भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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१६९ सप्तमस्कंध-अ० ३६. (७६७) पाकर शुद्ध हों पश्चात् वेदानुसार कर्म करै तथा दत्तके शाप, भृगुके शाप, दधीचिके शापसे जो ॥ २८ ॥ ब्राह्मण वेदसे बहिष्कृत हुए हैं उन ब्राह्मणोंको सोपानक्रमसे जन्मान्तरमें वेदाधिकारप्राप्तिके निमित्त कुछ परमेश्वरकी उपासना वक्तव्य है यह विचारकर ॥ ॥ २९ ॥ शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त, गाणपत्य यह पांचप्रकारके आगम शंकरने निर्माण किये ॥ ३० ॥ इनमें किसी २ अंशमें वेदानुकूल और कहीं २ वेदके विरुद्धभी कहा है इनमें वैदिकोंको वेदानुकूल अंशग्रहणमें दोष नहीं है. कारण कि, वायुसंहितामें लिखा है श्रौत अश्रौत भेदसे शिवागमन दोप्रकारका है श्रौतवेदका सार, और अश्रौत स्वतंत्र हैं, वैदिकोंको श्रौतअंश ग्रहणकरना कहा है ॥ ३१ ॥ सर्वथा वेदविरुद्ध अंशमें ब्राह्मण अधिकारी नहीं है जिनका वेदमें अधिकार नहीं है वही उस वेदविरुद्ध अंशके अधिकारी हैं ॥ ३२ ॥ इस कारण वैदिकद्विजाति सब प्रयत्नसे वेदका आश्रय करै. कारण कि, वेदोक्त धर्मानुष्ठानसे उत्पन्नहुआ ज्ञानही परब्रह्मका प्रकाशक है ॥ ३३ ॥ जो सब प्रकारकी वासना त्यागकर मेरी शरण हुए हैं जो सब प्राणियोंमें दया करते मान और अहंकारसे वर्जित हैं ॥३४॥ मुझमें चित्त लगाये मुझमें प्राण अर्पण किये मेरे स्थानवर्णनमें निरत संन्यासी, वनवासी, गृहस्थी, ब्रह्मचारी ॥ ३५ ॥ जो सदा भक्तिसे इस विराट्स्वरूप उपासनानामक योगका अनुष्ठान करते हैं सदा भक्तिसे उपासना करते हैं उन नित्ययोगानुष्ठान करने वालोंका मैं अज्ञानसे उत्पन्न हुआ अंधकार ॥ ३६ ॥ अपने ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशसे नष्ट करदेती हूं इसमें सन्देह नहीं. हे पर्वतराज ! इस प्रकार यह मैंने पहली वैदिकपूजाका ॥ ३७ ॥ स्वरूप संक्षेपसे कहा अब करचरणादिविशिष्ट मूर्तिपूजा दूसरी कहती हूं मूर्तिमें स्वच्छ भूमिमें सूर्यमंडल, चन्द्रमंडल ॥ ३८ ॥ जल, बाणलिंग, यंत्र, वस्त्र, हृदयकमलमें परात्परा जगम्बिका देवीका ध्यान करै ॥ ३९ ॥ जो सगुण अर्थात् सत्त्वादिगुणसम्पन्न करुणारसपरिपूर्ण युवती अरुणवर्ण सुन्दरताके सारकी सीमा सर्वांगसुन्दरी ॥ ४० ॥ शृंगाररसमें परिपूर्ण भक्तोंके दुःख देखतेही कातर होनेवाली प्रसादसे सुमुखी, अम्बा अर्धचन्द्रसे शोभितशिरवाली ॥ ४१ ॥ चारों हाथोंमें पाश, अंकुश, वर और अभय धारण किये, आनंदरूपिणीकी वित्तके अनुसार षोडश उपचारसे पूजनकरै ॥ ४२ ॥ जबतक आभ्यन्तर पूजामें अधिकार न हो तब