धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें२२।१२ ] निरयवग्गो [ १३९ जेतवन बहुतसे भिक्षु ३१५-नगरं यथा पच्चन्तं गुत्तं सन्तरबाहिरं । एवं गोपेथ अत्तानं खणो वो मा उपच्चगा । खणातीता हि सोचन्ति निरयम्हि समप्पिता ॥१०॥ (नगरं यथा प्रत्यन्तं गुप्तं सान्तर्बाह्यम् । एवं गोपयेदात्मानं क्षणं वै मा उपातिगाः । क्षणाऽतीता हि शोचन्ति निरये समर्पिताः ॥१०॥) अनुवाद—जैसे सामान्तका नगर (=गढ़) भीतर बाहरसे खूब रक्षित होता है, इसी प्रकार अपनेको रक्षित रक्खे, क्षण भर भी न छोडे; क्षण चूक जानेपर नरकमें पडकर शोक करना पडता है। जेतवन (जैनसाधु ) ३१६-अलज्जिता ये लज्जन्ति लज्जिता ये न लज्जरे । मिच्छादिट्ठिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुग्गतिं ॥११॥ (अलज्जिता ये लज्जन्ते लज्जिता ये न लज्जन्ते । मिथ्यादृष्टि समादानाः सत्त्वागच्छन्ति दुर्गतिम् ॥११॥) अनुवाद—अलज्जान (के काम) में जो लज्जा करते हैं, और लज्जा (के काम) में जो लज्जा नहीं करते, वह झूठी धारणावाले प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं। ३१७-अभये च भयदस्सिनो भये च अभयदस्सिनो । मिच्छादिट्ठिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुग्गतिं ॥१२॥