धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ ] धम्मपद [ २४।१२ तस्मात् तृष्णां विनोदयेद् भिक्षुराकांक्षी विरागमात्मनः ॥१०॥) अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी बँधे खरगोशकी भाँति चक्कर काटते हैं; इसलिए भिक्षुको चाहिए कि वह अपने वैराग्यकी इच्छा रख, तृष्णाको दूर करे । वेणुवन विभन्तक (भिक्षु) ३४४—यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो वनमुत्तो वनमेव धावति । तं पुग्गलमेव पस्सथ मुत्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥ (यो निर्वाणार्थी वनाऽधिमुक्तो वनमुक्तो वनमेव धावति । तं पुद्गलमेव पश्यत मुक्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥) अनुवाद—जो निर्वाणकी इच्छा वाला (पुरुष) वन (=तृष्णा) से मुक्त हो, वनसे सुमुक्त हो, फिर वन (=तृष्णा) ही की ओर दौड़ता है, उस व्यक्तिको (वैसे ही) जानो जैसे कोई (बन्धन) से मुक्त (पुरुष) फिर बन्धन ही की ओर दौड़े । जेतवन बन्धनागार ३४५—न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा यदायसं दारुजं पब्बजञ्च । सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥१२॥ (न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा यद् आयसं दारुजं पार्वजं च ।