धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८।१९ ] मलवग्गो [ ११६ जेतवन पाँच उपासक २५१-नत्थि रागसमो अग्गि नत्थि दोससमो गहो । नत्थि मोहसमं जालं नत्थि तणहासमा नदी ॥१७॥ ( नास्ति रागसमोऽग्निः नाऽस्ति द्वेषसमो ग्राहः । नाऽस्ति मोहसमं जालं, नाऽस्ति तृष्णा समा नदी ॥१७॥ ) अनुवाद—रागके समान आग नहीं, द्वेषके समान ग्रह (=भूत, चुडैल ) नहीं; मोहके समान जाल नहीं, तृष्णाके समान नदी नहीं । भद्दियनगर ( जातियावन ) मेण्डक ( श्रेष्ठी ) २५२-सुदस्सं वज्जमञ्ञेसं अत्तनो पन दुद्दसं । परेसं हि सो वज्जानि ओपुणाति यथाभुसं । अत्तनो पन छादेति कलिं'व कितवा सठो ॥१८॥ ( सुदर्शं वद्यमन्येषां आत्मनः पुनर्दुर्दर्शम् । परेषां हि स वद्यानि अवपुणाति यथातुषम् । आत्मनः पुनः छादयति कलिमिव कितवान् शठः ॥१८॥ ) अनुवाद—दूसरेका दोष देखना आसान है, किन्तु अपना (दोष) देखना कठिन है, वह ( पुरुष ) दूसरोंके ही दोषोंको भुसकी भाँति उड़ाता फिरता है, किन्तु अपने (दोषों) को वैसे ही ढाँकता है, जैसे शठ जुआरीसे पासेको । जेतवन उज्झानसञ्ञी ( थेर ) २५३-परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो । आसवा तस्स वड्ढन्ति आरा स आसवक्खया ॥१६॥ ८