भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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१६५ सप्तमस्कन्ध-अ० ३८. (७६३) योनिमंडल गिराहै, वह कामाख्या योनिमंडल त्रिपुरभैरवीका महास्थान है भूमण्डलमें यह क्षेत्ररत्न है इसकारण ऐसा दूसरा स्थान नहीं है ॥ १५ ॥ इससे अधिक पृथ्वीमें ऐसा कोई स्थान नहीं है इस स्थानमें महामाया प्रत्येक मासमें रजस्वला होती है ॥ १६ ॥ यहांके सब देवता पर्वतभावको प्राप्त हो वहां निवास करते हैं ॥ १७ ॥ वहांकी सब पृथिवी देवीरूप है ऐसा पंडित कहते हैं. इस कामाख्या योनि- मण्डलसे श्रेष्ठ दूसरा स्थान नहीं है ॥ १८ ॥ पुष्करक्षेत्र गायत्रीका परम स्थान है अमरेशमें चण्डिका और प्रभासमें पुष्करेक्षिणी निवास करती हैं ॥ १९ ॥ नैमिषमहा- स्थानमें लिंगधारिणी देवी, पुष्कराक्षमें पुरहूता और आषाढी स्थानमें रति निवास करतीहैं॥ २०॥ चण्डमुण्डके महास्थानमें दण्डिनी, परमेश्वरी, भारभूतिस्थानमें भूति नकुलस्थानमें नकुलेश्वरी निवासकरतीहैं॥ २१॥ हरिश्चन्द्रस्थानमें चन्द्रिका, श्रीपर्वतमें शांकरी जप्येश्वरमें त्रिशुला और आम्रातकेश्वरमें सूक्ष्मा निवास करती हैं ॥ २२ ॥ उज्जैनीमें शांकरी मध्यमेेश्वरमें शर्वाणी केदार महाक्षेत्रमें प्रसिद्धमार्गदायिनी ॥ २३ ॥ भैरवस्थानमें भैरवी गयामें मंगला कुरुक्षेत्रमें स्थाणुप्रिया नाकुलमें स्वाय- म्भुवी ॥ २४ ॥ कनखलमें उग्रा विमलेश्वरमें विश्वेशा अट्टहासमें महानन्दा महेन्द्र पर्वतमें महान्तका ॥ २५ ॥ भीम स्थानमें भीमेश्वरी वस्त्रापथमें भवानी शांकरी अर्धकोटिस्थानमें रुद्राणी ॥ २६ ॥ अविमुक्त स्थानमें विशालाक्षी महालयमें महाभागा गोकर्णमें भद्रकर्णी भद्रकर्णमें भद्रा ॥ २७ ॥ सुवर्णारूप्य स्थानमें उत्पलाक्षी स्थाणुस्थानमें स्थाण्वीशा, कमलालयेमें कमला छगलंडस्थान [ दक्षिण देशमें समु- द्रके निकट है ] में प्रचण्डा ॥ २८ ॥ कुरण्डमें त्रिसंध्या माकोटमें मुकुटेश्वरी मण्डलेशमें शाण्डकी कालंजरेमें काली ॥ २९ ॥ शंकुकर्णमें ध्वनि स्थूलकेश्वरमें स्थूला और ज्ञानियोंके हृदयकमलमें परमेश्वरी देवी हृल्लेखा प्राणशक्ति रूपसे निवास करती हैं ॥ ३० ॥ हे नगेश्वर ! यह सब स्थान देवीके प्रिय हैं उन उनक्षेत्रोंका माहात्म्य सुनकर ॥ ३१ ॥ उसमें कहीं विधिके अनुसार देवीकी पूजा कर. हे नगोत्तम ! अथवा सब पुण्यक्षेत्र काशीमें विद्यमान हैं ॥ ३२ ॥ देवीकी भक्तिमें तत्पर मनुष्य नित्य काशीमें निवास करै उन स्थानोंको देख- ताहुआ निरन्तर देवीका जप करै ॥ ३३ ॥ और भगवतीके चरणकमलका ध्यान करताहुआ भवबंधनसे छूटजाता है. यह देवीके नाम जो प्रभातकाल उठकर पढताहै ॥ ३४ ॥ हे नगसत्तम ! उसीसमय उसके पाप नष्ट होजाते हैं और ब्राह्मणोंके समीप श्राद्धकालमें जो निर्मल नाम पढता है ॥ ३५ ॥ उसके सब पितर मुक्त होकर पर-