देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(७५६) देवीभागवत-भाषा । १४८ षट्त्रिंशोऽध्यायः ३६.॥ श्रीदेवी बोलीं हे गिरिराज ! योगीजन इस प्रकार योगयुक्त हो आसनमें बैठ छलरहित भक्तिसे मुझ ब्रह्मरूपिणीका ध्यान करैं ॥१॥ अब ब्रह्मस्वरूपका वर्णन करती हूं सुनो यह ब्रह्म आवि अर्थात् प्रकाशमान वस्तु अति समीपवर्ती और गुहाचर अर्थात् सर्व व्यापक होकर भी केवल बुद्धिरूप गुहामेंही इसकी प्राप्ति होती है यह योगादि साधन गम्य है इस ब्रह्मसेही आकाशादि समस्त पदार्थ कल्पित होते हैं इसमेंही पक्षी मनुष्य निमेषादिक्रियावान् सब पदार्थ स्थापित हैं ॥ २ ॥ हे देवताओ ! मेरे इस ब्रह्मरूपको जानो जो माया और जगत् इन दोनोंसे श्रेष्ठ है लोकमें ज्ञानातीत और वरिष्ठ अर्थात् सम्पूर्ण बुद्धियोंको भी गम्य नहीं है जो सूर्यादितेजका भी प्रकाशक है इससे वह सूर्यादितेजसे भी अत्यन्त दीप्तिमान् और अणुसे भी अणु अर्थात् अति सूक्ष्म है जिसमें भूरादि लोक और उन लोकनिवासियोंकी स्थिति है ॥ ३ ॥ वह अक्षर अविनाशी पदार्थही ब्रह्म है यही प्राण, वाणी और मन स्वरूप है वही सत्य और अमृत स्वरूप है हे सौम्य ! मनरूपी बाणसे उसको विद्धकरना चाहिये अर्थात् उसमें मन समाधान करै ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! उसके विद्ध करनेका उपाय कहती हूं उपनिषद्शास्त्र रूपी महाधनुष ग्रहणकर उसमें ध्यान और उपासनाका तीक्ष्ण बाण संधान और सब इन्द्रियोंको अपने अपने ॥ २ ॥ विषयसे खींचकर तद्गत चित्तसे उस ब्रह्मरूप लक्ष्यको विद्ध करै ॥ ५ ॥ जिस धनुआदिका विषय कहा है वह भली भांति वर्णन करती हूं इस ब्रह्मरूप लक्ष्यवेधमें ॐकार वा देवी प्रणवही धनु है जिसप्रकार लक्ष्यमें बाणप्रवे- शका कारण धनुषही है इसीप्रकार चित्तरूपी लक्ष्यमें प्रवेशसम्बन्धका प्रण वही कारण है प्रणवका अभ्यास करते २ उससे संस्कृत हो प्रणवको अवलम्बनपूर्वक अप्रतिबद्ध भावसे ब्रह्ममें स्थिति कीजाती है, इसमें आत्मा अर्थात् अन्तःकरणही शर है जिस प्रकार शर लक्ष्यको विद्ध करताहै इसीप्रकार अन्तःकरणही आत्माको विद्ध करताहै इसीकारण अन्तःकरणको शर कहागया है इस स्थलमें ब्रह्मही लक्ष्यवस्तु है साधक अप्रमत्त चित्तसे इस लक्ष्यको विद्ध करै तो बाण जिस प्रकार लक्ष्यभेद करके उसके संग एकात्मताको प्राप्त होता है इसीप्रकार साधकभी ब्रह्मके संग एकात्माको प्राप्त होसक्ते हैं ॥ ॥ ६ ॥ वह ब्रह्मपदार्थ अतिदुर्लक्ष्य वस्तु है इससे भलीभांति लक्ष्य करनेको फिर कहा जाता है, जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, सब इन्द्रियें और प्राणोंके सहित