देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३३ सप्तमस्कंध-अ० ३२. (७४१) छिन्नता प्रमाणित होती है ॥ १८ ॥ यदि कोई कहै कि ज्ञान आत्माका स्वरूप नहीं है वह आत्माका धर्म है यह भ्रान्तिविलास है क्योंकि यदि आत्माका धर्म होता तो अवश्यही उसकी जड़ता संघटित होती इसमें सन्देह नहीं ज्ञानका जडत्व सम्भव नहीं होता अतएव अन्य कहीं भी ज्ञानका जड़परिणामित्व दिखाई नहीं देता ॥ १९ ॥ यदि कहो कि तो ज्ञानका जड़त्व हो वहभी नहीं होसक्ता क्योंकि ज्ञान भी चित्स्वरूप और आत्मा भी चित्स्वरूप है चित् पदार्थका धर्मत्व नहीं और चित्पदार्थ चित्से भी भिन्न नहीं होसक्ता अतएव चिद्रूप ज्ञानका धर्माधर्मभाव किसप्रकार सम्भव होसक्ता है ? ॥ २० ॥ अतएव आत्मा सर्वदाही ज्ञानस्वरूप आनन्दस्वरूप सत्यस्वरूप पूर्ण संगरहित और द्वैतवर्ज्जित है ॥ २१ ॥ यह आत्मा कामना और कर्मादियुक्त अपनी मायाद्वारा पूर्वानुभूत संस्कार वशसे काल और कर्मके विपाकानुसार ॥ २२ ॥ चौबीस तत्वोंके अविवेक- जनितही इसप्रकार सृष्टिविषयमें इच्छावान् होता है हे गिरिवर ! सोता हुआ पुरुष जिस प्रकार पूर्वसंस्कारसे अबुद्धिपूर्वक नींदसे उठता है इसीप्रकार आत्माकी यह सृष्टिभी कालकर्मके संस्कार अबुद्धिपूर्वकही साधित होती है ॥ २३ ॥ हे अचलेन्द्र ! मैंने जो तत्वका विषय वर्णनकिया यही सर्वोत्तम और मेरा अलौकिक रूपमात्र है वेदमैं यही अव्याकृत अव्यक्त और मायाशवल कह- कर उल्लिखित हुआ है ॥ २४ ॥ और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें इसको सर्व कारणोंका कारण सब तत्वका आदिभूत तथा सच्चिदानन्दविग्रह कहकर निर्देश करतेहैं ॥ २५॥ ज्ञान और क्रियासंयुक्त समस्त कर्म घनीभूत होनेसे वह ह्रींकार मंत्रका वाच्य होताहै तत्वदर्शी महर्षिगण उस ह्रींकाररूप मायाबीजकोही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका आदि तत्त्व कहकर उल्लेख करते हैं ॥ २६ ॥ उस ह्रींकारवाच्य महतस्वरूप मायाबीज रूप आदितत्त्वसे क्रमानुसार शब्दतन्मात्ररूप अपञ्चीकृत आकाश उत्पन्न होता है अनन्तर उससे स्पर्शात्मक वायु अनन्तर उससे क्रमानुसार रूपात्मक तेज ॥ २७ ॥ इसके उपरान्त रसात्मक जल तदनन्तर गन्धगुणात्मक पृथ्वि उत्पन्न होती है पंडित- लोग कहते हैं कि आकाशगुण एकमात्र शब्द है वायुका गुण शब्द और स्पर्श है ॥ २८ ॥ तेजका गुण शब्द स्पर्श और रूप जलका गुण शब्द स्पर्श रूप और रस है॥२९॥ तथा शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध यह पांच पृथ्वीके गुण हैं इन अपञ्ची कृत भूतोंसे व्यापक सूत्र उत्पन्न होता है वही लिङ्गदेहनामसे कहागया है ॥ ३० ॥