देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५७ सप्तमस्कंध-अ० ३९. (७६५) एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ३९. हिमालय बोले हे महेश्वरि ! देवदेवि ! महेशानि ! करुणासागर ! जगदम्बा ! अब भलीप्रकार अपने पूजाविधानको कहिये ॥ १ ॥ श्रीदेवी बोलीं हे राजन् ! मैं अपनी प्रियकर पूजाविधि कहती हूं हे पर्वतश्रेष्ठ ! तुम अतिशय श्रद्धापूर्वक श्रवण करो ॥ ॥ २ ॥ बाह्य अभ्यान्तरके भेदसे मेरी पूजा दोप्रकारकी है उसमें बाह्यभी वैदिक और तांत्रिक भेदसे दोप्रकारकी है ॥ ३ ॥ हे भूधर ! वैदिकपूजाभी मूर्ति भेदसे दोप्रकारकी है, उसमें विराट्रूपसे देवीका ध्यानरूप पहली पूजा और करचरणा- दियुक्त देवीकी मूर्तिके ध्यानकर वैदिकमंत्रोंसे देवीका आवाहन और विसर्जन करना यह दूसरी पूजा है इनमें वैदिकमंत्रमें दीक्षित पुरुषको वेदविधिके अनुसार वैदिकी पूजा ॥ ४ ॥ और तंत्रमार्गमें दीक्षित पुरुषको तंत्रोक्त विधिसे पूजा करनी चाहिये. जो मूढ इस प्रकार पूजारहस्य न जानकर वैदिक तांत्रिक रीतिसे और तांत्रिकदीक्षावाले वैदिकीरीतिसे पूजा करै तो ॥ ५॥ इस विपरीतभावके कारण वह मूढ पतित होता है अब प्रथम वैदिकी पूजाका विषय वर्णन करती हूं ॥ ६ ॥ हे भूधर ! जो तुमने मेरे साक्षात् पररूपका दर्शन किया है जिसमें अनन्तशिर अनन्तनेत्र अनन्त चरण हैं ॥७ ॥ जो सब शक्तिसे युक्त प्रेरक परात्पर है उसीका निरन्तर पूजन करै, इसीका नमस्कार ध्यान और स्मरण करै ॥८॥ हे नगराज ! यही प्रथम वैदिकी पूजाका स्वरूप है यह पूजा शान्त, सावधानमन, दंभ अहंकारहीन होकर करनी चाहिये ॥ ९ ॥ उसीमें तत्पर उसीका यजन और उसीकी शरण हो उसीको चित्तसे देखकर सदा जप ध्यान करो ॥ १० ॥ अनन्यप्रेमभक्तिसे मेरे भावको आश्रित हो यज्ञोंसे मेरा यजन और तप दानसे मुझ विराट्रूपकोही सन्तुष्ट करो ॥ ११ ॥ इस प्रकार करते हुए मेरे अनुग्रहसे संसारबंधनसे मुक्त होगे मुझमें तत्पर और मुझमें आसक्त चित्त भक्तश्रेष्ठ कहे हैं ॥ १२ ॥ यह मेरी प्रतिज्ञा है ऐसे भक्तोंको मैं बहुत शीघ्र उद्धार करदेती हूं हे गिरिराज ! कर्मयुक्त ध्यानयोग, अथवा भक्तिमिश्रित ज्ञानयोगसेही ॥ १३ ॥ मैं प्राप्त होसकती हूं. केवल कर्मसेही कोई मुझे प्राप्त नहीं करसकता धर्मसे भक्ति और भक्तिसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥ श्रुतिस्मृतिमें प्रतिपादन किये कर्मकोही धर्म कहते हैं श्रुतिस्मृतिके विपरीत अन्य शा- स्त्रोंका कहाहुआ धर्म यथार्थ धर्म नहीं किन्तु धर्माभास है ॥ १५ ॥ सर्वज्ञ और