देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 878, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 878
| अ० २९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एते पुत्राः सुसन्नद्धाः क्रीडन्ति मम वेश्मसु ।<br>धन्याहं खलु नारीणां संसारेऽस्मिन्नहो भृशम् ॥ ३८ ॥ | मेरे ये बालक पूर्ण तत्पर होकर घरमें खेल रहे हैं। अहो, इस संसारमें सभी नारियोंमें मैं अवश्य ही धन्य हूँ ॥ ३८ ॥ |
| नारदोऽहं भगवता वञ्चितो मायया किल ।<br>न कदाचिन्मयाप्येवं चिन्तितं मनसा किल ॥ ३९ ॥ | 'मैं नारद हूँ तथा भगवान्ने अपनी मायाके प्रभावसे मुझे वंचित कर रखा है'—ऐसा मैं अपने मनमें कभी सोच भी नहीं पाता था ॥ ३९ ॥ |
| राजपत्नी शुभाचारा बहुपुत्रा पतिव्रता ।<br>धन्याहं किल संसारे कृष्णैवं मोहितस्त्वहम् ॥ ४० ॥ | हे व्यासजी ! इस प्रकार मायासे मोहित हुआ मैं केवल यही सोचा करता था कि मैं उत्तम आचरणवाली एक पतिव्रता राजमहिषी हूँ, मेरे बहुतसे पुत्र हैं तथा इस संसारमें मैं बड़ी धन्य हूँ ॥ ४० ॥ |
| अथ कश्चिन्नृपः कामं दूरदेशाधिपो महान् ।<br>अरातिभावमापन्नः पतिना सह मानद ॥ ४१ ॥<br>कृत्वा सैन्यसमायोगं रथैश्च वारणैर्युतम् ।<br>आजगाम कान्यकुब्जे पुरे युद्धमचिन्तयत् ॥ ४२ ॥ | हे मानद ! इसके बाद दूर देशमें रहनेवाले किसी महान् राजाने मेरे पतिके साथ शत्रुता ठान ली। वह हाथियों तथा रथोंसे अपनी सेना सुसज्जित करके कान्यकुब्जनगरमें आ गया और युद्धके विषयमें सोचने लगा ॥ ४१-४२ ॥ |
| वेष्टितं नगरं तेन राज्ञा सैन्ययुतेन च ।<br>मम पुत्राश्च पौत्राश्च निर्गता नगरात्तदा ॥ ४३ ॥ | उस राजाने अपनी सेनाके साथ मेरा नगर घेर लिया; तब मेरे पुत्र तथा पौत्र भी नगरसे बाहर निकल पड़े ॥ ४३ ॥ |
| संग्रामस्तुमुलस्तत्र कृतस्तैस्तेन पुत्रकैः ।<br>हता रणे सुताः सर्वे वैरिणा कालयोगतः ॥ ४४ ॥ | मेरे उन पुत्र-पौत्रोंने उस राजाके साथ भयंकर युद्ध किया। कालयोगसे मेरे सभी पुत्र संग्राममें शत्रुके द्वारा मार डाले गये ॥ ४४ ॥ |
| राजा भग्नस्तु संग्रामादागतः स्वगृहं पुनः ।<br>श्रुतं मया मृताः पुत्राः संग्रामे भृशदारुणे ॥ ४५ ॥ | तत्पश्चात् राजा तालध्वज हताश होकर युद्धस्थलसे अपने घर आ गये। मैंने सुना कि मेरे सभी पुत्र उस अत्यन्त भीषण संग्राममें मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ४५ ॥ |
| स हत्वा मे सुतान्पौत्रानागतो राजा बलान्वितः ।<br>क्रन्दमाना ह्यहं तत्र गता समरमण्डले ॥ ४६ ॥ | मेरे पुत्रों तथा पौत्रोंका संहार करके वह राजा सेनासहित चला गया। इसके बाद मैं विलाप करता हुआ युद्ध-भूमिमें जा पहुँचा ॥ ४६ ॥ |
| दृष्ट्वा तान्पतितान्पुत्रान्पौत्रांश्च दुःखपीडिता ।<br>विललापाहमायुष्मञ्छोकसागरसंप्लवे ॥ ४७ ॥<br>हा पुत्राः क्व गता मेऽद्य हा हतास्मि दुरात्मना ।<br>दैवेनातिबलिष्ठेन दुर्वारणातिपापिना ॥ ४८ ॥ | हे आयुष्मन् ! वहाँ अपने पुत्रों तथा पौत्रोंको भूमिपर गिरा हुआ देखकर मैं दुःखसे अत्यन्त पीडित होकर शोक-सागरमें डूब गया तथा इस प्रकार विलाप करने लगा—हाय, मेरे पुत्र इस समय कहाँ चले गये ? हाय, मुझे तो इस दुष्टात्मा, अति बलवान्, महापापी तथा दुर्लंघ्य दैवने मार डाला ॥ ४७-४८ ॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे तत्र भगवान्मधुसूदनः ।<br>कृत्वा रूपं द्विजस्यागाद् वृद्धः परमशोभनः ॥ ४९ ॥ | इसी बीच एक परम सुन्दर वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके मधुसूदन भगवान् विष्णु वहाँ पहुँच गये ॥ ४९ ॥ |
| सुवासा वेदवित्कामं मत्समपिं समागतः ।<br>मामुवाचातिदीनां स क्रन्दमानां रणाजिरे ॥ ५० ॥ | हे वेदज्ञ ! सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित वे मेरे पास आये और युद्धभूमिमें अति विलाप करती हुई मुझ अबलासे बोले ॥ ५० ॥ |