भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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(७६८) देवीभागवत-भाषा । १६० तक इसीप्रकार पूजाकरता रहे जब आभ्यन्तरपूजाका अधिकार होजाय तो इच्छासे बाह्यपूजा छोडदे ॥ ४३ ॥ उपाधिरहित संवित् वा ब्रह्म ही मेरा स्वरूप है इस संवित् स्वरूपमें चित्तके लीन करनेकोही आभ्यन्तरपूजा कहते हैं ॥ ४४ ॥ इसकारण मेरे संवित्स्वरूपमें एकान्तभावसे चित्त स्थापन करै. कारण कि, संवित् वा ब्रह्मके अतिरिक्त अन्य समस्त जगत् मायामय मिथ्या है ॥ ४५ ॥ इसकारण संसार- नाशके निमित्त आत्मस्वरूपिणी सर्वसाक्षिणी मेरी निर्विकल्प भक्तियोगयुक्त चित्तसे भावना करै ॥ ४६ ॥ इसके आगे बाह्यपूजाका विस्तार कहती हूं. हे पर्वतसत्तम ! तुम सावधान मनसे सुनो ॥ ४७ ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥ चत्वारिंशोऽध्यायः ४०. श्रीदेवी बोलीं हे पर्वतराज ! साधक प्रभातही उठकर मस्तकके ब्रह्मरंध्रमें स्थित कर्पूरवर्णकी समान उज्ज्वल सहस्रार कमलका स्मरण कर उसमें अपने अनुरूप गुरुके समान आकार स्मरण करै ॥ १ ॥ जो प्रसन्नतायुक्त उत्तम वेषसे भूषित भूषणोंसे सम्पन्न शक्ति पत्नीसहित है इसप्रकार पत्नीसहित गुरुका ध्यान करके देवी कुंड- लिनीका ध्यान करै ॥ २ ॥ जो मूलाधारसे ब्रह्मरंध्रमें गमन करनेके समय प्रकाशमान अर्थात् चैतन्यरूपमें आसमान है और ब्रह्मरंध्रसे मूलाधारमें गमनकरनेके निमित्त आनन्दामृतमयी है, जो इसप्रकार सुषुम्ना पंथमें गमनागमनशील है उस पराशक्ति आनन्दरूपिणी कुंडलिनीकी मैं शरण होता हूं ॥ ३ ॥ इस प्रकार ध्यान कर मूल- धारमें स्थित चैतन्यरूप अग्निकी कुंडलिनीरूप शिखाके भीतर मुझसच्चिदानंदरूपिणी का ध्यान करै फिर शौच संध्यावंदनादि सब कार्य करै ॥ ४ ॥ फिर वह द्विजोत्तम मेरी प्रीतिके निमित्त अग्निहोत्र करके होमान्तमें आसनपर आकर पूजाका संकल्प करै ॥ ५ ॥ इससे पहले भूतशुद्धि और मातृकान्यास करै मातृकान्यास हल्लेखा अर्थात् मायाबीजद्वारा करै ॥ ६ ॥ मूलाधारमें हकार हृदयमें रकार भ्रूमध्यमें ईकार मस्तकमें ह्रींकारका न्यास करै ॥ ७॥ फिर प्रत्येक मंत्रमें किये न्यासोंको यथोक्त करै

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