देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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परन्तु राजसी और तामसी भक्ति पराभक्तिकी प्राप्तिका नहीं इससे तामसी और राजसी भक्तिका त्यागकरके इसकाही आश्रय करै ॥ १० ॥ हे नगेन्द्र ! अब मैं पराभक्तिको वर्णन करतीहूं तुम सुनो जो कोई सदा मेरे गुणश्रवण और सदा मेरे नामको कीर्तन करताहै ॥ ११ ॥ जिसका मन कल्याण और गुण रत्नका आकर मुझमेंही तेलधाराके समान अविच्छिन्नभावसे सदा स्थित रहता है ॥ १२ ॥ और उसमें किसी फलके हेतु व किसी फलकी आकांक्षा नहीं करता तथा सामीप्य, सार्ष्टि सायुज्य और सालोक्य मुक्तिकी भी कामना नहीं करता ॥ १३ ॥ और जो प्राणी मेरी सेवासे अधिक और कुछ नहीं जानता, जो सेव्य- सेवकभाव त्यागकर मोक्षकी भी आकांक्षा नहीं करता ॥ १४ ॥ जो जितेन्द्रिय हो परानुरक्तिपूर्वक मेरीही आकांक्षा करता है और मुझको अपनेसे पृथक् न करके मैंही सच्चिदानंदरूप हूं ऐसा जानता है ॥ १५ ॥ और जो सब जीवोंमें मेराही रूप जानता है अपने परायेमें समान प्रीतियुक्त है ॥ १६ ॥ जो चैतन्यके समानत्वसे सर्वत्र विद्यमान् सर्वस्वरूपिणी मेरे सहित सदा सब जीवोंका अभिन्नत्व जानता है ॥ १७ ॥ हे नगेश्वर ! जो भेद बुद्धि त्यागके कारण चण्डालपर्यन्त सब जीवोंको नमस्कार और सत्कार करता है और भेदवर्जनसे कहीं भी जिसकी द्रोहबुद्धि नहीं है ॥ १८ ॥ जो मेरा मेरे भक्तोंका दर्शन मेरा शास्त्रश्रवण और मेरे मंत्रादिविषयमें श्रद्धायुक्त है ॥ १९ ॥ मेरेहीमें प्रेमसे आकुलमति हो मेरी कथामात्र सुननेसे रोमांचित शरीर होता है प्रेमके आंसुओंसे जिसके नेत्र पूर्ण और गद्गद कण्ठ होता है ॥२०॥ हे नगेश्वर! जो अनन्यभावसे जगत्की योनि सर्व कारणोंकी कारण मुझ परमेश्वरीकी पूजा करता है॥२१॥जो भक्तिपूर्वक कृपणता त्याग मेरे नित्य नैमित्तिक के दिव्यव्रत करता है ॥२२॥ जिसको स्वभावसे ही मेरे उत्सव करने और देखनेकी इच्छा रहती है हे भूधर ! ॥२३॥ जो मेरे नाम ऊंचे स्वरसे लेकर गाते और नृत्य करते हैं जो अहंकार और देहके तादात्म्यभावसे रहित हैं ॥ २४ ॥ जो कोई यह समस्त ही प्रारब्धकर्मानुसार होता हैं यह जानकर मेरे ध्यानके अतिरिक्त देहरक्षादि विषयमेंभी चिन्ता नहीं करते ॥ २५ ॥ उन पुरुषोंकी यह भक्ति परा भक्ति कहाती है, जिसमें देवीविचारके अतिरिक्त अन्य किसी विषयकी चिन्ता नहीं रहती ॥ ॥ २६ ॥ हे पर्वतराज ! इसप्रकार तत्त्वसे जिसको पराभक्ति प्राप्त हुई है वह तत्काल ही मेरे चिद्रूपमें लीन हो जाता है ॥ २७ ॥ जिस ज्ञानसे भक्ति और