देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५३ सप्तमस्कंध-अ० ३७. (७६१) ज्ञानकी पूर्णता होती है इस कारण वैराग्य और भक्तिकी पराकाष्ठाकाही नाम ज्ञान है ज्ञानमें यह दोनों ही हैं ॥ २८ ॥ हे पर्वतराज ! जो भक्तिकरकेभी प्रारब्धवश मेरे ज्ञानके अधिकारी नहीं होते वह मणिद्वीपमें गमनकरते हैं॥ २९॥हे पर्वतराज! वहां जाकर इच्छा न करनेसे भी अनेक भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसके अन्तमें मेरा चिद्रूप ज्ञानलाभ करके ॥ ३० ॥ उस ज्ञानसे मुक्त होजाता है.कारण कि,ज्ञानके विना मुक्ति नहीं होती यहां जिसको संवित् स्वरूप हृदयमें प्राप्त प्रत्यगात्माका ज्ञान होता है ॥ ३१॥तो मेरे संवित् रूपका ज्ञान होनेसे उसके प्राण उत्क्रान्त नहीं होते इस शरीरमेंही लय होजाते हैं “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति” इतिश्रुतेः उसका ब्रह्मके साथ अभेद होता है “ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति” इति श्रुतेः ॥ ३२ ॥ जिस प्रकार कंठमें स्थित सुवर्णका भ्रमवश नष्ट होना जानाजाता है और भ्रमके नष्ट होनेसे प्राप्त वस्तुकीही प्राप्ति मानी जाती है ॥ ३३ ॥ हे नगसत्तम ! मेरे चिद्रूपतनुविहित घटादिकार्य अविदित माया- रूपसे भिन्न हैं जिसप्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्ब पडता है इसीप्रकार इस देहमें आत्माका अनुभव होता है और जिसप्रकार जलमें प्रतिबिम्ब पूर्वकी अपेक्षा विविक्तरूपसे प्रकाशित होता है इसीप्रकारसे पितृलोकमें देहसे विविक्तभावमें आत्माका अनुभव होता है ॥ ३४ ॥ जैसे छाया और आतपका भेद प्रकाशस्वरूपसे स्वच्छरूपसे दीखता है इसीप्रकार मणिद्वीपमें द्वैतभाववर्जित ज्ञान होता है ॥ ॥ ३५ ॥ जो वैराग्यवान् होकर पूर्णज्ञान प्राप्त हुये विना प्राणत्याग करते हैं वह प्रलयपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करके ॥ ३६ ॥ फिर पवित्र श्रीमान् पुरुषोंके घर जन्म ग्रहणकर साधन करने उपरान्त फिर ज्ञानलाभ करते हैं ॥ ३७ ॥ हे राजन् ! एक जन्ममें नहीं अनेक जन्मोंमें ज्ञान होता है इसकारण सब प्रयत्नसे ज्ञानको आश्रय करै ॥ ३८ ॥ यदि मनुष्यजन्म प्राप्त होकर ज्ञानलाभ न किया तो विनाश होगा. कारण कि, मनुष्यजन्म बड़ा दुर्लभ है उसमें भी ब्राह्मण और उसमें भी वेदप्राप्ति बहुतहीं दुर्लभ है ॥ ३९ ॥ शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, और श्रद्धा यह षट्सम्पत्ति, योगसिद्धि और उत्तम गुरुकी प्राप्ति यह इस लोकमें बडी दुर्लभ है ॥ ४० ॥ इन्द्रियोंकी पटुता शरीरका संस्कार और अनेक जन्मोंके पुण्योदयसे मोक्षमें इच्छा होती है ॥ ४१ ॥ जो मनुष्य साधनसे सफल होनेवाले इस शरीरको प्राप्त करके ज्ञानके निमित्त यत्न नहीं करता उसका जन्म निरर्थक है ॥ ४२ ॥ हे राजन् ! इसकारण यथाशक्ति ज्ञानप्राप्तिके निमित्त यत्न करें तो