धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१९।१४ ] धम्मट्ठवग्गो [ १११ ( न तावता भिक्षुः [स] भवति यावता भिक्षते परान् । विश्वं धर्मं समादाय भिक्षुर्भवति न तावता ॥११॥ ) अनुवाद—दूसरोंके पास जाकर भिक्षा माँगने मात्रसे भिक्षु नहीं होता, ( जो ) सारे ( बुरे ) धर्मों (=कामों )को ग्रहण करता है ( वह ) भिक्षु नहीं होता । जेतवन कोई ब्राह्मण २६७-यो'ध पुञ्जञ्च पापञ्च बाहित्वा ब्रह्मचरियवा । सङ्ख्वाय लोके चरति स वे भिक्खू'ति वुच्चति ॥१२॥ ( य इह पुण्यं च पापं च वाहयित्वा ब्रह्मचर्यवान् । संख्याय लोके चरित स वै भिक्षुरित्युच्यते ॥१२॥ ) अनुवाद—जो यहाँ पुण्य और पापको छोड़ ब्रह्मचारी बन, ज्ञानके साथ लोकमें विचरता है, वह भिक्षु कहा जाता है । जेतवन तीर्थिक २६८-न मोनेन मुनी होति मूळ्हरूपो अविद्दसु । यो च तुलं 'व पग्गय्ह वरमादाय पण्डितो ॥१३॥ ( न मौनेन मुनिर्भवति मूढरूपोऽविद्वान् । यश्च तुलामिव प्रगृह्य वरमादाय पंडितः ॥१३॥ ) २६९-पापानि परिवज्जेति स मुनी तेन सो मुनि । यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुच्चति ॥१४॥ ( पापानि परिवर्जयति स मुनिस्तेन स मुनिः । यो मनुत उभौ लोकौ मुनिस्तेन प्रोच्यते ॥१४॥ )