धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ ] धम्मपदं [ १८४।१६ जो पुरुष मद्यपानमें लग्न होता है, वह इस प्रकार इसी लोकमें अपनी जड़को खोदता है । हे पुरुष ! पापियों असंयमियोंके बारेमें ऐसा जान, और मत तुझे लोभ, अधर्म चिरकाल तक दुःखमें राँधे । जेतवन तिस्स ( बालक ) २४६-ददन्ति वे यथासद्धं यथापसादनं जनो । तत्य यो मंकु भवति परेसं पानभोजने । न सो दिवा वा रत्तिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥१५॥ ( ददाति वै यथाश्रद्धं यथाप्रसादनं जनः । तत्र यो मूको भवति परेषां पानभोजने । न स दिवा वा रात्रौवा समाधिमधिगच्छति ॥१५॥ ) २५०-यस्स च तं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं । स वे दिवा वा रत्तिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥१६॥ ( यस्य च तत् समुच्छिन्नं मूलघातं समुद्धतम् । स वै दिवा रात्रौ वा समाधिं अधिगच्छति ॥१६॥ ) अनुवाद—लोग अपनी अपनी श्रद्धा और प्रसन्नताके अनुसार दान देते हैं, वहाँ दूसरोंके खाने पीनेमें जो ( असन्तोषके कारण ) मूक होता है; वह रात दिन ( कभी भी ) समाधानको नहीं प्राप्त करता । ( किन्तु ) जिसका वह जड़ मूलसे पूरी तरह उच्छिन्न हो गया, वह रात दिन (सर्वदा) समाधानको प्राप्त होता है ।