय मैं उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो गया। उन्होंने वहाँ मेरा नाम सौभाग्यसुन्दरी—ऐसा रख दिया॥ १२॥
अ० २९ ]षष्ठ स्कन्ध८६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रममाणो मया सार्धं सुखमाप महीपतिः।<br>नानाभोगविलासैश्च कामशास्त्रोदितैस्तथा ॥ १३कामशास्त्रानुकूल अनेक प्रकारके भोग-विलासोंके द्वारा मेरे साथ रमण करते हुए राजाको आनन्द मिलता था॥ १३॥
राजकार्याणि सन्त्यज्य क्रीडासक्तो दिवानिशम्।<br>नासौ विवेद गच्छन्तं कालं कामकलारतः॥ १४राज्यके कार्योंको छोड़कर वे दिन-रात मेरे साथ क्रीडारत रहते थे। कामकलामें आसक्त उन राजाको समय बीतनेका भी बोध नहीं रहता था॥ १४॥
उद्यानेषु च रम्येषु वापीषु च गृहेषु च।<br>हर्म्येषु वरशैलेषु दीर्घिकासु वरासु च॥ १५<br>वारुणीमदमत्तोऽसौ विहरन्कानने शुभे।<br>विसृज्य सर्वकार्याणि मदधीनो बभूव ह॥ १६मनोहर उद्यानों, बावलियों, सुन्दर महलों, अट्टालिकाओं, श्रेष्ठ पर्वतों, उत्तम जलाशयों तथा रमणीक काननमें विहार करते हुए मधुपानसे उन्मत्त वे राजा समस्त कार्य छोड़कर मेरे अधीन हो गये॥ १५-१६॥
व्यासाहं तेन संसक्ता क्रीडारसवशीकृता।<br>स्मृतवान्पूर्वदेहं न पुंभावं मुनिजन्म च॥ १७हे व्यासजी! उनमें मेरी भी पूर्ण आसक्ति हो गयी और मैं क्रीडारसके वशीभूत हो गया। मुझे अपने पूर्व पुरुष-शरीर तथा मुनि-जन्मका भी स्मरण नहीं रहा॥ १७॥
ममैवायं पतिर्योषाहं पत्नीषु प्रिया सती।<br>पट्टराज्ञी विलासज्ञा सफलं जीवितं मम॥ १८<br>इति चिन्तयती तस्मिन्प्रेमबद्धा दिवानिशम्।<br>क्रीडासक्ता सुखे लुब्धा तं स्थिता वशवर्तिनी॥ १९<br>विस्मृतं ब्रह्मविज्ञानं ब्रह्मज्ञानं च शाश्वतम्।<br>धर्मशास्त्रपरिज्ञानं तदासक्तमनाः स्थिता॥ २०ये ही मेरे पति हैं तथा इनकी अनेक पत्नियोंमें मैं ही इनकी प्रिय पतिव्रता भार्या हूँ, सम्पूर्ण विलासोंको जाननेवाली मैं इनकी पटरानी हूँ; इस प्रकार मेरा जीवन सफल है—ऐसा सोचती हुई मैं दिन-रात उन्हींके प्रेममें आबद्ध रहती थी तथा उनके साथ क्रीडारत रहती थी। इस तरह उनके सुखके लोभमें मैं सदा उन्हींके अधीन हो गयी। मेरा ब्रह्मविज्ञान, सनातन ब्रह्मज्ञान तथा धर्मशास्त्रका रहस्य पूर्णरूपसे विस्मृत हो गया और मैं उन्हींमें आसक्त-मन होकर रहने लगी॥ १८–२०॥
एवं विहरतस्तत्र वर्षाणि द्वादशैव तु।<br>गतानि क्षणवत्कामक्रीडासक्तस्य मे मुने॥ २१हे मुने! इस प्रकार कामक्रीडामें आसक्त मेरे वहाँ विहार करते हुए बारह वर्ष एक क्षणकी भाँति व्यतीत हो गये॥ २१॥
जाता गर्भवती चाहं मुदं प्राप नृपस्तदा।<br>कारयामास विधिवद् गर्भसंस्कारकर्म च॥ २२मेरे गर्भवती होनेपर राजाको परम प्रसन्नता हुई। राजाने विधिपूर्वक गर्भसम्बन्धी संस्कारकर्म सम्पन्न कराया॥ २२॥
अपृच्छद्दोहदं राजा प्रीणयन्मां पुनः पुनः।<br>नाब्रुवं लज्जमानाहं नृपं प्रीतमना भृशम्॥ २३गर्भके समय मेरी मनोवांछित वस्तुओंके विषयमें राजा मुझे प्रसन्न करते हुए बार-बार पूछा करते थे। तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त मैं लज्जाके कारण कुछ भी नहीं कह पाती थी॥ २३॥
सम्पूर्णे दशमे मासि पुत्रो जातस्ततो मम।<br>शुभेऽह्नि ग्रहनक्षत्रलग्नताराबलान्विते॥ २४दस माह पूर्ण होनेपर ग्रह, नक्षत्र, लग्न तथा तारा-बलयुक्त शुभ दिनमें मुझे एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २४॥
बभूव नृपतेर्गेहे पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>राजा परमसन्तुष्टो बभूव सुतजन्मतः॥ २५राजाके भवनमें पुत्र-जन्मका उत्सव मनाया गया। पुत्र-जन्मसे राजा परम प्रसन्न हो गये॥ २५॥

८६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९

८६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९

सूतकान्ते सुतं वीक्ष्य राजा मुदमवाप ह।<br>अहं भूमिपतेश्चासं प्रिया भार्या परन्तप॥ २६जननाशौच समाप्त होनेपर पुत्रका दर्शन करके राजाको असीम प्रसन्नता हुई। हे परन्तप! अब मैं राजा तालध्वजकी अत्यन्त प्रिय भार्या हो गयी॥ २६॥
ततो वर्षद्वयान्ते वै पुनर्गर्भो मया धृतः।<br>द्वितीयस्तु सुतो जातः सर्वलक्षणसंयुतः॥ २७दो वर्षके अनन्तर मैंने पुनः गर्भ धारण किया। [यथासमय] सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २७॥
सुधन्वेति सुतस्याथ नाम चक्रे नृपस्तदा।<br>वीरवर्मेति ज्येष्ठस्य ब्राह्मणैः प्रेरितस्स्वयम्॥ २८तदनन्तर ब्राह्मणोंका आदेश पाकर राजाने इस पुत्रका नाम ‘सुधन्वा’ तथा बड़े पुत्रका नाम ‘वीरवर्मा’ रखा॥ २८॥
एवं द्वादश पुत्राश्च प्रसूता भूपसम्मताः।<br>मोहितोऽहं तदा तेषां प्रीत्या पालनलालने॥ २९इस प्रकार मैंने राजाके मनोऽनुकूल बारह पुत्र उत्पन्न किये। मैं मोहके वशीभूत होकर उनके लालन-पालनमें प्रेमपूर्वक लगा रहा॥ २९॥
पुनरष्ट सुताः काले काले जाताः स्वरूपिणः।<br>गार्हस्थ्यं मे ततः पूर्णं सम्पन्नं सुखसाधनम्॥ ३०इसके बाद समय-समयपर मेरे परम रूपवान् आठ पुत्र और उत्पन्न हुए। इससे सुखका साधनभूत मेरा गार्हस्थ्य-जीवन सर्वथा पूर्ण हो गया॥ ३०॥
तेषां दारक्रियाः काले कृता राज्ञा यथोचिताः।<br>स्नुषाभिश्च तथा पुत्रैः परिवारो महानभूत्॥ ३१राजाने समयानुसार उचित रूपसे उनका विवाह कर दिया। इस प्रकार वधुओं तथा पुत्रोंसे युक्त मेरा परिवार बहुत बड़ा हो गया॥ ३१॥
ततः पौत्रादिसम्भूतास्तेऽपि क्रीडारसान्विताः।<br>आसन्नानारसोपेता मोहवृद्धिकरा भृशम्॥ ३२<br>कदाचित्सुखमैश्वर्यं कदाचिद्दुःखमद्भुतम्।<br>पुत्रेषु रोगजनितं देहसन्तापकारकम्॥ ३३फिर मेरे पौत्र उत्पन्न हुए, जो खेलकूदमें मग्न रहते थे तथा अनेक प्रकारकी बालक्रीडाओंसे मेरे मोहको बढ़ाते रहते थे। कभी सुख-समृद्धि मेरे सामने आती थी और कभी पुत्रोंके रोगग्रस्त होनेके कारण चित्तको अशान्त कर देनेवाला महान् दुःख भोगना पड़ता था॥ ३२-३३॥
परस्परं कदाचित्तु विरोधोऽभूत्सुदारुणः।<br>पुत्राणां वा वधूनां च तेन सन्तापसम्भवः॥ ३४कभी-कभी पुत्रों अथवा वधुओंमें परस्पर अत्यन्त भीषण विरोध हो जाता था, उससे मुझे सन्ताप होने लगता था॥ ३४॥
सुखदुःखात्मके घोरे मिथ्याचारकरे भृशम्।<br>सङ्कल्पजनिते क्षुद्रे मग्नोऽहं मुनिसत्तम॥ ३५हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्पसे उत्पन्न इस सुख-दुःखात्मक, तुच्छ, भयानक तथा मिथ्या व्यवहारवाले मोहमें मैं निमग्न रहता था॥ ३५॥
विस्मृतं पूर्वविज्ञानं शास्त्रज्ञानं तथा गतम्।<br>योषाभावे विलीनोऽहं गृहकार्येषु सर्वथा॥ ३६मेरा पूर्वकालिक विज्ञान विस्मृत हो गया तथा शास्त्र-ज्ञान भी समाप्त हो गया। स्त्रीभावमें होकर मैं घरके कार्योंमें ही सदा व्यस्त रहता था॥ ३६॥
अहङ्कारस्तु सञ्जातो भृशं मोहविवर्धकः।<br>एते मे बलिनः पुत्राः स्नुषाः सुकुलसम्भवाः॥ ३७मेरे ये पुत्र महान् पराक्रमी हैं तथा मेरी ये बहुएँ उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं—ऐसा सोचकर मेरे मनमें अति मोह बढ़ानेवाला अहंकार उत्पन्न हो जाया करता था॥ ३७॥
अ० २९ ]षष्ठ स्कन्ध८६१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते पुत्राः सुसन्नद्धाः क्रीडन्ति मम वेश्मसु ।<br>धन्याहं खलु नारीणां संसारेऽस्मिन्नहो भृशम् ॥ ३८ ॥मेरे ये बालक पूर्ण तत्पर होकर घरमें खेल रहे हैं। अहो, इस संसारमें सभी नारियोंमें मैं अवश्य ही धन्य हूँ ॥ ३८ ॥
नारदोऽहं भगवता वञ्चितो मायया किल ।<br>न कदाचिन्मयाप्येवं चिन्तितं मनसा किल ॥ ३९ ॥'मैं नारद हूँ तथा भगवान्ने अपनी मायाके प्रभावसे मुझे वंचित कर रखा है'—ऐसा मैं अपने मनमें कभी सोच भी नहीं पाता था ॥ ३९ ॥
राजपत्नी शुभाचारा बहुपुत्रा पतिव्रता ।<br>धन्याहं किल संसारे कृष्णैवं मोहितस्त्वहम् ॥ ४० ॥हे व्यासजी ! इस प्रकार मायासे मोहित हुआ मैं केवल यही सोचा करता था कि मैं उत्तम आचरणवाली एक पतिव्रता राजमहिषी हूँ, मेरे बहुतसे पुत्र हैं तथा इस संसारमें मैं बड़ी धन्य हूँ ॥ ४० ॥
अथ कश्चिन्नृपः कामं दूरदेशाधिपो महान् ।<br>अरातिभावमापन्नः पतिना सह मानद ॥ ४१ ॥<br>कृत्वा सैन्यसमायोगं रथैश्च वारणैर्युतम् ।<br>आजगाम कान्यकुब्जे पुरे युद्धमचिन्तयत् ॥ ४२ ॥हे मानद ! इसके बाद दूर देशमें रहनेवाले किसी महान् राजाने मेरे पतिके साथ शत्रुता ठान ली। वह हाथियों तथा रथोंसे अपनी सेना सुसज्जित करके कान्यकुब्जनगरमें आ गया और युद्धके विषयमें सोचने लगा ॥ ४१-४२ ॥
वेष्टितं नगरं तेन राज्ञा सैन्ययुतेन च ।<br>मम पुत्राश्च पौत्राश्च निर्गता नगरात्तदा ॥ ४३ ॥उस राजाने अपनी सेनाके साथ मेरा नगर घेर लिया; तब मेरे पुत्र तथा पौत्र भी नगरसे बाहर निकल पड़े ॥ ४३ ॥
संग्रामस्तुमुलस्तत्र कृतस्तैस्तेन पुत्रकैः ।<br>हता रणे सुताः सर्वे वैरिणा कालयोगतः ॥ ४४ ॥मेरे उन पुत्र-पौत्रोंने उस राजाके साथ भयंकर युद्ध किया। कालयोगसे मेरे सभी पुत्र संग्राममें शत्रुके द्वारा मार डाले गये ॥ ४४ ॥
राजा भग्नस्तु संग्रामादागतः स्वगृहं पुनः ।<br>श्रुतं मया मृताः पुत्राः संग्रामे भृशदारुणे ॥ ४५ ॥तत्पश्चात् राजा तालध्वज हताश होकर युद्धस्थलसे अपने घर आ गये। मैंने सुना कि मेरे सभी पुत्र उस अत्यन्त भीषण संग्राममें मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ४५ ॥
स हत्वा मे सुतान्पौत्रानागतो राजा बलान्वितः ।<br>क्रन्दमाना ह्यहं तत्र गता समरमण्डले ॥ ४६ ॥मेरे पुत्रों तथा पौत्रोंका संहार करके वह राजा सेनासहित चला गया। इसके बाद मैं विलाप करता हुआ युद्ध-भूमिमें जा पहुँचा ॥ ४६ ॥
दृष्ट्वा तान्पतितान्पुत्रान्पौत्रांश्च दुःखपीडिता ।<br>विललापाहमायुष्मञ्छोकसागरसंप्लवे ॥ ४७ ॥<br>हा पुत्राः क्व गता मेऽद्य हा हतास्मि दुरात्मना ।<br>दैवेनातिबलिष्ठेन दुर्वारणातिपापिना ॥ ४८ ॥हे आयुष्मन् ! वहाँ अपने पुत्रों तथा पौत्रोंको भूमिपर गिरा हुआ देखकर मैं दुःखसे अत्यन्त पीडित होकर शोक-सागरमें डूब गया तथा इस प्रकार विलाप करने लगा—हाय, मेरे पुत्र इस समय कहाँ चले गये ? हाय, मुझे तो इस दुष्टात्मा, अति बलवान्, महापापी तथा दुर्लंघ्य दैवने मार डाला ॥ ४७-४८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र भगवान्मधुसूदनः ।<br>कृत्वा रूपं द्विजस्यागाद् वृद्धः परमशोभनः ॥ ४९ ॥इसी बीच एक परम सुन्दर वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके मधुसूदन भगवान् विष्णु वहाँ पहुँच गये ॥ ४९ ॥
सुवासा वेदवित्कामं मत्समपिं समागतः ।<br>मामुवाचातिदीनां स क्रन्दमानां रणाजिरे ॥ ५० ॥हे वेदज्ञ ! सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित वे मेरे पास आये और युद्धभूमिमें अति विलाप करती हुई मुझ अबलासे बोले ॥ ५० ॥
८७०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मण उवाच<br>किं विषीदसि तन्वङ्गि भ्रमोऽयं प्रकटीकृतः।<br>मोहेन कोकिलालापे पतिपुत्रगृहात्मके॥ ५१<br>का त्वं कस्याः सुताः केऽमी चिन्तयात्मगतिं पराम्।<br>उत्तिष्ठ रोदनं त्यक्त्वा स्वस्था भव सुलोचने॥ ५२ब्राह्मण बोले— हे तन्वङ्गि ! हे पिकलापे ! तुम क्यों विषाद कर रही हो ? पति-पुत्रादिसे सम्पन्न गृहस्थीमें मोहके कारण ही यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। तुम कौन हो, ये किसके पुत्र हैं तथा ये कौन हैं ? तुम परम आत्मगतिपर विचार करो। हे सुलोचने ! अब उठो और विलाप करना छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ ५१-५२ ॥
स्नानं च तिलदानं च पुत्राणां कुरु कामिनि।<br>परलोकगतानां च मर्यादारक्षणाय वै॥ ५३<br>कर्तव्यं सर्वथा तीर्थे स्नानं तु न गृहे क्वचित्।<br>मृतानां किल बन्धूनां धर्मशास्त्रविनिर्णयः॥ ५४हे कामिनि ! मर्यादाके रक्षणार्थ अब अपने परलोक गये हुए पुत्रोंके निमित्त स्नान तथा तिलदान करो। धर्मशास्त्रका निर्णय है कि मृत बन्धुओंके निमित्त तीर्थमें ही स्नान करना चाहिये; घरमें कभी नहीं ॥ ५३-५४ ॥
नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा तेन विप्रेण वृद्धेन प्रतिबोधिता।<br>उत्थिताहं नृपेणाथ युक्ता बन्धुभिरावृता॥ ५५<br>अग्रतो द्विजरूपेण भगवान्भूतभावनः।<br>चलिताहं ततस्तूर्णं तीर्थं परमपावनम्॥ ५६नारदजी बोले— उस वृद्ध ब्राह्मणने इस प्रकार कहकर मुझे समझाया। तत्पश्चात् मैं उठा और बन्धु-बान्धवों तथा राजाको साथ लेकर द्विजद्रूपधारी भगवान् विष्णुको आगे करके तत्काल परम पवित्र तीर्थके लिये चल पड़ा ॥ ५५-५६ ॥
हरिर्मां कृपया तत्र पुंतीर्थे सरसि प्रभुः।<br>नीत्वाह भगवान्विष्णुर्द्विजरूपी जनार्दनः॥ ५७<br>स्नानं कुरु तडागेऽस्मिन्पावने गजगामिनि।<br>त्यज शोकं क्रियाकालः पुत्राणां च निरर्थकम्॥ ५८ब्राह्मणरूपधारी जनार्दन जगन्नाथ श्रीहरि भगवान् विष्णु मेरे ऊपर कृपा करके पुंतीर्थ सरोवरपर मुझको ले जाकर बोले—हे गजगामिनि ! इस पवित्र सरोवरमें स्नान करो और निरर्थक शोकका परित्याग करो। अब पुत्रोंकी [ तिलांजलि आदि] क्रियाका समय उपस्थित है ॥ ५७-५८ ॥
कोटिशस्ते मृताः पुत्रा जन्मजन्मसमुद्भवाः।<br>पितरः पतयश्चैव भ्रातरो जामयस्तथा॥ ५९<br>केषां दुःखं त्वया कार्यं भ्रमेऽस्मिन्मानसोद्भवे।<br>वितथे स्वप्नसदृशे तापदे देहिनामिह॥ ६०जन्म-जन्मान्तरमें तुम्हारे करोड़ों पुत्र, पिता, पति, भाई तथा बहन हुए तथा वे मृत्युको भी प्राप्त हो गये। उनमेंसे तुम किस-किसका दुःख मनाओगी ? यह तो मनमें उत्पन्न भ्रममात्र है, जो शरीरधारियोंको व्यर्थ ही स्वप्नके समान होकर भी दुःख पहुँचाता रहता है ॥ ५९-६० ॥
नारद उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा तीर्थे पुरुषसंज्ञके।<br>प्रविष्टा स्नातुकामाहं प्रेरिता तत्र विष्णुना॥ ६१नारदजी बोले— उनका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुकी प्रेरणाके अनुसार स्नान करनेकी इच्छासे मैं उस पुरुषसंज्ञक तीर्थ (सरोवर)-में प्रविष्ट हुआ ॥ ६१ ॥
मज्जनादेव तीर्थेषु पुमाञ्जातः क्षणादपि।<br>हरिर्वीणां करे कृत्वा स्थितस्तीरे स्वदेहवान्॥ ६२उस तीर्थमें डुबकी लगाते ही मैं तत्क्षण पुरुषरूपमें हो गया तथा भगवान् विष्णु अपने हाथमें मेरी वीणा लिये हुए अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सरोवरके तटपर विराजमान थे ॥ ६२ ॥
उन्मज्ज्य च मया तीरे दृष्टः कमललोचनः।<br>प्रत्यभिज्ञा तदा जाता मम चित्ते द्विजोत्तम॥ ६३हे द्विजश्रेष्ठ ! स्नान करनेके पश्चात् मुझे तटपर कमललोचन भगवान्‌का दर्शन प्राप्त हुआ; तब मेरे चित्तमें सभी बातोंका स्मरण हो गया ॥ ६३ ॥

अ० ३० ] षष्ठ स्कन्ध ८७१

अ० ३० ] षष्ठ स्कन्ध ८७१

| सञ्चिन्तितं मया तत्र नारदोऽहमिहागतः।<br>हरिणा सह स्त्रीभावं प्राप्तो मायाविमोहितः॥ ६४ | मैं सोचने लगा कि मैं नारद हूँ और भगवान् विष्णुके साथ यहाँ आया था; मायासे विमोहित होनेके कारण मैं स्त्रीभावको प्राप्त हो गया॥ ६४॥ | | इति चिन्तापरश्चाहं यदा जातस्तदा हरिः।<br>मामाह नारदागच्छ किं करोषि जले स्थितः॥ ६५ | जब मैं इस तरहकी बातें सोच रहा था, उसी समय भगवान् विष्णुने मुझसे कहा—हे नारद! यहाँ आओ, वहाँ जलमें खड़े होकर क्या कर रहे हो ? ॥ ६५॥ | | विस्मितोऽहं तदा स्मृत्वा स्त्रीभावं दारुणं भृशम्।<br>पुनः पुरुषभावश्च सम्पन्नः केन हेतुना॥ ६६ | अपने अत्यन्त दारुण स्त्रीभावका स्मरण करके तथा किस कारणसे मैं पुनः पुरुषभावको प्राप्त हुआ— यह सोचकर मैं आश्चर्यचकित हो गया॥ ६६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य पुनः स्वरूपप्राप्तिवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥


अथ त्रिंशोऽध्यायः

राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मणवेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना

नारद उवाचनारदजी बोले—
मां दृष्ट्वा नारदं विप्रं विस्मितोऽसौ महीपतिः।<br>क्व गता मम भार्या सा कुतोऽयं मुनिसत्तमः॥ १मुझ विप्ररूप नारदको देखकर वे राजा तालध्वज इस आश्चर्यमें पड़ गये कि मेरी वह पत्नी कहाँ चली गयी और ये मुनिश्रेष्ठ कहाँसे आ गये? ॥ १॥
विललाप नृपस्तत्र हा प्रियेति मुहुर्मुहुः।<br>क्व गता मां परित्यज्य विलपन्तं वियोगिनम्॥ २राजा तालध्वज बार-बार यह कहकर विलाप करने लगे—‘हा प्रिये! मुझ वियोगीको विलाप करता हुआ छोड़कर तुम कहाँ चली गयी?’॥ २॥
विना त्वां विपुलश्रोणि वृथा मे जीवितं गृहम्।<br>राज्यं कमलपत्राक्षि किं करोमि शुचिस्मिते॥ ३हे विपुलश्रोणि! हे कमलसदृश नेत्रवाली! हे पवित्र मुसकानवाली! तुम्हारे विना मेरा जीवन, घर तथा राज्य—ये सभी व्यर्थ हैं। अब मैं क्या करूँ? ॥ ३॥
न प्राणा मे बहिर्यान्ति विरहेण तवाधुना।<br>गतो वै प्रीतिधर्मस्तु त्वामृते प्राणधारणात्॥ ४तुम्हारे वियोगमें इस समय मेरे प्राण भी नहीं निकल रहे हैं। तुम्हारे विना प्राण धारण करनेसे प्रेम-धर्म भी सर्वथा विनष्ट हो गया॥ ४॥
विलपामि विशालाक्षि देहि प्रत्युत्तरं प्रियम्।<br>क्व गता सा मयि प्रीतिर्याभूत्प्रथमसङ्गमे॥ ५हे विशाल नयनोंवाली! मैं विलाप कर रहा हूँ; तुम मुझे प्रिय उत्तर प्रदान करो। प्रथम-मिलनमें मेरे प्रति जो प्रीति थी, वह कहाँ चली गयी?॥ ५॥
निमग्ना किं जले सुभ्रूर्भक्षिता मत्स्यकच्छपैः।<br>गृहीता वरुणेनाशु मम दौर्भाग्ययोगतः॥ ६हे सुभ्रु! क्या तुम जलमें डूब गयी? अथवा मछली या कछुए तुम्हें खा गये? या फिर मेरे दुर्भाग्यवश वरुणने तुम्हें शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया? ॥ ६॥
धन्या सुचारुसर्वाङ्गि या त्वं पुत्रैः समागता।<br>अकृत्रिमस्तु पुत्रेषु स्नेहस्तेऽमृतभाषिणि॥ ७हे सर्वाङ्गसुन्दरि! हे अमृतभाषिणि! तुम धन्य हो, जो अपने पुत्रोंके साथ चली गयी; उन पुत्रोंके प्रति तुम्हारा वास्तविक प्रेम था॥ ७॥

८७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३०

संस्कृत श्लोकहिन्दी अर्थ
न युक्तमधुना यन्मां विहाय त्रिदिवं गता।<br>विलपन्तं पतिं दीनं पुत्रस्नेहेन यन्त्रिता॥ ८यह तुम्हारे लिये उचित नहीं है जो कि दीन-दशाको प्राप्त मुझ पतिको इस प्रकार विलाप करता हुआ छोड़कर पुत्र-स्नेहरूपी पाशमें बँधी हुई तुम स्वर्ग चली गयी॥ ८॥
उभयं मे गतं कान्ते पुत्रास्त्वं प्राणवल्लभा।<br>तथापि मरणं नास्ति दुःखितस्य भृशं प्रिये॥ ९हे कान्ते! हे प्रिये! मेरे पुत्र तथा प्राणप्रिय तुम—ये दोनों ही चले गये फिर भी मुझ अत्यन्त दुःखितका मरण नहीं हो रहा है॥ ९॥
किं करोमि क्व गच्छामि रामो नास्ति महीतले।<br>रामाविरहजं दुःखं जानाति रघुनन्दनः॥ १०मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? इस समय पृथ्वीपर राम भी नहीं हैं; क्योंकि पत्नीवियोगजन्य दुःखको एकमात्र वे रघुनन्दन राम ही जानते हैं॥ १०॥
विधिना निष्ठुरेणात्र विपरीतं कृतं भुवि।<br>दम्पत्योर्मरणं भिन्नं सर्वथा समचित्तयोः॥ ११इस जगत्में निष्ठुर ब्रह्माने यह बहुत विपरीत कार्य किया है, जो कि वे समान चित्तवाले पति-पत्नीका मरण भिन्न-भिन्न समयोंमें किया करते हैं॥ ११॥
उपकारस्तु नारीणां मुनिभिर्विहितः किल।<br>यदुक्तं धर्मशास्त्रेषु ज्वलनं पतिना सह॥ १२मुनियोंने नारियोंका अवश्य ही बड़ा उपकार कर दिया है, जो उन्होंने धर्मशास्त्रोंमें पतिके साथ पत्नीके भी जल जाने (सती होने)-का उल्लेख किया है॥ १२॥
एवं विलपमानं तं राजानं भगवान्हरिः।<br>निवारयामास तदा वचनैर्युक्तियोजितैः॥ १३इस प्रकार विलाप कर रहे उन तालध्वजको भगवान् विष्णुने अनेक प्रकारके युक्तिपूर्ण वचनोंसे सान्त्वना दी॥ १३॥
श्रीभगवानुवाच<br>किं विषीदसि राजेन्द्र क्व गता ते प्रियाङ्गना।<br>न श्रुतं किं त्वया शास्त्रं न कृतोऽसौ बुधाश्रयः॥ १४श्रीभगवान् बोले—हे राजेन्द्र! क्यों रो रहे हो? तुम्हारी प्रिय भार्या कहाँ चली गयी? क्या तुमने कभी शास्त्रश्रवण नहीं किया है अथवा विद्वज्जनोंकी संगति नहीं की है?
का सा कस्त्वं क्व संयोगो वियोगः कीदृशस्तव।<br>प्रवाहरूपे संसारे नृणां नौतरतामिव॥ १५वह तुम्हारी कौन थी? तुम कौन हो? कैसा संयोग तथा कैसा वियोग? प्रवहमान इस संसारसागरमें मनुष्योंका सम्बन्ध नौकापर चढ़े हुए मनुष्योंकी भाँति है।
गृहे गच्छ नृपश्रेष्ठ वृथा ते रुदितेन किम्।<br>संयोगश्च वियोगश्च दैवाधीनः सदा नृणाम्॥ १६हे नृपश्रेष्ठ! अब तुम घर जाओ। तुम्हारे व्यर्थ रोनेसे क्या लाभ? मनुष्योंका संयोग तथा वियोग सदा दैवके अधीन रहता है।
अनया सह ते राजन् संयोगस्त्विह संवृतः।<br>भुक्ता त्वया विशालाक्षी सुन्दरी तनुमध्यमा॥ १७हे राजन्! विशाल नयनोंवाली इस कृशोदरी सुन्दर स्त्रीके साथ जो भोग करना था, उसे आपने कर लिया। अब इसके साथ आपके संयोगका समय समाप्त हो चुका है।
न दृष्टौ पितरावस्यास्त्वया प्राप्ता सरोवरे।<br>काकतालीप्रसङ्गेन यद्भूतं तत्तथा गतम्॥ १८एक सरोवरपर इसके साथ आपका संयोग हुआ था; उस समय इसके माता-पिता आपको दिखायी नहीं पड़े थे। यह अवसर काकतालीय न्यायके अनुसार जैसे आया था, वैसे ही चला गया॥ १८॥

अ० ३०] षष्ठ स्कन्ध ८७३

अ० ३०] षष्ठ स्कन्ध ८७३

मा शोकं कुरु राजेन्द्र कालो हि दुरतिक्रमः।<br>कालयोगं समासाद्य भुङ्क्ष्व भोगान् गृहे यथा॥ १९<br><br>यथागता गता सा तु तथैव वरवर्णिनी।<br>यथा पूर्वं तथा तत्र गच्छ कार्यं कुरु प्रभो॥ २०अतः हे राजेन्द्र! शोक मत कीजिये। कालका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। अपने घर जाकर समयानुसार प्राप्त भोगोंका उपभोग कीजिये। वह सुन्दरी जैसे आयी थी वैसे ही चली भी गयी। आप जैसे पहले थे, अब वैसे ही हो गये। हे राजन्! अब आप घर जाइये और अपना कार्य कीजिये॥ १९-२०॥
रुदितेन तवाद्यैव नागमिष्यति कामिनी।<br>वृथा शोचसि पृथ्धीश योगयुक्तो भवाधुना॥ २१आपके इस तरह रोनेसे वह स्त्री अब लौट तो आयेगी नहीं। आप व्यर्थ चिन्ता कर रहे हैं। हे पृथ्वीपते! अब आप योगयुक्त बनिये॥ २१॥
भोगः कालवशादेति तथैव प्रतियाति च।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यो निष्फले भववर्त्मनि॥ २२समयानुसार जिस प्रकार भोग आता है, उसी प्रकार चला भी जाता है। अतएव इस सारहीन भवमार्गके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये॥ २२॥
नैकत्र सुखसंयोगो दुःखयोगस्तु नैकतः।<br>घटिकायन्त्रवत्कामं भ्रमणं सुखदुःखयोः॥ २३न तो अकेले सुखका संयोग होता है और न तो दुःखका; घटीयन्त्रकी भाँति सुख तथा दुःखका भ्रमण होता रहता है॥ २३॥
मनः कृत्वा स्थिरं भूप कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>अथवा न्यस्य दायादे वनं सेवय साम्प्रतम्॥ २४हे राजन्! अब आप मनको स्थिर करके सुखपूर्वक राज्य कीजिये अथवा अपने उत्तराधिकारीको राज्य सौंपकर वनमें निवास कीजिये॥ २४॥
दुर्लभो मानुषो देहः प्राणिनां क्षणभङ्गुरः।<br>तस्मिन्प्राप्ते तु कर्तव्यं सर्वथैवात्मसाधनम्॥ २५क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाला यह मानवशरीर प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। इसके प्राप्त होनेपर सम्यक् प्रकारसे आत्मकल्याण कर लेना चाहिये॥ २५॥
जिह्वोपस्थरसो राजन् पशुयोनिषु वर्तते।<br>ज्ञानं मानुषदेहे वै नान्यासु च कुयोनिषु॥ २६हे राजन्! जिह्वा तथा जननेन्द्रियका आस्वाद तो पशुयोनियोंमें भी सुलभ होता है, किंतु ज्ञान केवल मानव-योनिमें ही सुलभ है, अन्य क्षुद्र योनियोंमें नहीं॥ २६॥
तस्माद् गच्छ गृहं त्यक्त्वा शोकं कान्तासमुद्भवम्।<br>मायेयं भगवत्यास्तु यया सम्मोहितं जगत्॥ २७अतएव आप पत्नीवियोगसे उत्पन्न शोकका परित्याग करके घर चले जाइये। यह सब उन्हीं भगवतीकी माया है, जिससे सम्पूर्ण जगत् मोहित है॥ २७॥
नारद उवाच<br>इत्युक्तो हरिणा राजा प्रणम्य कमलापतिम्।<br>कृत्वा स्नानविधिं सम्यग्जगाम निजमन्दिरम्॥ २८<br><br>दत्त्वा राज्यं स्वपौत्राय प्राप्य निर्वेदमद्भुतम्।<br>वनं जगाम भूपालस्तत्त्वज्ञानमवाप च॥ २९नारदजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुके कहनेपर राजा तालध्वज उन लक्ष्मीपतिको प्रणाम करके भलीभाँति स्नान-विधि सम्पन्न करके अपने घर चले गये। अद्भुत वैराग्यको प्राप्त करके उन राजाने अपने पौत्रको राज्य सौंपकर वनके लिये प्रस्थान किया और उन्होंने तत्त्वज्ञान प्राप्त किया॥ २८-२९॥
गते राजन्यहं वीक्ष्य भगवन्तमधोक्षजम्।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं हसन्तं मां पुनः पुनः॥ ३०राजा तालध्वजके चले जानेपर मुझको देखकर बार-बार हँस रहे उन जगत्पति भगवान् विष्णुसे मैंने कहा॥ ३०॥

८७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० ]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वञ्चितोऽहं त्वया देव ज्ञातं मायाबलं महत्।<br>स्मरामि चरितं सर्वं स्त्रीदेहे यत्कृतं मया॥ ३१हे देव! आपने मुझे भ्रमित कर दिया था; अब मायाकी महान् शक्तिको मैंने जान लिया। स्त्रीका शरीर प्राप्त होनेपर मैंने जो भी कार्य किया था, वह सब मैं अब याद कर रहा हूँ॥ ३१॥
ब्रूहि मे देवदेवेश प्रविष्टोऽहं सरोवरे।<br>विगतं पूर्वविज्ञानं स्नानादेव कथं हरे॥ ३२हे देवाधिदेव! हे हरे! आप मुझे यह बताइये कि जब मैं सरोवरमें प्रविष्ट हुआ तब स्नान करते ही मेरी पूर्वस्मृति क्यों नष्ट हो गयी थी?॥ ३२॥
योषिद्देहं समासाद्य मोहितोऽहं जगद्गुरो।<br>पतिं प्राप्य नृपश्रेष्ठं पुलोमी वासवं यथा॥ ३३हे जगद्गुरो! स्त्रीशरीर पानेके पश्चात् उन उत्तम नरेश तालध्वजको पतिरूपमें प्राप्त करके मैं उसी प्रकार मोहित हो गया था, जैसे इन्द्रको पाकर शची॥ ३३॥
मनस्तदेव तच्चित्तं देहः स च पुरातनः।<br>लिङ्गं तदेव देवेश स्मृतेर्नाशः कथं हरे॥ ३४हे देवेश! मेरा मन वही था, चित्त वही था, वही प्राचीन देह था तथा वही लिंगरूप लक्षण भी था; तब हे हरे! मेरी स्मृतिका नाश कैसे हो गया?॥ ३४॥
विस्मयोऽयं महान्मेऽत्र ज्ञाननाशं प्रति प्रभो।<br>कथयाद्य रमाकान्त कारणं परमं च यत्॥ ३५हे प्रभो! उस समय अपने ज्ञानके नष्ट हो जानेके विषयमें मुझे अब महान् आश्चर्य हो रहा है। हे रमाकान्त! इसका वास्तविक कारण बताइये॥ ३५॥
नारीदेहं मया प्राप्य भुक्ता भोगा ह्यनेकशः।<br>सुरापानं कृतं नित्यं विधिहीनं च भोजनम्॥ ३६<br><br>मया तदेव न ज्ञातं नारदोऽहमिति स्फुटम्।<br>जानाम्यद्य यथा सर्वं विविक्तं न तथा तदा॥ ३७स्त्रीशरीर पाकर मैंने अनेक प्रकारके भोगोंका आनन्द लिया, नित्य मद्य-पान किया तथा निषिद्ध भोजन किया। उस समय मैं स्पष्टरूपसे यह नहीं जान सका कि मैं नारद हूँ। इस समय मैं जिस प्रकार जान रहा हूँ, वैसा उस समय मैं नहीं जानता था॥ ३६-३७॥
विष्णुरुवाच<br>पश्य नारद मायावी विलासोऽयं महामते।<br>देहेषु सर्वजन्तूनां दशाभेदा ह्यनेकशः॥ ३८<br><br>जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीया देहिनां दशा।<br>तथा देहान्तरे प्राप्ते सन्देहः कीदृशः पुनः॥ ३९<br><br>सुप्तो नरो न जानाति न शृणोति वदत्यपि।<br>पुनः प्रबुद्धो जानाति सर्वं ज्ञातमशेषतः॥ ४०<br><br>निद्रया चाल्यते चित्तं भवन्ति स्वप्नसम्भवाः।<br>नानाविधा मनोभेदा मनोभावा ह्यनेकशः॥ ४१<br><br>गजो मां हन्तुमायाति न शक्तोऽस्मि पलायने।<br>किं करोमि न मे स्थानं यत्र गच्छामि सत्वरः॥ ४२विष्णु बोले—हे महामते नारद! देखो, यह सब खेल महामायाजनित है। उसीके प्रभावसे प्राणियोंके शरीरमें अनेक प्रकारकी अवस्थाएँ उपस्थित होती रहती हैं। जैसे शरीरधारियोंमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय—ये अवस्थाएँ होती हैं, उसी प्रकार दूसरे शरीरकी प्राप्ति भी होती है; इसमें सन्देह कैसा?। सोया हुआ प्राणी न जानता है, न सुनता है और न तो बोलता ही है, किंतु जाग जानेपर वही अपने सम्पूर्ण ज्ञात विषयोंको फिरसे जान लेता है। निद्रासे चित्त विचलित हो जाता है और स्वप्नसे उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकारके मनोभाव तथा मनोभेद उपस्थित होते रहते हैं। उस अवस्थामें प्राणी सोचता है कि हाथी मुझे मारने आ रहा है, किंतु मैं भागनेमें समर्थ नहीं हूँ। क्या करूँ? मेरे लिये कोई स्थान नहीं है, जहाँ मैं शीघ्र भाग चलूँ॥ ३८—४२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मायाप्राबल्यवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥

अ० ३० ]षष्ठ स्कन्ध८७५

| मृतं पितामहं स्वप्ने पश्यति स्वगृहागतम्।<br>संयोगस्तेन वार्ता च भोजनं सह मन्यते॥ ४३<br><br>प्रबुद्धः खलु जानाति स्वप्ने दृष्टं सुखासुखम्।<br>स्मृत्वा सर्वं जनेभ्यस्तु विस्तरात्प्रवदत्यपि॥ ४४<br><br>स्वप्ने कोऽपि न जानाति भ्रमोऽयमिति निश्चयः।<br>तथा तथैव विभवो मायाया दुर्गमः किल॥ ४५<br><br>नाहं नारद जानामि पारं परमदुर्घटम्।<br>गुणानां किल मायाया नैव शम्भुर्न पद्मजः॥ ४६<br><br>कोऽन्यो ज्ञातुं समर्थोऽभून्मानतो मन्दधीः पुनः।<br>मायागुणपरिज्ञानं न कस्यापि भवेदिह॥ ४७ | कभी-कभी प्राणी स्वप्नमें अपने मृत पितामहको घरपर आया हुआ देखता है। वह समझता है कि मैं उनके साथ मिल रहा हूँ, बात कर रहा हूँ, भोजन कर रहा हूँ। जागनेपर वह समझ जाता है कि सुख-दुःख-सम्बन्धी ये बातें मैंने स्वप्नमें देखी हैं। उन बातोंको याद करके वह लोगोंको विस्तारपूर्वक उनके बारेमें बताता भी है। जिस प्रकार कोई भी प्राणी स्वप्नमें यह नहीं जान पाता कि यह निश्चय ही भ्रम है, उसी प्रकार मायाका ऐश्वर्य जान पाना अत्यन्त कठिन है। हे नारद! मायाके गुणोंकी अगम्य सीमाको न तो मैं जानता हूँ और न तो शिव तथा न ब्रह्मा ही जानते हैं तो फिर मन्दबुद्धिवाला दूसरा कौन मनुष्य उसे पूर्णतः जाननेमें समर्थ हो सकता है? इस जगत्का कोई भी प्राणी मायाके गुणोंको नहीं जान सका है॥ ४३-४७॥ | | गुणत्रयकृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>विना गुणैर्न संसारो वर्तते किञ्चिदप्यदः॥ ४८<br><br>अहं सत्त्वप्रधानोऽस्मि रजस्तमसमन्वितः।<br>न कदाचित्त्रिभिर्हीनो भवामि भुवनेश्वरः॥ ४९<br><br>तथा ब्रह्मा पिता तेऽत्र रजोमुख्यः प्रकीर्तितः।<br>तमःसत्त्वसमायुक्तो न ताभ्यामुज्झितः किल॥ ५०<br><br>शिवस्तथा तमोमुख्यो रजःसत्त्वसमावृतः।<br>गुणत्रयविहीनस्तु नैव कोऽपि मया श्रुतः॥ ५१ | यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके संयोगसे विरचित है। इन गुणोंके बिना यह संसार क्षणभर भी स्थित नहीं रह सकता। मैं सत्त्वगुणप्रधान हूँ; रजोगुण और तमोगुण मुझमें गौणरूपमें विद्यमान हैं। तीनों गुणोंसे रहित होनेपर मैं अखिल भुवनका नियन्ता कभी नहीं हो सकता। उसी प्रकार आपके पिता ब्रह्मा रजोगुणप्रधान कहे जाते हैं। वे सत्त्वगुण तथा तमोगुणसे भी युक्त हैं; इन दोनों गुणोंसे रहित नहीं हैं। उसी प्रकार भगवान् शंकर भी तमोगुणप्रधान हैं तथा सत्त्वगुण और रजोगुण उनमें गौणरूपसे विद्यमान हैं। मैंने ऐसे किसी प्राणीके विषयमें नहीं सुना है, जो इन तीनों गुणोंसे रहित हो॥ ४८-५१॥ | | तस्मान्मोहो न कर्तव्यः संसारेऽस्मिन्मुनीश्वर।<br>मायाविनिर्मितेऽसारेऽपारे परमदुर्धटे॥ ५२<br><br>दृष्टा माया त्वयाद्यैव भुक्ता भोगा ह्यनेकशः।<br>किं पृच्छसि महाभाग तस्याश्चरितमद्भुतम्॥ ५३ | अतएव हे मुनीश्वर! मायाके द्वारा विरचित, सारहीन, सीमारहित तथा परम दुर्घट इस संसारमें प्राणीको मोह नहीं करना चाहिये। आपने अभी-अभी मायाका प्रभाव देखा है; आपने अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग किया। तब हे महाभाग! आप उस महामायाके अद्भुत चरित्रके विषयमें मुझसे क्यों पूछ रहे हैं?॥ ५२-५३॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मायाप्राबल्यवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥ $\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$

८७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—हे महाराज! मैंने नारदजीसे योगमायाके पवित्र अक्षरोंवाले जिस माहात्म्यको सुना है, उसे कहता हूँ; आप सुनें॥ १॥
निशामय महाराज ब्रवीमि विशदाक्षरम्।<br>माहात्म्यं खलु मायाया नारदात्तु मया श्रुतम्॥ १
मया पुनर्मुनिः पृष्टो नारदः सर्ववित्तमः।<br>श्रुत्वा कथां मुनेस्तस्य नारीदेहसमुद्भवाम्॥ २महर्षि नारदकी नारी-देहसे सम्बन्धित कथा सुनकर मैंने उन सर्वज्ञशिरोमणि मुनिसे पुनः पूछा—हे नारदजी! अब आप यह बताइये कि इसके बाद भगवान् विष्णुने आपसे क्या कहा और आपके साथ वे जगत्पति लक्ष्मीकान्त कहाँ गये?॥ २-३॥
ब्रूहि नारद पश्चात्किं कथितं हरिणा तदा।<br>क्व गतश्च जगन्नाथो भवता सह माधवः॥ ३
नारद उवाचनारदजी बोले—उस अत्यन्त मनोहर सरोवरके तटपर मुझसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने गरुडपर आरूढ़ होकर वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेका विचार किया॥ ४॥
इत्युक्त्वा भगवांस्तस्मिंस्तडागेऽतिमनोहरे।<br>आरुह्य गरुडं गन्तुं वैकुण्ठे च मनो दधे॥ ४
मामुवाच रमाकान्तो यथेष्टं गच्छ नारद।<br>एहि वा मम लोकं त्वं यथारुचि तथा कुरु॥ ५तदनन्तर रमापति विष्णुने मुझसे कहा—हे नारद! अब आप जहाँ जाना चाहें, जायें। अथवा मेरे लोक चलिये। जैसी आपकी रुचि हो वैसा कीजिये॥ ५॥
ब्रह्मलोकं गतश्चाहमापृच्छ्य मधुसूदनम्।<br>भगवानपि देवेशस्तत्क्षणाद् गरुडासनः॥ ६इसके बाद मैं मधुसूदन श्रीविष्णुसे आज्ञा लेकर ब्रह्मलोक चला गया। गरुडासीन होकर वे देवेश भगवान् विष्णु भी मुझे आदेश देकर उसी क्षण बड़े आनन्दसे शीघ्र ही वैकुण्ठ चले गये॥ ६ १/२॥
वैकुण्ठमगमत्तूर्णं मामादिश्य यथासुखम्।<br>ततोऽहं पितृसदनं गतो याते जनार्दने॥ ७तत्पश्चात् श्रीविष्णुके चले जानेपर समस्त परम अद्भुत सुखों तथा दुःखोंके सम्बन्धमें विचार करता हुआ मैं अपने पिता ब्रह्माजीके भवनपर जा पहुँचा। हे मुने! वहाँ पहुँचकर पिताजीको प्रणाम करके ज्यों ही मैं उनके सामने खड़ा हुआ, तभी उन्होंने मुझे चिन्तासे व्यग्र देखकर पूछा॥ ७-८ १/२॥
चिन्तयन्सकलं दुःखं सुखं च परमाद्भुतम्।<br>गत्वा प्रणम्य पितरं स्थितो यावत्पुरः पितुः॥ ८
तावत्पृष्टो मुने पित्रा वीक्ष्य चिन्तातुरं तु माम्।
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! आप कहाँ गये थे? हे सुत! आप क्यों इतने घबराये हुए हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! आपका चित्त इस समय स्वस्थ नहीं दिखायी पड़ रहा है। क्या किसीने आपको धोखेमें डाल दिया है अथवा आपने कोई आश्चर्यजनक दृश्य देखा है? हे पुत्र! आज मैं आपको उदास तथा विवेकसे कुण्ठित क्यों देख रहा हूँ?॥ ९-१० १/२॥
क्व गतोऽसि महाभाग कस्माच्चिन्ततुरः सुत॥ ९
स्वस्थं नैवाद्य पश्यामि मनस्ते मुनिसत्तम।<br>केनापि वञ्चितोऽसि त्वं दृष्टं वा किञ्चिदद्भुतम्॥ १०
विषण्णं गतविज्ञानं पश्यामि त्वां कथं सुत।
नारद उवाचनारदजी बोले—पिता ब्रह्माजीके ऐसा पूछनेपर मैंने आसनपर बैठकर मायाके प्रभावसे उत्पन्न अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा—हे पिताजी! महान् शक्तिशाली विष्णुने मुझे ठग लिया था। बहुत वर्षोंतक
इति पृष्टस्तदा पित्रा बृस्यां समुपवेश्य च॥ ११
तमब्रुवं स्ववृत्तान्तं मायाबलसमुद्भवम्।<br>वञ्चितोऽहं पितः कामं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १२

| अ० ३१ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्त्रीभावं गमितः कामं वर्षाणि सुबहून्यपि।<br>अनुभूतं महद्दुःखं पुत्रशोकसमुद्भवम्॥ १३मैं स्त्रीशरीर धारण किये रहा और मैंने पुत्रशोकजनित भीषण दुःखका अनुभव किया॥ ११—१३॥
प्रबोधितोऽहं तेनैव मृदुवाक्यामृतेन च।<br>पुनः सरोवरे स्नात्वा जातोऽहं नारदः पुमान्॥ १४तत्पश्चात् उन्होंने ही अपने अमृतमय मधुर वचनसे मुझे समझाया और पुनः सरोवरमें स्नान करके मैं पुरुषरूप नारद हो गया॥ १४॥
किमेतत्कारणं ब्रह्मन् यन्मोहमगमं तदा।<br>विस्मृतं पूर्वविज्ञानं तन्मयस्तरसो कृतः॥ १५<br><br>एतन्मायाबलं ब्रह्मन्न जानेऽहं दुरत्ययम्।<br>ज्ञानहानिकरं जातं मूलं मोहस्य विस्फुटम्॥ १६हे ब्रह्मन्! उस समय मुझे जो मोह हो गया था, उसका क्या कारण है? उस समय मेरा पूर्वज्ञान विस्मृत हो गया था और मैं शीघ्र ही उन [राजा तालध्वज]-में पूर्णरूपसे अनुरक्त हो गया। हे ब्रह्मन्! मैं मायाके इस बलको दुर्लङ्घ्य, ज्ञानकी हानि करनेवाला तथा मोहकी विस्तृत जड़ मानता हूँ॥ १६॥
अनुभूतं मया सम्यग्ज्ञातं सर्वं शुभाशुभम्।<br>कथं त्वं जितवांस्तात तमुपायं वदस्व मे॥ १७मैंने सम्पूर्ण शुभ तथा अशुभ परिस्थितियोंका अनुभव किया तथा सम्यक् प्रकारसे उनके विषयमें जाना। हे तात! आपने उस मायाको कैसे जीता है? वह उपाय मुझे भी बताइये॥ १७॥
नारद उवाच<br>विज्ञाप्तोऽसौ मया धाता प्रीतिपूर्वमतः परम्।<br>मामुवाच स्मितं कृत्वा पिता मे वासवीसुत॥ १८नारदजी बोले— हे व्यासजी! पिता ब्रह्माजीसे मेरे इस प्रकार बतानेपर वे मुसकराकर मुझसे प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ १८॥
ब्रह्मोवाच<br>दुर्जयेषा सुरैः सर्वैर्मुनिभिश्च महात्मभिः।<br>तापसैर्ज्ञानयुक्तैश्च योगिभिः पवनाशनैः॥ १९ब्रह्माजी बोले— सभी देवता, मुनि, महात्मा, तपस्वी, ज्ञानी तथा वायुसेवन करनेवाले योगियोंके लिये भी यह माया कठिनतासे जीती जानेवाली है॥ १९॥
नाहं तां सर्वथा ज्ञातुं शक्तो मायां महाबलाम्।<br>विष्णुर्ज्ञातुं न शक्तश्च तथा शम्भुरुमापतिः॥ २०उस महाशक्तिशालिनी मायाको सम्यक् प्रकारसे जाननेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। उसी प्रकार विष्णु तथा उमापति शंकर भी उसे जाननेमें समर्थ नहीं हैं॥ २०॥
दुर्ज्ञेया सा महामाया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी।<br>कालकर्मस्वभावाद्यैर्निमित्तकारणैर्वृता ॥ २१सृजन, पालन तथा संहार करनेवाली वह महामाया सभीके लिये दुर्ज्ञेय है। काल, कर्म तथा स्वभाव आदि निमित्त कारणोंसे वह सदा समन्वित है॥ २१॥
शोकं मा कुरु मेधाविंस्तत्र मायामहाबले।<br>न चैव विस्मयः कार्यो वयं सर्वे विमोहिताः॥ २२हे मेधाविन्! अपरिमित बलसे सम्पन्न इस मायाके विषयमें आप शोक न करें। इसके विषयमें किसी प्रकारका विस्मय नहीं करना चाहिये। हमलोग भी मायासे विमोहित हैं॥ २२॥
नारद उवाच<br>पित्रत्युक्तस्तदा व्यास तमापृच्छ्य गतस्मयः।<br>आगतोऽस्म्यत्र पश्यन्वै तीर्थानि च वराणि च॥ २३नारदजी बोले— हे व्यासजी! पिताजीके ऐसा कहनेपर मेरा विस्मय दूर हो गया। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर उत्तम तीर्थोंका दर्शन करता हुआ मैं यहाँ आ पहुँचा हूँ॥ २३॥
तस्मात्त्वमपि सन्त्यज्य मोहं कौरवनाशजम्।<br>कालक्षयं सुखासीनः स्थानेऽस्मिन् कुरु सत्तम॥ २४अतएव हे श्रेष्ठ व्यासजी! कौरवोंके नाशसे उत्पन्न मोहका परित्याग करके आप भी इस स्थानपर सुखपूर्वक रहते हुए समय व्यतीत कीजिये॥ २४॥
८७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

| अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>निश्चयं हृदये कृत्वा विचरस्व यथासुखम्॥ २५ | किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है—ऐसा मनमें निश्चय करके आनन्दपूर्वक विचरण कीजिये॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा नारदो राजन् गतो मां प्रतिबोध्य च।<br>अहं तच्चिन्तयन्वाक्यं यदुक्तं मुनिना तदा॥ २६<br><br>स्थितः सरस्वतीतीरे कल्पे सारस्वते वरे।<br>कालातिवाहनायैतत्कृतं भागवतं मया॥ २७<br><br>पुराणमुत्तमं भूप सर्वसंशयनाशनम्।<br>नानाख्यानसमायुक्तं वेदप्रामाण्यसंश्रितम्॥ २८ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! ऐसा कहकर मुझे समझानेके पश्चात् नारदजी वहाँसे चले गये। मुनि नारदने मुझसे जो वाक्य कहा था उसपर विचार करता हुआ मैं उस श्रेष्ठ सारस्वतकल्पमें सरस्वतीके तटपर ठहर गया। हे राजन्! समय व्यतीत करनेके उद्देश्यसे वहींपर मैंने सम्पूर्ण सन्देहोंको दूर करनेवाले, नानाविध आख्यानोंसे युक्त, वैदिक प्रमाणोंसे ओतप्रोत तथा पुराणोंमें उत्तम इस श्रीमद्देवीभागवतकी रचना की थी॥ २६–२८॥ | | सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः सर्वथा नृपसत्तम।<br>यथेन्द्रजालिकः कश्चित्पाञ्चालीं दारवीं करे॥ २९<br><br>कृत्वा नर्तयते कामं स्वेच्छया वशवर्तिनीम्।<br>तथा नर्तयते माया जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३० | हे राजेन्द्र! इसमें किसी तरहका संशय नहीं करना चाहिये। जिस प्रकार कोई इन्द्रजाल करनेवाला अपने हाथमें काठकी पुतली लेकर उसे अपने अधीन करके अपने इच्छानुसार नचाता है, उसी प्रकार यह माया चराचर जगत्को नचाती रहती है॥ २९-३०॥ | | ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं सदेवासुरमानुषम्।<br>पञ्चेन्द्रियसमायुक्तं मनश्चित्तानुवर्तनम्॥ ३१ | ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी पाँच इन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले देवता, मानव तथा दानव हैं; वे सभी मन तथा चित्तका अनुसरण करते हैं॥ ३१॥ | | गुणास्तु कारणं राजन् सर्वेषां सर्वथा त्रयः।<br>कार्यं कारणसंयुक्तं भवतीति विनिश्चयः॥ ३२ | हे राजन्! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही सभी कार्योंके सर्वथा कारण होते हैं। यह निश्चित है कि कोई भी कार्य किसी-न-किसी कारणसे अवश्य सम्बद्ध रहता है॥ ३२॥ | | भिन्नभिन्नस्वभावास्ते गुणा मायासमुद्भवाः।<br>शान्तो घोरस्तथा मूढस्त्रयस्तु विविधा यतः॥ ३३ | मायासे उत्पन्न हुए ये तीनों गुण भिन्न-भिन्न स्वभाववाले होते हैं; क्योंकि ये तीनों गुण (क्रमशः) शान्त, घोर तथा मूढ-भेदानुसार तीन प्रकारके होते हैं॥ ३३॥ | | तत्समेतः पुमान्नित्यं तद्विहीनः कथं भवेत्।<br>न भवत्येव संसारे रहितस्तन्तुभिः पटः॥ ३४<br><br>तथा गुणैस्त्रिभिर्हीनो न देहीति विनिश्चयः।<br>देवदेहो मनुष्यो वा तिरश्चो वा नराधिप॥ ३५<br><br>गुणैर्विरहितो न स्यान्मृद्धीनो घटो यथा।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयश्चामी गुणाश्रयाः॥ ३६<br><br>कदाचित्प्रीतियुक्तास्ते तथाप्रीतियुताः पुनः।<br>तथा विषादयुक्तास्ते भवन्ति गुणयोगतः॥ ३७ | इन तीनों गुणोंसे सदा युक्त रहनेवाला प्राणी इन गुणोंसे विहीन कैसे रह सकता है? जिस प्रकार संसारमें तन्तुविहीन वस्त्रकी सत्ता नहीं हो सकती, उसी प्रकार तीनों गुणोंसे रहित प्राणीकी सत्ता नहीं हो सकती, यह पूर्णरूपेण निश्चित है। हे नरेश! जिस प्रकार मिट्टीके बिना घटका होना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार देवता, मानव अथवा पशु-पक्षी भी गुणोंके बिना नहीं रह सकते। यहाँतक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों भी इन गुणोंके आश्रित रहते हैं। गुणोंका संयोग होनेसे ही वे कभी प्रसन्न रहते हैं, कभी अप्रसन्न रहते हैं तथा कभी विषादग्रस्त हो जाते हैं॥ ३४–३७॥ |