भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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( ७४० ) देवीभागवत-भाषा । १३२

स्वीकार करनेसे चैतन्य प्रकाशक प्रकाशित होता है ॥ १२ ॥ वह अन्यद्वारा प्रकाशित होताहै इसप्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होता है स्वयंप्रकाश पदार्थकी स्थिरता नहीं है यहभी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें कर्म्म कर्त्ताका विरोध होता है एक पदार्थमें ही एक कालमें कर्तृत्व और कर्म्मत्व नहीं रहसक्ता अतएव दीप ककी समान चैतन्यको स्वप्रकाश पदार्थ स्वीकार करना चाहिये ॥ १३ ॥ चैतन्य स्वयं प्रकाशमान पदार्थ होनेपरभी अन्य चन्द्र सूर्यादि पदार्थोंकोभी प्रकाशित करता है अतएव हे पर्वतवर ! मेरे संवित् रूप तनुका नित्यत्व सिद्धहुआ ॥१४॥ कारण कि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इत्यादि अवस्थाओंमें दृश्य पदार्थका व्यभिचार होता है किन्तु किसी अवस्थामें ही सम्वित् वा चैतन्यका व्यभिचार अनुभव नहीं होता क्योंकि जो मैंने जाग्रत अवस्थाका अनुभव किया है वही मैं स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाका अनुभव करती हूं मैं इस समय सोती थी, इसप्रकार अनुभव किया अत एव संवित् पदार्थका कभी व्यभिचार नहीं होता ॥ १५ ॥ बौद्धगण कहते हैं कि जिसप्रकार संवित्का अनुभव होता है इसीप्रकार संवित्के अभावकाभी अनुभव होता है जो सत् है वही क्षणिक है इसप्रकार अनुमानद्वारा ज्ञानका भी अनित्यत्व प्रतिपादित होता है इससे कहाजाता है कि यद्यपि संवित्के अभावका अनुभव होता है तथापि जिस साक्षीद्वारा उस संवित्के अभावका अनुभव होता है वही साक्षी संवित् वपु है अर्थात् ज्ञानशरीररूपसे प्रतिपन्न होता है क्योंकि साक्षी ज्ञानका नित्यत्व सबको ही स्वीकार करना होता है ॥ १६ ॥ अतएव अनवद्य सत् शास्त्रोंके तत्वज्ञ पंडितगण कहते हैं कि संवित् नित्य और परम प्रेमका आस्पद होनेसे वह आनन्दस्वरूप है कारण कि असुखं कभी परम प्रेमका आस्पदीभूत नहीं होसक्ता ॥ १७ ॥ और "मैं हूं" जीवोंका इस प्रकार अनुभव नहीं होता किन्तु "मैं विद्यमान हूं" इसप्रकार प्रेम सम्पूर्ण जीवोंके आत्मामें प्रतिष्ठित रहता है यदि आत्माका आनन्दरूपत्व न हो तो इसप्रकार आत्मप्रेम कभी संभव नहीं होता अतएव प्राणिमात्रके अनुभव हेतु संवित्का आनन्दरूपत्व सर्वथा सिद्ध हुआ है हे गिरिराज ! यह सम्पूर्ण जगतप्रपंच मायानिर्मित है अतएव वह मिथ्या भ्रम होनेसे सर्पादि मिथ्या पदार्थका जिसप्रकार रज्जु इत्यादिके सहित सम्बन्ध नहीं होता इसी प्रकार इस जगतके सहित मेरा (आत्माका) असङ्गत्व भलीभांति सिद्ध हुआ और यह सम्पूर्ण संसार मिथ्या और परिच्छेद्य होनेसे मेरा आत्मस्वरूपिणीका अपरि-