भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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१४९ सप्तमस्कंध-अ० ३६. (७५७) मन स्थित है, उसीको आत्मा जानना चाहिये, हे देवताओ ! इसको जानकर अन्य अपर विद्यारूप वाक्योंका त्याग करै यह ब्रह्मज्ञान ही मुक्तिका सेतु अर्थात् संसार सागरसे तारनेका हेतु है ॥ ७ ॥ जिसप्रकार रथकी नाभिमें सब आरे मिलकर सन्नि विष्ट रहते हैं इसीप्रकार जिस हृदयमें नाड़ियें प्रविष्ट हुई हैं उसी हृदयमें बुद्धिवृत्तिका साक्षीरूप आत्मा बुद्धिवृत्तिके द्वारा अनेकरूपयुक्त होकर स्थिति करता है ॥ ८ ॥ ॐकारका अवलम्बन कर यथोक्त प्रकारसे उसी आत्माकी चिन्ता करनी चाहिये संसारसागरके पार जानेकी प्राप्तिमें तुम निर्विघ्न हो यह भगवतीका आशीर्वाद है, तुम अविद्यारहित ब्रह्मस्वरूपको अवगत हो, वह ब्रह्म जिस स्थानमें प्रतिष्ठित है सुनो जो सर्वज्ञ सर्ववित् और जिसके जगत्सृष्टि आदिरूपकी विभूति पृथ्वीमें प्रसिद्ध है, वह प्रकाशशाली आत्मा दिव्य हृदयकमलमें प्रतिष्ठित होनेसे प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ उस आत्माकी मनोवृत्तिद्वारा भावना होती है, इसी कारण उसको मनोमय कहते हैं, यही प्राण और शरीरका नेता यही अन्नमय हृदयपिण्डमें बुद्धिको स्थित कर प्रतिष्ठित है, विवेकी पुरुष इसको भलीभांति जानसकते हैं वह आनन्दरूप दुःखसे परे है, अविनाशीरूपसे प्रकाशित होता है ॥ १० ॥ आत्मज्ञानका फल कहती हैं उस परमात्माका साक्षात् कार होनेसे हृदयग्रंथि अर्थात् चैतन्य और अहंकारका तादात्म्यभाव नष्ट होजाता है, समस्त ज्ञेयवस्तु विषयक सन्देह दूर होजाता है प्रारब्ध के अतिरिक्त सब कर्म नष्ट होजाते हैं जब उस परात्परका साक्षात्कार होता है ॥ ॥ ११ ॥ फिर पूर्वोक्त विषयको संक्षेपसे कहती हूं यह ब्रह्म ज्योतिर्मय परकोश अर्थात् आनंदमयकोशमें प्रतिष्ठित है यह सत्त्वादि तीनों गुणरहित निष्फल (मायार- हित) स्वच्छवस्तु है, यह सर्वप्रकाशक सूर्यादिकाभी प्रकाशक है आत्मवित् जिसको बड़े परिश्रमसे जानते हैं वह हिरण्मय परकोशमें स्थित है ॥ १२ ॥ उस ब्रह्मको सूर्य प्रकाश नहीं करसक्ते, चन्द्र तारा बिजली वा अग्निभी उसके प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं, बहुत क्या यह सम्पूर्ण जगत् उस स्वप्रकाश आत्मासेही प्रकाशित होता है उससेही यह सब प्रकाशित है ॥ १३ ॥ यह अमृतमय ब्रह्मही आगे पीछे दक्षिण उत्तर नीचे और ऊपर भागमें स्थित है अधिक क्या इस सब जगत्कोही ब्रह्ममय जानना चाहिये ॥१४॥ हे गिरिराज ! जो पुरुष श्रेष्ठ इसप्रकार अनुभव कर सक्ते हैं वही कृतार्थ हैं वह ब्रह्मस्वरूप प्रसन्नस्वभाव होकर शोक और विषयकी कांक्षा रहित होते हैं ॥ १५॥ हे गिरिराज ! द्वैतभावही भयका कारण है द्वैतभाव दूर होनेसे