धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ ] धम्मपदं [ १९।११ अनुवाद—( यदि वह ) ईर्ष्यालु, मत्सरी और शठ है; तो, वक्ता होने मात्रसे, सुन्दर रूप होनेसे, आदमी साधु-रूप नहीं होता है। जिसके यह जड़मूलसे बिलकुल उच्छिन्न हो गये हैं; जो विगतदोष, मेधावी है, वही साधु-रूप कहा जाता है। जेतवन हत्थक ( भिक्षु ) २६४-न मुण्डकेन समणो अब्बतो अलिकं भणं । इच्छालाभसमापन्नो समणो किं भविस्सति ॥६॥ ( न मुंडकेन श्रमणो ऽव्रतोऽलीकं भणन् । इच्छालाभसमापन्नः श्रमणः किं भविष्यति ॥९॥ ) २६५-यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सब्बसो । समितत्ता हि पापानं समणो'ति पवुच्चति ॥१०॥ ( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूलानि सर्वशः । शमितत्वाद्वि पापानां श्रमण इत्युच्यते ॥१०॥ ) अनुवाद—जो व्रतरहित, मिथ्याभाषी है, वह मुण्डित होने मात्र से श्रमण नहीं होता । इच्छा लाभसे भरा ( पुरुष ), क्या श्रमण होगा ? जो छोटे बड़े पापोंको सर्वथा शमन करनेवाला है, पापको शमित होनेके कारण वह समण (=श्रमण ) कहा जाता है । जेतवन कोई ब्राह्मण २६६-न तेन भिक्खू [सो] होति यावता भिक्खते परे । विस्सं धम्मं समादाय भिक्खू होति न तावता ॥११॥