देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६१ सप्तमस्कंध-अ० ३७. (७५९) मुनिने कहा विद्या देनेसे इन्द्र मेरा मस्तक छेदन करेगा तब अश्विनीकुमार बोले हम आपका यह मस्तक छेदनकर आपके देहमें अश्वका मस्तक लगाये देते हैं उस मस्तकसे आप हमको विद्या उपदेश कीजिये, जब इन्द्र आपका यह मस्तक छेदन करेगा तब हम आपका पूर्वशिर संयुक्त करदेंगे मुनिने सम्मत हो उनको ब्रह्मविद्याका उपदेश किया तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक छेदन किया, तब अश्विनीकुमारोंने ॥२९॥ उनका मुख्य शिर जोडकर फिर उनके मुख्य शिरसे ब्रह्मविद्या सुनी यह कथा श्रुतिसिद्ध है इस प्रकार संकटसे प्राप्त होनेवाली विद्याको जिसने प्राप्त किया. हे पर्वतराज ! वह धन्य और कृत कृत्य हैं ॥ ३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायां षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ ॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३७.॥ हिमालय बोले हे मातः ! अधिरागी मध्यम अधिकारी पुरुषको जिस प्रकार सुख पूर्वक ज्ञानलाभ होसके इस समय आप वही अपना भक्तियोग कहो ॥ १ ॥ देवीने कहा हे नगेन्द्र ! मुक्ति प्राप्तिके निमित्त तीन मार्ग हैं कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग ॥ २ ॥ इन तीनोंमें भक्तियोगही सहजमें सिद्ध होता है कारण कि, यह योग द्रव्यव्यय और शरीरकी पीडाके विना केवल मनकी वृत्तिसेही संपादित होता है, इससे सुलभ है ॥ ३ ॥ सत्व, रज, तम इन तीन प्रकारके गुणभेदसे मनुष्यकी भक्ति सात्विकी राजसी और तामसी ऐसी तीन प्रकारकी होती है जो दम्भप्रकाशपूर्वक दूसरेको पीडा देनेके निमित्त ॥ ४ ॥ मात्सर्य और क्रोधादियुक्त होकर उपासना करताहै उसकी तामसी भक्ति है और जो परपीडादिसे रहित हो अपने कल्याणके निमित्तही ॥ ५ ॥ सकाम भावसे यश और भोगमें लोलुप हो अतिभक्तिसे उस उस फलप्रा- प्तिक निमित्त अत्यन्त भक्तिसे उपासना करते हैं ॥ ६ ॥ और अपनी अज्ञतासे हुई भेदबुद्धिद्वारा मुझे अपनेसे अन्य जानते हैं हे नगाधिप ! उस पामरकी भक्ति राजसी है ॥ ७ ॥ परमात्माको अर्पण किये कर्मही पापनाश करनेमें समर्थ होते हैं वह वेदोक्त कर्म दिन रात मुझे अवश्य कर्तव्य हैं ॥ ८ ॥ इसप्रकार निश्चय कर जो भेदबुद्धिसे मेरी प्रसन्नताके निमित्त नित्यकर्मानुष्ठान करताहै हे पर्वतराज ! उसकी सात्विकी भक्ति हैं ॥ ९ ॥ यह सात्विकी भक्ति परम प्रेमरूपा और पराभक्तिकी प्राप्तिका है किन्तु यह स्वयही परा भक्ति नहीं है कारण कि, इसमें भेदबुद्धि वर्तमान रहती है