धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
११२ ] धम्मपदं [ १८४।१६ जो पुरुष मद्यपानमें लग्न होता है, वह इस प्रकार इसी लोकमें अपनी जड़को खोदता है । हे पुरुष ! पापियों असंयमियोंके बारेमें ऐसा जान, और मत तुझे लोभ, अधर्म चिरकाल तक दुःखमें राँधे । जेतवन तिस्स ( बालक ) २४६-ददन्ति वे यथासद्धं यथापसादनं जनो । तत्य यो मंकु भवति परेसं पानभोजने । न सो दिवा वा रत्तिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥१५॥ ( ददाति वै यथाश्रद्धं यथाप्रसादनं जनः । तत्र यो मूको भवति परेषां पानभोजने । न स दिवा वा रात्रौवा समाधिमधिगच्छति ॥१५॥ ) २५०-यस्स च तं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं । स वे दिवा वा रत्तिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥१६॥ ( यस्य च तत् समुच्छिन्नं मूलघातं समुद्धतम् । स वै दिवा रात्रौ वा समाधिं अधिगच्छति ॥१६॥ ) अनुवाद—लोग अपनी अपनी श्रद्धा और प्रसन्नताके अनुसार दान देते हैं, वहाँ दूसरोंके खाने पीनेमें जो ( असन्तोषके कारण ) मूक होता है; वह रात दिन ( कभी भी ) समाधानको नहीं प्राप्त करता । ( किन्तु ) जिसका वह जड़ मूलसे पूरी तरह उच्छिन्न हो गया, वह रात दिन (सर्वदा) समाधानको प्राप्त होता है ।
१८।१९ ] मलवग्गो [ ११६ जेतवन पाँच उपासक २५१-नत्थि रागसमो अग्गि नत्थि दोससमो गहो । नत्थि मोहसमं जालं नत्थि तणहासमा नदी ॥१७॥ ( नास्ति रागसमोऽग्निः नाऽस्ति द्वेषसमो ग्राहः । नाऽस्ति मोहसमं जालं, नाऽस्ति तृष्णा समा नदी ॥१७॥ ) अनुवाद—रागके समान आग नहीं, द्वेषके समान ग्रह (=भूत, चुडैल ) नहीं; मोहके समान जाल नहीं, तृष्णाके समान नदी नहीं । भद्दियनगर ( जातियावन ) मेण्डक ( श्रेष्ठी ) २५२-सुदस्सं वज्जमञ्ञेसं अत्तनो पन दुद्दसं । परेसं हि सो वज्जानि ओपुणाति यथाभुसं । अत्तनो पन छादेति कलिं'व कितवा सठो ॥१८॥ ( सुदर्शं वद्यमन्येषां आत्मनः पुनर्दुर्दर्शम् । परेषां हि स वद्यानि अवपुणाति यथातुषम् । आत्मनः पुनः छादयति कलिमिव कितवान् शठः ॥१८॥ ) अनुवाद—दूसरेका दोष देखना आसान है, किन्तु अपना (दोष) देखना कठिन है, वह ( पुरुष ) दूसरोंके ही दोषोंको भुसकी भाँति उड़ाता फिरता है, किन्तु अपने (दोषों) को वैसे ही ढाँकता है, जैसे शठ जुआरीसे पासेको । जेतवन उज्झानसञ्ञी ( थेर ) २५३-परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो । आसवा तस्स वड्ढन्ति आरा स आसवक्खया ॥१६॥ ८
११४ ] धम्मपद [ १८।२१ ( परवद्याऽनुदर्शिनो नित्यं उज्झ्यानसंज्ञिनः । आस्रवास्तस्य बर्द्धन्ते आराद् स आस्रवक्षयात् ॥१९॥ ) अनुवाद—दूसरेके दोषोकी खोजमें रहनेवाले, सदा हाय हाय करने वाले ( पुरुष )के आस्रव ( =चित्तमल ) बढ़ते हैं, वह आस्रवोंके विनाशसे दूर हटा हुआ है। कुशीनगर सुभद्र (परिव्राजक) २५४-आकासे च पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे । पपञ्चाभिरता पजा निप्पपञ्चा तथागता ॥२०॥ ( आकाशे च पदं नाऽस्ति श्रमणो नाऽस्ति बहिः । प्रपंचाऽभिरताः प्रजा निष्प्रपंचास्तथागताः ॥२०॥ ) २५५-आकासे च पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे । सङ्खारा सस्सता नत्थि, नत्थि बुद्धानमिञ्जितं ॥ २१॥ ( आकाशे च पदं नाऽस्ति श्रमणो नाऽस्ति बहिः । संस्काराः शाश्वता न सन्ति, नाऽस्ति बुद्धानामिङ्गितम् ॥२१॥) अनुवाद—आकाशमें पद (-चिन्ह) नहीं, बाहरमें श्रमण (=संन्यासी) नहीं रहता, लोग प्रपंचमें लगे रहते हैं, (किन्तु) तथा- गत (=बुद्ध) प्रपंचरहित होते हैं। १८-मलवर्ग समाप्त
१९—धम्मट्ठवग्गो जेतवन विनिच्छयमहामच्च (=जज ) २५६-न तेन होति धम्मट्ठो येनत्थं सहसा नये । यो च अत्थं अनत्थञ्च उभो निच्छेय्य पण्डितो ॥१॥ ( न तेन भवति धर्मस्थो येनार्थं सहसा नयेत् । यश्चाऽर्थं अनर्थं च उभौ निश्चिनुयात् पंडितः ॥१॥ ) २५७-असाहसेन धम्मेन समेन नयती परे । धम्मस्स गुत्तो मेधावी धम्मट्ठो'ति पवुच्चति ॥२॥ (असाहसेन धर्मेण समेन नयते परान् । धर्मेण गुप्तो मेधावी धर्मस्थ इत्युच्यते ॥२॥ ) अनुवाद—सहसा जो अर्थ (=कामकी वस्तु )को करता है, वह धर्ममें अवस्थित नहीं कहा जाता, पंडितको चाहिये कि वह अर्थ, अनर्थ दोनों को विचार ( करके ) करे । [ ११५
१६. पियवग्गो (प्रिय वर्ग)
११६ ] धम्मपदं [ १९।५ जेतवन वज्जिय ( भिक्खु ) २५८–न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति । खेमी अवेरी अभयो पण्डितो'ति पवुच्चति ॥३॥ ( न तावता पंडितो भवति यावता बहु भाषते । क्षेमी अवैरी अभयः पंडित इत्युच्यते ॥३॥ ) 'अनुवाद—बहुत भाषण करनेसे पंडित नहीं होता । जो क्षेमवान् अवैरी और अभय होता है, वही पंडित कहा जाता है । जेतवन एकुद्दान ( थेर ) २५६–न तावता धम्मधरो यावता बहु भासति । यो च अप्पम्पि सुत्वान धम्मं कायेन पस्सति । स वे धम्मधरो होति यो धम्मं नप्पमज्जति ॥४॥ ( न तावता धर्मधरो यावता बहु भाषते । यश्चाल्पमपि श्रुत्वा धर्मं कायेन पश्यति । स वै धर्मधरो भवति यो धर्मं न प्रमाद्यति ॥४॥ ) अनुवाद—बहुत बोलनेसे धर्मधर (=धार्मिक ग्रंथोका ज्ञाता ) नहीं होता, जो थोड़ा भी सुनकर शरीरसे धर्मका आचरण करता है, और जो धर्ममें असावधानी (=प्रमाद ) नहीं करता, वही धर्मधर है । जेतवन लकुण्टक भदिय ( थेर ) २६०–न तेन थेरो होति येन'स्स पलितं सिरो । परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो'ति वुच्चति ॥५॥
१९।८ ] धम्मट्ठवग्गो [ ११७ ( न तेन स्थविरो भवति येनाऽस्य पलितं शिरः । परिपक्कं वयस्तस्य मोघजीर्ण इत्युच्यते ॥५॥ ) अनुवाद—शिरके ( बालके ) पकनेसे थे (=स्थविर, वृद्ध ) नहीं होता, उसकी आयु परिपक्व हो गई ( सही ), ( किन्तु ) वह व्यर्थका वृद्ध कहा जाता है । जेतवन लकुण्टक भद्दिय ( थेर ) २६१—यम्हि सच्चञ्च धम्मो च अहिंसा सञ्जमो दमो । स वे वन्तमलो धीरो थेरो 'ति पवुच्चति ॥६॥ ( यस्मिन् सत्यं च धर्मश्चाहिंसा संयमो दमः । स वै वान्तमलो धीरः स्थविर इत्युच्यते ॥६॥ ) अनुवाद—जिसमें सत्य, धर्म, अहिंसा, संयम और दम हैं, वही विगतमल, धीर और स्थविर कहा जाता है । जेतवन कितने ही भिक्षु २६२—न वाक्करणमत्तेन वण्णपोक्खरताय वा । साधुरूपो नरो होति इस्सुकी मच्छरी सठो ॥७॥ ( न वाक्करणमात्रेण वर्णपुष्कलतया वा । साधुरूपो नरो भवति ईर्षुर्को मत्सरी शठः ॥७॥ ) २६३—यस्स चेतं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं । स वन्तदोसो मेधावी साधुरूपो 'ति वुच्चति ॥८॥ ( यस्य चैतत् समुच्छिन्नं मूलघातं समुद्घातम् । स वान्तदोषो मेधावी साधुरूप इत्युच्यते ॥८॥ )
११८ ] धम्मपदं [ १९।११ अनुवाद—( यदि वह ) ईर्ष्यालु, मत्सरी और शठ है; तो, वक्ता होने मात्रसे, सुन्दर रूप होनेसे, आदमी साधु-रूप नहीं होता है। जिसके यह जड़मूलसे बिलकुल उच्छिन्न हो गये हैं; जो विगतदोष, मेधावी है, वही साधु-रूप कहा जाता है। जेतवन हत्थक ( भिक्षु ) २६४-न मुण्डकेन समणो अब्बतो अलिकं भणं । इच्छालाभसमापन्नो समणो किं भविस्सति ॥६॥ ( न मुंडकेन श्रमणो ऽव्रतोऽलीकं भणन् । इच्छालाभसमापन्नः श्रमणः किं भविष्यति ॥९॥ ) २६५-यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सब्बसो । समितत्ता हि पापानं समणो'ति पवुच्चति ॥१०॥ ( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूलानि सर्वशः । शमितत्वाद्वि पापानां श्रमण इत्युच्यते ॥१०॥ ) अनुवाद—जो व्रतरहित, मिथ्याभाषी है, वह मुण्डित होने मात्र से श्रमण नहीं होता । इच्छा लाभसे भरा ( पुरुष ), क्या श्रमण होगा ? जो छोटे बड़े पापोंको सर्वथा शमन करनेवाला है, पापको शमित होनेके कारण वह समण (=श्रमण ) कहा जाता है । जेतवन कोई ब्राह्मण २६६-न तेन भिक्खू [सो] होति यावता भिक्खते परे । विस्सं धम्मं समादाय भिक्खू होति न तावता ॥११॥
१९।१४ ] धम्मट्ठवग्गो [ १११ ( न तावता भिक्षुः [स] भवति यावता भिक्षते परान् । विश्वं धर्मं समादाय भिक्षुर्भवति न तावता ॥११॥ ) अनुवाद—दूसरोंके पास जाकर भिक्षा माँगने मात्रसे भिक्षु नहीं होता, ( जो ) सारे ( बुरे ) धर्मों (=कामों )को ग्रहण करता है ( वह ) भिक्षु नहीं होता । जेतवन कोई ब्राह्मण २६७-यो'ध पुञ्जञ्च पापञ्च बाहित्वा ब्रह्मचरियवा । सङ्ख्वाय लोके चरति स वे भिक्खू'ति वुच्चति ॥१२॥ ( य इह पुण्यं च पापं च वाहयित्वा ब्रह्मचर्यवान् । संख्याय लोके चरित स वै भिक्षुरित्युच्यते ॥१२॥ ) अनुवाद—जो यहाँ पुण्य और पापको छोड़ ब्रह्मचारी बन, ज्ञानके साथ लोकमें विचरता है, वह भिक्षु कहा जाता है । जेतवन तीर्थिक २६८-न मोनेन मुनी होति मूळ्हरूपो अविद्दसु । यो च तुलं 'व पग्गय्ह वरमादाय पण्डितो ॥१३॥ ( न मौनेन मुनिर्भवति मूढरूपोऽविद्वान् । यश्च तुलामिव प्रगृह्य वरमादाय पंडितः ॥१३॥ ) २६९-पापानि परिवज्जेति स मुनी तेन सो मुनि । यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुच्चति ॥१४॥ ( पापानि परिवर्जयति स मुनिस्तेन स मुनिः । यो मनुत उभौ लोकौ मुनिस्तेन प्रोच्यते ॥१४॥ )
१२० ] धम्मपद [ १९।१७ अनुवाद—अविद्वान् और मूढ़समान ( पुरुष, सिर्फ ) मौन होनेसे मुनि नहीं होता, जो पंडित कि तुलाकी भाँति पकड़कर, उत्तम (तत्त्व ) को ग्रहण कर, पापोंका परित्याग करता है, वह मुनि है, और उक्त प्रकारसे मुनि होता है। चूंकि वह दोनों लोकोंका मनन करता है, इसलिये वह मुनि कहा जाता है। जेतवन अरिय बाळिसिक २७०—न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति । अहिंसा सब्बपाणानं अरियो'ति पवुच्चति ॥१५॥ ( न तेनाऽऽर्यो भवति येन प्राणान् हिनस्ति । अहिंसया सर्वप्राणानां आर्य इति प्रोच्यते ॥१५॥ ) अनुवाद—प्राणियोंको हनन करनेसे ( कोई ) आर्य नहीं होता, सभी प्राणियोंकी हिंसा न करनेसे ( उसे ) आर्य कहा जाता है। जेतवन बहुतसे शील-आदि-युक्त भिक्षु २७१-न सीलब्बतमत्तेन बाहुसच्चेन वा पन । अथवा समाधिलाभेन विविच्चसयनेन वा ॥१६॥ ( न शीलव्रतमात्रेण बाहुश्रुत्येन वा पुनः । अथवा समाधिलाभेन विविच्य शयनेन वा ॥१६॥ ) २७२-फुसामि नेक्खम्मसुखं अपुथुज्जनसेवितं । भिक्खू ! विस्सासमापादि अप्पत्तो आसवक्खयं ॥ १७॥
१९।१७ ] धम्मट्ठवग्गो [ १२१ (स्पृशामि नैष्कर्म्यसुखं अपृथग्जनसेवितम् । भिक्षो ! विश्वासं मा पादीः अप्राप्त आस्रवक्षयम् ॥१७॥ ) अनुवाद—केवल शील और व्रतसे, बहुश्रुत होने (मात्र) से, या (केवल) समाधिलाभसे, या एकान्तमें शयन करनेसे, पृथग्जन (=अज्ञ) जिसे नहीं सेवन कर सकते, उस नैष्कर्म्य (=निर्वाण)-सुखको मैं अनुभव नहीं कर रहा हूँ; हे भिक्षुओ ! जब तक आस्रवों (=चित्तमलो) का क्षय न हो जाये, जब तक चुप न बैठे रहो । १९—धर्मस्थवर्ग समाप्त
१७. कोधवग्गो (क्रोध वर्ग)
२०—मग्गवग्गो जेतवन पाँच सौ भिक्षु २७३-मग्गानट्ठङ्गिको सेट्ठो सच्चानं चतुरो पदा । विरागो सेट्ठो धम्मानं द्विपदानञ्च चक्खुमा ॥१॥ ( मार्गाणामष्टांगिकः श्रेष्ठः सत्यानां चत्वारि पदानि । विरागः श्रेष्ठो धर्माणां द्विपदानां च चक्षुष्मान् ॥१॥ ) २७४-एसो'व मग्गो नत्थ'ञ्ञो दस्सनस्स विसुद्धिया । एतं हि तुम्हे पटिपज्जथ मारस्सेतं पमोहनं ॥२॥ ( एष वो मार्गो नाऽस्त्यन्यो दर्शनस्य विशुद्धये । एतं हि यूयं प्रतिपद्यध्वं मारस्यैष प्रमोहनः ॥२॥ ) अनुवाद—मार्गोंमें अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है, सत्योंमें चार पद (=चार आर्यसत्य ) श्रेष्ठ हैं, धर्मोंमें वैराग्य श्रेष्ठ है, द्विपदों (=मनुष्यों )में चक्षुष्मान् (=ज्ञाननेत्रधारी, बुद्ध ) श्रेष्ठ हैं। दर्शन (=ज्ञान )की विशुद्धिके लिये यही मार्ग है, दूसरा नहीं; ( भिक्षुओ !) इसीपर तुम आरूढ होओ, यही मारको मूर्छित करने वाला है । १२२ ]
२०।५ ] मग्गवग्गो [ १२३ जेतवन पाँच सौ भिक्षु २७५-एतं हि तुम्हे पटिपन्ना दुक्खस्सन्तं करिस्सथ । अक्खातो वे मया मग्गो अञ्ञाय सल्लसन्थनं ॥३॥ ( एतं हि यूयं प्रतिपन्ना दुःखस्यान्तं करिष्यथ । आख्यातो वै मया मार्ग आज्ञाय शल्य-संस्थानम् ॥३॥ ) २७६-तुम्हेहि किच्चं आतप्पं अक्खातारो तथागता । पटिपन्ना पमोक्खन्ति झायिनो मारबन्धना ॥४॥ ( युष्माभिः कार्यं आतप्यं आख्यातारस्तथागताः । प्रतिपन्नाः प्रमोक्ष्यन्ते ध्यायिनो मारबन्धनात् ॥४॥ ) अनुवाद—इस (मार्ग) पर आरूढ हो तुम दुःखका अन्त कर सकोगे, (स्वयं) जानकर (राग आदिके विनाशमें) शल्य समान मार्गको मैंने उपदेश कर दिया । कार्यके लिए तुम्हें उद्योग करना है, तथागतों (=बुद्धों) का कार्य उपदेश कर देना है, (तदनुसार मार्गपर) आरूढ हो, ध्यानमें रत पुरुष) मारके बन्धनसे मुक्त हो जायेंगे । जेतवन पाँच सौ भिक्षु [ अनित्य-लक्षणम् ] २७७-सब्बे सङ्खारा अनिच्चा 'ति यदा पञ्ञाय पस्सति । अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया ॥५॥ ( सर्वे संस्कारा अनित्या इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्बिन्दति दुःखानि, एष मार्गो विशुद्धये ॥ ५॥
१२५ ] धम्मपदं [ २०।८ ────────────────────────────────────────── अनुवाद—सभी संस्कृत (=कृत, निर्मित, बनी) चीज़ें अनित्य हैं, यह जब प्रज्ञासे देखता है, तब सभी दुःखोंसे निर्वेद (=विराग) को प्राप्त होता है, यही मार्ग (चित्त-) शुद्धिका है। [ दुःख-लक्षणम् ] २७८—सब्बे सङ्खारा दुक्खा 'ति यदा पञ्ञाय पस्सति । अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया ॥६॥ ( सर्वे संस्कारा दुःखा इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुःखानि, एष मार्गो विशुद्धये ॥ ६ ॥) अनुवाद—सभी संस्कृत (चीजें) दुःखमय हैं ० । [ अनात्म-लक्षणम् ] २७९—सब्बे धम्मा अनत्ता 'ति यदा पञ्ञाय पस्सति । अथ निब्बिन्दति दुक्खे एस मग्गो विसुद्धिया ॥७॥ ( सर्वे धर्मा अनात्मान इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुःखानि एष मार्गो विशुद्धये ॥ ७ ॥) अनुवाद—सभी धर्म (=पदार्थ) बिना आत्माके हैं, ० । जेतवन (योगी) तिस्स (थेर) २८०—उट्ठानकालम्हि अनुट्ठहानो युवा बली आलसियं उपेतो। संसन्नसङ्कप्पमनो कुसीतो पञ्ञाय मग्गं अलसो न विन्दति॥८॥
२०१ ] मग्गवग्गो [ १२५ (उत्थानकालेऽनुत्तिष्ठन् युवा बली आलस्यमुपेतः । संसन्न-संकल्प-मनाः कुसीदः प्रज्ञया मार्गं अलसो न विन्दति ॥ ८ ॥ ) अनुवाद—जो उत्थान (=उद्योग) के समय उत्थान न करनेवाला, युवा और बली होकर (भी) आलस्यसे युक्त होता है, मनके संकल्पोको जिसने गिरा दिया है, और जो कुसीदी (=दीर्घसूत्री) है, वह आलसी (पुरुष) प्रज्ञाके मार्गको नहीं प्राप्त कर सकता। राजगृह (वेणुवन) (शुकर-प्रेत) २८१-वाचानुरक्खी मनसा सुसंवुतो कायेन च अकुसलं न कयिरा। एते तयो कम्मपथे विसोधये आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं ॥६॥ (वाचाऽनुरक्षी मनसा सुसंवृतः कायेन चाऽकुशलं न कुर्यात् । एतान् त्रीन् कर्मपथान् विशोधयेत्, आराधयेत् मार्गं ऋषिप्रवेदितम् ॥ ९॥) अनुवाद—जो वाणीकी रक्षा करनेवाला, मनसे संयमी रहे, तथा कायासे पाप न करे; इन (मन, वचन, काय) तीनों कर्मपथोंकी शुद्धि करे, और ऋषि (=बुद्ध)के बतलाये धर्मका सेवन करे।
१२६ ] धम्मपदं [ २०१२ जेतवन पोठिल (थेर) २८२-योगा वे जायती भूरि अयोगा भूरिसङ्खयो । एतं द्वेधापथं ञत्वा भवाय विभवाय च । तथ'त्तानं निवेसेय्य यथा भूरि पवड्ढति ॥१०॥ (योगाद् वै जायते भूरि अयोगाद् भूरिसंक्षयः । एतं द्वेधापथं ज्ञात्वा भवाय विभवाय च । तथाऽऽत्मानं निवेशयेद् यथा भूरि प्रवर्धते ॥ १०॥) अनुवाद—(मनके) योग(=संयोग) से भूरि (=ज्ञान) उत्पन्न होता है, अयोगसे भूरिका क्षय होता है। लाभ और विनाशके इन दो प्रकारके मागौँको जानकर, अपनेको इस प्रकार रक्खे, जिससे कि भूरिकी वृद्धि होवे । जेतवन कोई वृद्ध भिक्षु २८३-वनं छिन्दथ मा रुक्खं वनतो जायती भयं । छेत्वा वनञ्च वनथञ्च निब्बाना होथ भिक्खवो । ॥११॥ (वनं छिन्धि मा वृक्षं वनतो जायते भयम् । छित्त्वा वनं च वनथं च निर्वाणा भवत भिक्षवः ॥ ११ ॥ २८४-यावं हि वनथो न छिज्जति अणुमत्तोपि नरस्स नारिसु । पटिबद्धमनो नु ताव सो वच्छो खीरपको 'व मातरि ॥१२॥ (यावद्धि वनथो न छिद्यतेऽणुमात्रोऽपि नरस्य नारीषु । प्रतिवद्धमनाः नु तावत् स वत्सः क्षीरप इव मातरि ॥ १२॥)
२०।१४ ] मग्गवग्गो [ १२७ अनुवाद—वनको काटो, वृक्षको मत, वनसे भय उत्पन्न होता है, भिक्षुओ ! वन और झाड़ीको काटकर निर्वाणको प्राप्त हो जाओ । जबतक अणुमात्र भी स्त्रीमें पुरुषकी कामना अखंडित रहती है, तबतक दूध पीनेवाला बछडा जैसे मातामें आसक्त रहता है, ( वैसे ही वह पुरुष बंधा रहता है ) । जेतवन सुवण्णकार (थेर) २८५-उच्छिन्द सिनेहमत्तनो कुमुदं सारदिकं 'व पाणिना । सन्तिमग्गमेव ब्रूहय निब्बानं सुगतेन देसितं ॥१३॥ ( उच्छिन्धि स्नेहमात्मनः कुमुदं शारदिकमिव पाणिना । शान्तिमार्गमेव बृंहय निर्वाणं सुगतेन देशितम् ॥१३॥ ) अनुवाद —हाथसे शरद्(ऋतु)के कुमुदकी भाँति, आत्मस्नेहको उच्छिन्न कर डालो, सुगत (=बुद्ध )द्वारा उपदिष्ट (इस ) शान्तिमार्ग निर्वाणका आश्रय लो । जेतवन (महाधनी वणिक् ) २८६-इध वस्सं वसिस्सामि इध हेमन्तगिम्हेसु । इति बालो विचिन्तेति अन्तरायं न बुज्झति ॥१४॥ ( इह वर्षासु वसिष्यामि इह हेमन्तग्रीष्मयोः । इति बालो विचिन्तयति, अन्तरायं न बुध्यते ॥१४॥ ) अनुवाद—यहाँ वर्षांमें बसूँगा, यहाँ हेमन्त और ग्रीष्ममें (बसूँगा) —मूढ इस प्रकार सोचता है, (और ) अन्तराय (=विघ्न ) को नहीं बूझता ।
१८. मलवग्गो (मल वर्ग)
१२८ ] धम्मपदं [ २०।१७ जेतवन किसा गोतमी (थेरी) २८७-तं पुत्तपसुसम्मतं व्यासत्तममनसं नरं । सुत्तं गामं महोधो 'व मच्चू आदाय गच्छति ॥ १५ ॥ (तं पुत्र-पशु-सम्मतं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं ग्रामं महौघ इव मृत्युरादाय गच्छति ॥१५॥) अनुवाद—सोये गाँवको जैसे बड़ी बाढ़ (बहा ले जाये), वैसेही पुत्र और पशुमें लिप्त आसक्त (-चित्त) पुरुषको मौत ले जाती है। जेतवन पटाचारा (थेरी) २८८-न सन्ति पुत्ता ताणाय न पिता नापि बन्धवा । अन्तकेनाधिपन्नस्स नत्थि ञातिसु ताणता ॥ १६॥ (न सन्ति पुत्रास्त्राणाय न पिता नाऽपि बान्धवाः । अन्तकेनाऽधिपन्नस्य नाऽस्ति ज्ञातिषु त्राणता ॥१६॥) अनुवाद—पुत्र रक्षा नहीं कर सकते, न पिता, न बन्धुलोग ही। जब मृत्यु पकड़ता है, तो ज्ञातिवाले रक्षक नहीं हो सकते। २८६-एतमत्थवसं ञत्वा पण्डितो सीलसंवुतो । निब्बान-गमनं मग्गं खिप्पमेव विसोधये ॥ १७॥ (एतमर्थवशं ज्ञात्वा पण्डितः शीलसंवृतः । निर्वाणगमनं मार्गं क्षिप्रमेव विशोधयेत् ॥१७॥) अनुवाद—इस बातको जानकर पण्डित (नर) शीलवान् हो, निर्वाण की ओर लेजानेवाले मार्ग को शीघ्र ही साफ करे । =०-*-०=
२१—पकिरणकवग्गो राजगृह ( वेणुबन ) गङ्गावरोहण २९०-मत्तासुखपरिच्चागां पस्से चे विपुलं सुखं । चजे मत्तासुखं धीरो सम्पस्सं विपुलं सुखं ॥१॥ ( मात्रासुखपरित्यागात् पश्येच्चेद् विपुलं सुखम् । त्यजेन्मात्रासुखं धीरः संपश्यन् विपुलं सुखम् ॥१॥ ) अनुवाद—थोड़ेसे सुखके परित्यागसे यदि बुद्धिमान् विपुल सुख ( का लाभ ) देखे, तो विपुल सुखका ख्याल करके थोड़ेसे सुखको छोड़ दे । जेतवन कोई पुरुष २६१-परदुक्खूपदानेन यो अत्तनो सुखमिच्छति । वेरसंसग्गसंसट्ठो वेरा सो न पमुच्चति ॥२॥ ( परदुःखोपदानेन य आत्मनः सुखमिच्छति । वैरसंसर्गसंसृष्टो वैरात् स न प्रमुच्यते ॥२॥ ) [ १२९ ९
१३० ] धम्मपदं [ २१।४ अनुवाद—दूसरेको दुःख देकर जो अपने लिये सुख चाहता है, वैरके संसर्गमें पड़कर, वह वैरसे नहीं छूटता । भद्दियनगर ( जातियावन ) भद्दिय ( भिक्षु ) २९२—यं हि किच्चं तदपविद्धं अकिच्चं पन कयिरति । उन्नलानं पमत्तानं तेसं वड्ढन्ति आसवा ॥३॥ ( यद्धि कृत्यं तद् अपविद्धं, अकृत्यं पुनः कुर्युः । उन्मलानां प्रमत्तानां तेषां वर्द्धन्त आस्रवाः ॥३॥ ) २९३—येसञ्च सुसमारद्धा निच्चं कायगता सति । अकिच्चन्ते न सेवन्ति किच्चे सातच्चकारिनो । सतानं सम्पजानानं अत्थं गच्छन्ति आसवा ॥४॥ ( येषाञ्च सुसमारब्धा नित्यं कायगता स्मृतिः । अकृत्यं ते न सेवन्ते कृत्ये सातत्यकारिणः । स्मरतां* सम्प्रजानानां अस्तं गच्छन्त्यास्रवाः ॥४॥ ) अनुवाद—जो कर्तव्य है, उसे (तो वह) छोड़ता है, जो अकर्तव्य है उसे करता है, ऐसे बढ़े मलवाले प्रमादियोंके आस्रव (=चित्तमल ) बढ़ते हैं । जिन्हें कायामें ( क्षणभङ्गुरता, मलिनता आदि दोष सम्बन्धी ) स्मृति तय्यार रहती है, वह अकर्त्तव्यको नहीं करते, और कर्त्तव्यके निरन्तर करनेवाले होते हैं । जो स्मृति, और सम्प्रजन्य (=सचेतपन)को रखनेवाले होते हैं, उनके आस्रव अस्त हो जाते हैं ।
- सताम् ।
२१७ ] पकिण्णकवग्गो [ १३१ जेतवन लकुण्टक भद्दिय ( थेर ) २६४-मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनिघो याति ब्राह्मणो ॥५॥ ( मातरं पितरं हत्वा राजानौ द्वौ च क्षत्रियौ । राष्ट्रं साऽनुचरं हत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः ॥५॥ ) अनुवाद—माता (=तृष्णा ), पिता (=अहंकार ), दो क्षत्रिय राजाओं [=(१) आत्मा, ब्रह्म प्रकृति आदिकी नित्यताका सिद्धान्त, (२) मरणान्त जीवन मानना या जड़वाद ], अनुचर(=राग )सहित राष्ट्र (=रूप, विज्ञान आदि संसारके उपादान पदार्थ ) को मार कर ब्राह्मण (=ज्ञानी ) निष्पाप होता है । २६५-मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्धपञ्चमं हन्त्वा अनिघो याति ब्राह्मणो ॥६॥ ( मातरं पितरं हत्वा राजानौ द्वौ च श्रोत्रियौ । व्याघ्रपंचमं हत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः ॥६॥ ) अनुवाद—माता, पिता, दो श्रोत्रिय राजाओं [=(१) नित्यतावाद, (२) जड़वाद ] और पाँचवें व्याघ्र (=पाँच ज्ञानके आवरणों )को मारकर, ब्राह्मण निष्पाप हो जाता है । राजगृह ( वेणुवन ) ( दारुसाकटिकपुत्त ) २६६-सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति ॥७॥