देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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८६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९
| सूतकान्ते सुतं वीक्ष्य राजा मुदमवाप ह।<br>अहं भूमिपतेश्चासं प्रिया भार्या परन्तप॥ २६ | जननाशौच समाप्त होनेपर पुत्रका दर्शन करके राजाको असीम प्रसन्नता हुई। हे परन्तप! अब मैं राजा तालध्वजकी अत्यन्त प्रिय भार्या हो गयी॥ २६॥ |
| ततो वर्षद्वयान्ते वै पुनर्गर्भो मया धृतः।<br>द्वितीयस्तु सुतो जातः सर्वलक्षणसंयुतः॥ २७ | दो वर्षके अनन्तर मैंने पुनः गर्भ धारण किया। [यथासमय] सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २७॥ |
| सुधन्वेति सुतस्याथ नाम चक्रे नृपस्तदा।<br>वीरवर्मेति ज्येष्ठस्य ब्राह्मणैः प्रेरितस्स्वयम्॥ २८ | तदनन्तर ब्राह्मणोंका आदेश पाकर राजाने इस पुत्रका नाम ‘सुधन्वा’ तथा बड़े पुत्रका नाम ‘वीरवर्मा’ रखा॥ २८॥ |
| एवं द्वादश पुत्राश्च प्रसूता भूपसम्मताः।<br>मोहितोऽहं तदा तेषां प्रीत्या पालनलालने॥ २९ | इस प्रकार मैंने राजाके मनोऽनुकूल बारह पुत्र उत्पन्न किये। मैं मोहके वशीभूत होकर उनके लालन-पालनमें प्रेमपूर्वक लगा रहा॥ २९॥ |
| पुनरष्ट सुताः काले काले जाताः स्वरूपिणः।<br>गार्हस्थ्यं मे ततः पूर्णं सम्पन्नं सुखसाधनम्॥ ३० | इसके बाद समय-समयपर मेरे परम रूपवान् आठ पुत्र और उत्पन्न हुए। इससे सुखका साधनभूत मेरा गार्हस्थ्य-जीवन सर्वथा पूर्ण हो गया॥ ३०॥ |
| तेषां दारक्रियाः काले कृता राज्ञा यथोचिताः।<br>स्नुषाभिश्च तथा पुत्रैः परिवारो महानभूत्॥ ३१ | राजाने समयानुसार उचित रूपसे उनका विवाह कर दिया। इस प्रकार वधुओं तथा पुत्रोंसे युक्त मेरा परिवार बहुत बड़ा हो गया॥ ३१॥ |
| ततः पौत्रादिसम्भूतास्तेऽपि क्रीडारसान्विताः।<br>आसन्नानारसोपेता मोहवृद्धिकरा भृशम्॥ ३२<br>कदाचित्सुखमैश्वर्यं कदाचिद्दुःखमद्भुतम्।<br>पुत्रेषु रोगजनितं देहसन्तापकारकम्॥ ३३ | फिर मेरे पौत्र उत्पन्न हुए, जो खेलकूदमें मग्न रहते थे तथा अनेक प्रकारकी बालक्रीडाओंसे मेरे मोहको बढ़ाते रहते थे। कभी सुख-समृद्धि मेरे सामने आती थी और कभी पुत्रोंके रोगग्रस्त होनेके कारण चित्तको अशान्त कर देनेवाला महान् दुःख भोगना पड़ता था॥ ३२-३३॥ |
| परस्परं कदाचित्तु विरोधोऽभूत्सुदारुणः।<br>पुत्राणां वा वधूनां च तेन सन्तापसम्भवः॥ ३४ | कभी-कभी पुत्रों अथवा वधुओंमें परस्पर अत्यन्त भीषण विरोध हो जाता था, उससे मुझे सन्ताप होने लगता था॥ ३४॥ |
| सुखदुःखात्मके घोरे मिथ्याचारकरे भृशम्।<br>सङ्कल्पजनिते क्षुद्रे मग्नोऽहं मुनिसत्तम॥ ३५ | हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्पसे उत्पन्न इस सुख-दुःखात्मक, तुच्छ, भयानक तथा मिथ्या व्यवहारवाले मोहमें मैं निमग्न रहता था॥ ३५॥ |
| विस्मृतं पूर्वविज्ञानं शास्त्रज्ञानं तथा गतम्।<br>योषाभावे विलीनोऽहं गृहकार्येषु सर्वथा॥ ३६ | मेरा पूर्वकालिक विज्ञान विस्मृत हो गया तथा शास्त्र-ज्ञान भी समाप्त हो गया। स्त्रीभावमें होकर मैं घरके कार्योंमें ही सदा व्यस्त रहता था॥ ३६॥ |
| अहङ्कारस्तु सञ्जातो भृशं मोहविवर्धकः।<br>एते मे बलिनः पुत्राः स्नुषाः सुकुलसम्भवाः॥ ३७ | मेरे ये पुत्र महान् पराक्रमी हैं तथा मेरी ये बहुएँ उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं—ऐसा सोचकर मेरे मनमें अति मोह बढ़ानेवाला अहंकार उत्पन्न हो जाया करता था॥ ३७॥ |