भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 875
८६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र-पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध

नारद उवाच
इत्युक्तोऽहं तदा तेन राज्ञा तालध्वजेन च।<br>विमृश्य मनसात्यर्थं तमुवाच विशांपते॥ १<br>राजन्नाहं विजानामि पुत्री कस्येति निश्चयम्।<br>पितरौ क्व च मे केन स्थापिता च सरोवरे॥ २नारदजी बोले—हे विशाम्पते! राजा तालध्वजके यह पूछनेपर मैंने अपने मनमें सम्यक् प्रकारसे विचार करके उनसे कहा—हे राजन्! मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती कि मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं और मुझे इस सरोवरपर कौन लाया है॥ १-२॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं मे सुकृतं भवेत्।<br>निराधारास्मि राजेन्द्र चिन्तयामि चिकीर्षितम्॥ ३अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरा कल्याण कैसे हो सकेगा, मैं आश्रयहीन हूँ। हे राजेन्द्र! यही बात सोचती रहती हूँ॥ ३॥
दैवमेव परं राजन्नास्त्यत्र पौरुषं मम।<br>धर्मज्ञोऽसि महीपाल यथेच्छसि तथा कुरु॥ ४हे राजन्! दैव ही सर्वोपरि है; इसमें मेरा पौरुष व्यर्थ ही है। हे भूपाल! आप धर्मज्ञ हैं; आप जैसा चाहते हों, वैसा करें॥ ४॥
तवाधीनास्म्यहं भूप न मे कोऽप्यस्ति पालकः।<br>न पिता न च माता च न स्थानं न च बान्धवाः॥ ५हे राजन्! मैं आपके अधीन हूँ; क्योंकि मेरा यहाँ कोई भी रक्षक नहीं है। मेरे न पिता हैं, न माता हैं, न बन्धु-बान्धव हैं और न तो मेरा कोई स्थान ही है॥ ५॥
इत्युक्तोऽसौ मया राजा बभूव मदनातुरः।<br>मां निरीक्ष्य विशालाक्षीं सेवकानित्युवाच ह॥ ६मेरे ऐसा कहनेपर वे राजा तालध्वज कामासक्त हो उठे और मुझ विशाल नयनोंवालीकी ओर दृष्टि डालकर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा—॥ ६॥
नरयानमानयध्वं चतुर्वाहं मनोहरम्।<br>आरोहणार्थमस्यास्तु कौशेयाम्बरवेष्टितम्॥ ७<br>मृद्वास्तरणसंयुक्तं मुक्ताजालविभूषितम्।<br>चतुरस्रं विशालं च सुवर्णरचितं शुभम्॥ ८तुमलोग इस सुन्दर स्त्रीके आरोहणके लिये रेशमी वस्त्रसे आवेष्टित एक मनोहर पालकी ले आओ, जिसे ढोनेवाले चार पुरुष हों, उसमें कोमल आस्तरण बिछा हो तथा वह मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित हो, वह सोनेकी बनी हुई हो, चौकोर हो तथा पर्याप्त विशाल हो॥ ७-८॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भृत्याः सत्वरगामिनः।<br>आनिन्युः शिबिकां दिव्यां मदर्थे वस्त्रवेष्टिताम्॥ ९राजाकी बात सुनकर शीघ्रगामी सेवकोंने मेरे लिये वस्त्रसे ढकी हुई दिव्य पालकी लाकर उपस्थित कर दी॥ ९॥
आरूढाऽहं तदा तस्यां तस्य प्रियचिकीर्षया।<br>मुदितोऽसौ गृहे नीत्वा मां तदा पृथिवीपतिः॥ १०उन राजा तालध्वजका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे मैं उस पालकीपर आरूढ़ हो गया। मुझे अपने भवन ले जाकर राजा तालध्वज अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥
विवाहविधिना राजा शुभे लग्ने शुभे दिने।<br>उपयेमे च मां तत्र हुतभुक्सन्निधौ ततः॥ ११किसी शुभ लग्न तथा उत्तम दिनमें राजाने वैवाहिक विधि-विधानसे अग्निके साक्ष्यमें मेरे साथ विवाह कर लिया॥ ११॥
तस्याहं वल्लभा जाता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।<br>सौभाग्यसुन्दरीत्येवं नाम तत्र कृतं मम॥ १२उस समय मैं उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो गया। उन्होंने वहाँ मेरा नाम सौभाग्यसुन्दरी—ऐसा रख दिया॥ १२॥