देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 876, कुल 889 में से
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| अ० २९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रममाणो मया सार्धं सुखमाप महीपतिः।<br>नानाभोगविलासैश्च कामशास्त्रोदितैस्तथा ॥ १३ | कामशास्त्रानुकूल अनेक प्रकारके भोग-विलासोंके द्वारा मेरे साथ रमण करते हुए राजाको आनन्द मिलता था॥ १३॥ |
| राजकार्याणि सन्त्यज्य क्रीडासक्तो दिवानिशम्।<br>नासौ विवेद गच्छन्तं कालं कामकलारतः॥ १४ | राज्यके कार्योंको छोड़कर वे दिन-रात मेरे साथ क्रीडारत रहते थे। कामकलामें आसक्त उन राजाको समय बीतनेका भी बोध नहीं रहता था॥ १४॥ |
| उद्यानेषु च रम्येषु वापीषु च गृहेषु च।<br>हर्म्येषु वरशैलेषु दीर्घिकासु वरासु च॥ १५<br>वारुणीमदमत्तोऽसौ विहरन्कानने शुभे।<br>विसृज्य सर्वकार्याणि मदधीनो बभूव ह॥ १६ | मनोहर उद्यानों, बावलियों, सुन्दर महलों, अट्टालिकाओं, श्रेष्ठ पर्वतों, उत्तम जलाशयों तथा रमणीक काननमें विहार करते हुए मधुपानसे उन्मत्त वे राजा समस्त कार्य छोड़कर मेरे अधीन हो गये॥ १५-१६॥ |
| व्यासाहं तेन संसक्ता क्रीडारसवशीकृता।<br>स्मृतवान्पूर्वदेहं न पुंभावं मुनिजन्म च॥ १७ | हे व्यासजी! उनमें मेरी भी पूर्ण आसक्ति हो गयी और मैं क्रीडारसके वशीभूत हो गया। मुझे अपने पूर्व पुरुष-शरीर तथा मुनि-जन्मका भी स्मरण नहीं रहा॥ १७॥ |
| ममैवायं पतिर्योषाहं पत्नीषु प्रिया सती।<br>पट्टराज्ञी विलासज्ञा सफलं जीवितं मम॥ १८<br>इति चिन्तयती तस्मिन्प्रेमबद्धा दिवानिशम्।<br>क्रीडासक्ता सुखे लुब्धा तं स्थिता वशवर्तिनी॥ १९<br>विस्मृतं ब्रह्मविज्ञानं ब्रह्मज्ञानं च शाश्वतम्।<br>धर्मशास्त्रपरिज्ञानं तदासक्तमनाः स्थिता॥ २० | ये ही मेरे पति हैं तथा इनकी अनेक पत्नियोंमें मैं ही इनकी प्रिय पतिव्रता भार्या हूँ, सम्पूर्ण विलासोंको जाननेवाली मैं इनकी पटरानी हूँ; इस प्रकार मेरा जीवन सफल है—ऐसा सोचती हुई मैं दिन-रात उन्हींके प्रेममें आबद्ध रहती थी तथा उनके साथ क्रीडारत रहती थी। इस तरह उनके सुखके लोभमें मैं सदा उन्हींके अधीन हो गयी। मेरा ब्रह्मविज्ञान, सनातन ब्रह्मज्ञान तथा धर्मशास्त्रका रहस्य पूर्णरूपसे विस्मृत हो गया और मैं उन्हींमें आसक्त-मन होकर रहने लगी॥ १८–२०॥ |
| एवं विहरतस्तत्र वर्षाणि द्वादशैव तु।<br>गतानि क्षणवत्कामक्रीडासक्तस्य मे मुने॥ २१ | हे मुने! इस प्रकार कामक्रीडामें आसक्त मेरे वहाँ विहार करते हुए बारह वर्ष एक क्षणकी भाँति व्यतीत हो गये॥ २१॥ |
| जाता गर्भवती चाहं मुदं प्राप नृपस्तदा।<br>कारयामास विधिवद् गर्भसंस्कारकर्म च॥ २२ | मेरे गर्भवती होनेपर राजाको परम प्रसन्नता हुई। राजाने विधिपूर्वक गर्भसम्बन्धी संस्कारकर्म सम्पन्न कराया॥ २२॥ |
| अपृच्छद्दोहदं राजा प्रीणयन्मां पुनः पुनः।<br>नाब्रुवं लज्जमानाहं नृपं प्रीतमना भृशम्॥ २३ | गर्भके समय मेरी मनोवांछित वस्तुओंके विषयमें राजा मुझे प्रसन्न करते हुए बार-बार पूछा करते थे। तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त मैं लज्जाके कारण कुछ भी नहीं कह पाती थी॥ २३॥ |
| सम्पूर्णे दशमे मासि पुत्रो जातस्ततो मम।<br>शुभेऽह्नि ग्रहनक्षत्रलग्नताराबलान्विते॥ २४ | दस माह पूर्ण होनेपर ग्रह, नक्षत्र, लग्न तथा तारा-बलयुक्त शुभ दिनमें मुझे एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २४॥ |
| बभूव नृपतेर्गेहे पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>राजा परमसन्तुष्टो बभूव सुतजन्मतः॥ २५ | राजाके भवनमें पुत्र-जन्मका उत्सव मनाया गया। पुत्र-जन्मसे राजा परम प्रसन्न हो गये॥ २५॥ |