भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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(७६६) देवीभागवत-भाषा । १५८ सब शक्तिसम्पन्न मेरे स्वरूपसेही वेद प्रगट हुए हैं, इसकारण वेदके अप्रमाणकी शंका नहीं होसकती. कारण कि, मैं अज्ञानरहित हूं इससे मुझसे प्रगट हुए वेद भ्रान्तिरहित सत्यवस्तु हैं दूसरे शास्त्र अज्ञपुरुषोंद्वारा कल्पित हैं इससे वह वेदके सन्मुख अप्रमाण हैं इसीसे उनमेंका कहाहुआ धर्म धर्माभास है फलपक्षमें वेदोक्त धर्मही यथार्थ धर्म है ॥ १६ ॥ वेदोंका अर्थ ग्रहणकर स्मृतिशास्त्र प्रणीत हुआ है इससे मनुआदि महर्षि प्रणीत स्मृतिशास्त्रका ग्रहण होता है ॥ १७ ॥ स्मृति और पुराणादिमें जिसकिसी स्थलमें कटाक्षपूर्वक वेदविरुद्ध विषय कहागया वह वैदिकोंको ग्रहण न करना चाहिये ॥ १८ ॥ कारण कि, वेदके अतिरिक्त अन्यशास्त्रकर्ताओंके वचन अज्ञानसं- भूत हैं तो अज्ञानदोष वर्तमान होनेसे उनकी उक्तिका प्रणाम नहीं होसक्ता ॥ ॥ १९ ॥ इसकारण मुमुक्षुओंको धर्मज्ञानके निमित्त सर्वथा वेदमार्गका आश्रय लेना चाहिये जिसप्रकार लोकमें राजाकी आज्ञा कभी नष्ट नहीं होती ॥ २० ॥ इसीप्र कार सर्वेशानी राजराजेश्वरी मेरी श्रुतिरूप आज्ञाको मनुष्य कैसे त्यागसक्ते हैं ? अपनी आज्ञा रक्षा करनेको मैं ने ब्राह्मण क्षत्रियजाति ॥ २१ ॥ उत्पन्न की है, इस कारण मेरा रहस्यरूप श्रुतिवाक्य अवश्य जानना चाहिये. हे भूधर ! जब जब धर्मकी ग्लानि होती है ॥ २२ ॥ और अधर्मका अभ्युत्थान होता है तब मैं शाकंभरी- आदि अनेक वेष रामकृष्णादि अवतार धारण करती हूं वेदके सद्भावसेही वेदरक्षक देवता और वेदविनाशक दैत्य हैं यह विभाग कल्पित हुआ है॥२३॥ जो वेदोक्तधर्म- का अनुष्ठान नहीं करते उनकी शिक्षाके निमित्तही नरकोंकी कल्पना की है जिनकी वार्तामात्रके श्रवणसे उनको भय प्राप्त होगा ॥ २४ ॥ जो वेदधर्मको छोड़कर दूसरे धर्मोंका आश्रय करते हैं राजाको उन अधर्मियोंको अपने देशसे निकलवा देना चाहिये॥२५॥ब्राह्मणोंको उनके साथ संभाषण न करना चाहिये और उनको ब्रह्मभो जनकी पंक्तिमें ग्रहण न करना चाहिये इस लोकमें जो औरभी अनेकप्रकारके शास्त्र हैं॥ ॥ २६ ॥ उनमें जो श्रुति स्मृति विरुद्ध हैं वे सब तामसी हैं यदि कहो कि, फिर शिवने तंत्र क्यों बनाये इसपर कहते हैं वाम, कापालक, कौल, भैरवागम ॥ २७॥ जो पापी होकर वेदध- र्माचरण करतेहैं अर्थात् जब पापियोंकी वेदधर्माचरणसे सङ्गति होगी तो कर्मकी विचित्र ताके अभावसे प्रपंच विचित्र न होगा इसप्रकार उनको अनेक फल दिखाकर उनकी प्रवृ- त्ति को मोहितकर वेदसे श्रद्धा च्यावित करनेको शिवजीने मोहनार्थ तंत्र निर्माण किये हैं कारण कि, पापी होनेसे वेदका अधिकार नहीं रहता इससे वे पापका फल.