देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ८७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्राह्मण उवाच<br>किं विषीदसि तन्वङ्गि भ्रमोऽयं प्रकटीकृतः।<br>मोहेन कोकिलालापे पतिपुत्रगृहात्मके॥ ५१<br>का त्वं कस्याः सुताः केऽमी चिन्तयात्मगतिं पराम्।<br>उत्तिष्ठ रोदनं त्यक्त्वा स्वस्था भव सुलोचने॥ ५२ | ब्राह्मण बोले— हे तन्वङ्गि ! हे पिकलापे ! तुम क्यों विषाद कर रही हो ? पति-पुत्रादिसे सम्पन्न गृहस्थीमें मोहके कारण ही यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। तुम कौन हो, ये किसके पुत्र हैं तथा ये कौन हैं ? तुम परम आत्मगतिपर विचार करो। हे सुलोचने ! अब उठो और विलाप करना छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ ५१-५२ ॥ |
| स्नानं च तिलदानं च पुत्राणां कुरु कामिनि।<br>परलोकगतानां च मर्यादारक्षणाय वै॥ ५३<br>कर्तव्यं सर्वथा तीर्थे स्नानं तु न गृहे क्वचित्।<br>मृतानां किल बन्धूनां धर्मशास्त्रविनिर्णयः॥ ५४ | हे कामिनि ! मर्यादाके रक्षणार्थ अब अपने परलोक गये हुए पुत्रोंके निमित्त स्नान तथा तिलदान करो। धर्मशास्त्रका निर्णय है कि मृत बन्धुओंके निमित्त तीर्थमें ही स्नान करना चाहिये; घरमें कभी नहीं ॥ ५३-५४ ॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा तेन विप्रेण वृद्धेन प्रतिबोधिता।<br>उत्थिताहं नृपेणाथ युक्ता बन्धुभिरावृता॥ ५५<br>अग्रतो द्विजरूपेण भगवान्भूतभावनः।<br>चलिताहं ततस्तूर्णं तीर्थं परमपावनम्॥ ५६ | नारदजी बोले— उस वृद्ध ब्राह्मणने इस प्रकार कहकर मुझे समझाया। तत्पश्चात् मैं उठा और बन्धु-बान्धवों तथा राजाको साथ लेकर द्विजद्रूपधारी भगवान् विष्णुको आगे करके तत्काल परम पवित्र तीर्थके लिये चल पड़ा ॥ ५५-५६ ॥ |
| हरिर्मां कृपया तत्र पुंतीर्थे सरसि प्रभुः।<br>नीत्वाह भगवान्विष्णुर्द्विजरूपी जनार्दनः॥ ५७<br>स्नानं कुरु तडागेऽस्मिन्पावने गजगामिनि।<br>त्यज शोकं क्रियाकालः पुत्राणां च निरर्थकम्॥ ५८ | ब्राह्मणरूपधारी जनार्दन जगन्नाथ श्रीहरि भगवान् विष्णु मेरे ऊपर कृपा करके पुंतीर्थ सरोवरपर मुझको ले जाकर बोले—हे गजगामिनि ! इस पवित्र सरोवरमें स्नान करो और निरर्थक शोकका परित्याग करो। अब पुत्रोंकी [ तिलांजलि आदि] क्रियाका समय उपस्थित है ॥ ५७-५८ ॥ |
| कोटिशस्ते मृताः पुत्रा जन्मजन्मसमुद्भवाः।<br>पितरः पतयश्चैव भ्रातरो जामयस्तथा॥ ५९<br>केषां दुःखं त्वया कार्यं भ्रमेऽस्मिन्मानसोद्भवे।<br>वितथे स्वप्नसदृशे तापदे देहिनामिह॥ ६० | जन्म-जन्मान्तरमें तुम्हारे करोड़ों पुत्र, पिता, पति, भाई तथा बहन हुए तथा वे मृत्युको भी प्राप्त हो गये। उनमेंसे तुम किस-किसका दुःख मनाओगी ? यह तो मनमें उत्पन्न भ्रममात्र है, जो शरीरधारियोंको व्यर्थ ही स्वप्नके समान होकर भी दुःख पहुँचाता रहता है ॥ ५९-६० ॥ |
| नारद उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा तीर्थे पुरुषसंज्ञके।<br>प्रविष्टा स्नातुकामाहं प्रेरिता तत्र विष्णुना॥ ६१ | नारदजी बोले— उनका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुकी प्रेरणाके अनुसार स्नान करनेकी इच्छासे मैं उस पुरुषसंज्ञक तीर्थ (सरोवर)-में प्रविष्ट हुआ ॥ ६१ ॥ |
| मज्जनादेव तीर्थेषु पुमाञ्जातः क्षणादपि।<br>हरिर्वीणां करे कृत्वा स्थितस्तीरे स्वदेहवान्॥ ६२ | उस तीर्थमें डुबकी लगाते ही मैं तत्क्षण पुरुषरूपमें हो गया तथा भगवान् विष्णु अपने हाथमें मेरी वीणा लिये हुए अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सरोवरके तटपर विराजमान थे ॥ ६२ ॥ |
| उन्मज्ज्य च मया तीरे दृष्टः कमललोचनः।<br>प्रत्यभिज्ञा तदा जाता मम चित्ते द्विजोत्तम॥ ६३ | हे द्विजश्रेष्ठ ! स्नान करनेके पश्चात् मुझे तटपर कमललोचन भगवान्का दर्शन प्राप्त हुआ; तब मेरे चित्तमें सभी बातोंका स्मरण हो गया ॥ ६३ ॥ |