भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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(७५८) देवीभागवत-भाषा । १५० फिर संसारभय नहीं रहता, मैं अद्वैतभावनिष्ठसे वियुक्त नहीं हूं और वह मुझसे पृथक् नहीं है॥ १६॥ हे पर्वतराज ! यह निश्चय जानो, वह ज्ञानी व्यक्ति मैं हूं, जो मैं हूं सो वह ज्ञानी है, जिस किसी स्थानमें ज्ञानी क्यों न रहै उसी स्थानमें उसको मेरा दर्शन प्राप्त होता है ॥ १७॥ मैं तीर्थ कैलास और वैकुण्ठमें निवास नहीं करती परन्तु जो ज्ञानी मुझमें परायण है उसीके हृदयकमलमें वास करती हूं ॥ १८ ॥ जो कोई मुझमें निष्ठावाले ज्ञानीकी एकवार पूजा करता है उसको मेरी पूजाका कोटिगुण फल होता है, जिसका चित्त चैतन्यस्वरूप ब्रह्ममें लीन हुआ है उसका वंश पवित्र है उसकी माता कृतकृत्य ॥ १९ ॥ और उस पुरुषसे पृथिवी पुण्यशालिनी होती है हे पर्वतराज ! आपने जो मुझसे ब्रह्मज्ञानका विषय पूँछा ॥२०॥ वह मैंने सब कह दिया इस विषयमें अब कुछ कहना नहीं है यह ज्येष्ठपुत्र भक्तिमान् शीलसम्पन्न ॥ २१ ॥ यथोक्त शिष्यसे कहना अन्यसे नहीं कहना जिसकी इष्टदेवमें पराभक्ति होती है और देवताके समान गुरुमें भक्ति होती है ॥ २२ ॥ उसीके निमित्त श्रेष्ठ पुरुष यह ब्रह्मविद्या प्रकाशकरते हैं अर्थात् उसी महात्माको यह विद्या प्रकाशित होतीहै जो इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करते हैं वह साक्षात् परमेश्वरस्वरूप हैं॥२३॥ इस विद्या- को प्राप्त होकर शिष्य प्रत्युपकारमें असमर्थ होता है इससे जीवनपर्यन्त गुरुके समीप ऋणी रहता है, जो ब्रह्मरूपमें युक्त करते हैं वह ब्रह्मजन्मदाता गुरु माता पिता सेभी अधिक पूज्य हैं ॥ २४ ॥ पितासे प्रगट होकर जन्म मरण होनेसे नष्ट होते हैं परन्तु ब्रह्मरूप जन्मसे फिर कभी नष्ट नहीं होता, हे पर्वतराज! “तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन्” इस श्रुतिनेभी कहाहै कि ब्रह्मदाता गुरुका कार्य स्मरण कर कभी उससे द्रोह न करै ॥ २५ ॥ इसकारण शास्त्रके सिद्धान्तअनुसार ब्रह्मदाता गुरु सबसे श्रेष्ठ है। शिवके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षक होसक्ताहै पर गुरुके रुष्ट होनेपर शिव कभी उसकी रक्षा नहीं करते ॥ २६ ॥ हे पर्वतराज ! इसकारण काय मन वचनसे सर्वदा यत्नपूर्वक श्रीगुरूको संतुष्ट करै ॥ २७ ॥ अन्यथा वह कृतघ्नी होगा और कृतघ्न पुरुषकी निष्कृति नहीं होती गुरुके वचन उल्लंघन करनेसे क्या दशा होती है सो कहते हैं दध्यङ्नामक आथर्वण मुनिने इन्द्रसे प्रार्थना की कि आप मुझे ब्रह्मविद्या दीजिये इन्द्रने कहा विद्या तो दूंगा पर यदि आप अन्य किसीको यह विद्या दोगे तो मैं तुम्हारा मस्तक छेदन करूंगा उनके स्वीकारकरनेपर इन्द्रने ब्रह्मविद्या दी ॥ २८ ॥ तब कुछ काल उपरान्त दोनों अश्विनीकुमारोंने मुनिके पास आय विद्याकी प्रार्थना की