देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगतिको प्राप्त होते हैं. हे सुव्रत ! अब तुमसे व्रतोंको कहती हूं ॥ ३६॥ नरनारियोंको यत्नपूर्वक व्रतानुष्ठान करना चाहिये अनन्तर तृतीयाव्रत, रसकल्याणीव्रत ॥ ३७॥ आर्द्रानन्दकरव्रत यह तृतीयाके व्रत हैं शुक्रवारका व्रत कृष्णचतुर्दशीका व्रत ॥ ३८ ॥ भौमवारव्रत प्रदोषव्रतं यह चारप्रकारके व्रत हैं इन व्रत और प्रदोषसमय देवदेव महादेव देवीको आसनमें बैठाय ॥ ३९ ॥ देवताओंके सहित देवीके सन्मुख नृत्य करतेहैं इन व्रतोंमें उपवास कर प्रदोषके समय मंगलमयी शिवाका पूजन करें ॥ ४० ॥ और जो प्रति पखवारेमें ऐसा करताहै उसपर देवी अधिक प्रसन्न होतीहै हे नग ! सोमवारका व्रत मुझको अतिप्रिय है ॥ ४१ ॥ उसमेंभी देवीको पूजनकर रात्रिमें भोजन करें दोनों नवरात्रियोंमें व्रत मेरा प्रसन्न करनेवाला है ॥ ४२ ॥ इस- प्रकारसे और भी जो मत्सर हीन होकर मेरी प्रीतिके निमित्त नित्यनैमित्तिक व्रत करता है वह वे उपांगकलितादि व्रत हैं ॥ ४३ ॥ इनके करनेसे मेरी सायुज्य मिलती है वह मेरा भक्त और मुझे प्रियहै फिर चैत्र शुक्ल तीजको दोला उत्सव करै शंकर सहित देवीकी कुंकुम, अगर, कपूर, मणि, वस्त्र, सुगंध, माला, धूप, दीपादिसे पूजाकर झुलावै इत्यादि और भी उत्सव करें ॥ ४४ ॥ आषाढपूर्णिमाको शयनोत्सव वा इसके आगेकी तीज कार्त्तिक पूर्णिमाको जागरणोत्सव, आषाढ शुक्लतृतीयाको रथोत्सव करै इसमें पृथ्वीको रथ, चन्द्रसूर्य्यको चक्र वेदोंको अश्व ब्रह्माको सारथि माने अनेक मणियोंसे जटिल फूलमालायुक्त रथकी कल्पना कर उसमें शिवाको बैठावै और लोकोंकी रक्षा तथा लोकोंके देखनेको अम्बा रथपर चढी हैं यह भावना करे रथके चलनेमें शत २ जय शब्द करै. हे भगवती ! हम दीन जनोंकी रक्षा करो. इसप्रकार स्तोत्र पढ बाजे बजाय सीमाके समीप रथ लेजाय पूजा करै. फिर घर लावै उमा संहिता (शिवपुराण) में यह कथा वर्णन की है. चैत्रपूर्णिमामें दमनोत्सव ॥ ४५ ॥ श्रावणपूर्णिमाको पवित्रोत्सव मेरा प्रियकारक है, इसप्रकार मेरे भक्त दूसरे उत्सवोंकोभी सदा करें ॥ ४६ ॥ प्रीतिसे मेरे भक्त सुवासिनी कुमारी और बटुकोंको मेरा स्वरूप जानकर तद्गतचित्त हो भोजन करावे ॥ ४७ ॥ वित्तशाठ्य कृपणता छोडकर कुसुमादिद्वारा इनकी पूजा करै जो सावधान हो प्रतिवर्ष भक्तिसे ऐसा करता है ॥ ४८ ॥ वह धन्य कृतकृत्य और मेरी प्रीतिका पात्र है इसमें सन्देह नहीं. यह अपनी प्रियकर वस्तुओंका संक्षेपसे वर्णन किया ॥ ४९ ॥ यह वार्त्ता अशेष्य और अभक्तको कभी न देनी चाहिये ॥ ५० ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥