धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६।५ ] पियवग्गो [ ९७ अनुवाद—अयोग(=अनासक्ति) में अपनेको लगानेवाले, योग (=आसक्ति) में न योग देनेवाले, अर्थ (=स्वार्थ) छोड प्रियका ग्रहण करनेवाले आत्माऽनुयोगी (पुरुष) की स्पृहा करे । प्रियोंका संग मत करो, और न कभी अप्रियों ही (का संग करो), प्रियोका न देखना दुःखद् होता है, और अप्रियोंका देखना (भी)। इसलिये प्रिय न बनावे, प्रियका नाश बुरा (लगता है); उनके (दिलमें) गाँठ नहीं पडती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते । जेतवन कोई कुटुम्बी २१२-पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं । पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥४॥ (प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् । प्रियतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?॥४॥) अनुवाद—प्रिय (वस्तु) से शोक उत्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न होता है; प्रिय(के बन्धन) से जो मुक्त है, उसे शोक नहीं है, फिर भय कहाँसे (हो) ? जेतवन विशाखा (उपासिका) २१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं । पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥५॥ (प्रेम्तो जायते शोकः प्रेम्तो जायते भयम् । प्रेम्तो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ?॥५॥ ७