भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१५४ ] धम्मपदं [ २४।१६ ( ये रागरक्ता अनुपतन्ति स्रोतः स्वयंस्कृतं मर्कटक इव जालम् । एतदपि छित्वा व्रजन्ति धीरा अनपेक्षिणः सर्वदुःखं प्रहाय ॥१४॥) अनुवाद—जो रागमें रक्त हैं, वह जैसे मकड़ी अपने बनाये जालमें पड़ती है, (वैसे ही) अपने बनाये, स्रोतमें पड़ते हैं, धीर (पुरुष) इस (स्रोत) को भी छेद कर सारे दुःखोंको छोड़ आकांक्षा रहित हो चल देते हैं । राजगृह (वेणुवन) उग्गसेन (सेठ्ठी) ३४८-मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो मज्झे मुञ्च भवस्स पारगू । सब्बत्थ विमुत्तमानसो न पुन जातिजरं उपेहिसि ॥१५॥ (मुंच पुरो मुंच पश्चात् मध्ये मुंच भवस्य पारगः । सर्वत्र विमुक्तमानसो न पुनः जातिजरे उपैषि ॥१५॥) अनुवाद—आगे पीछे और मध्यकी (सभी वस्तुओंको) त्याग दो, (और उन्हें छोड़) भव(सागर)के पार हो जाओ; जिसका मन चारों ओरसे मुक्त हो गया, (वह) फिर जन्म और जरा को प्राप्त नहीं होता । जेतवन (चुल्ल) धनुग्गह पडित ३४९-वितक्कपमथितस्स जन्तुनो तिव्वरागास्स सुभानुपस्सिनो । भिय्यो तण्हा पवड्ढति एसो खो दळ्हं करोति बन्धनं ॥१६॥ (वितर्क-प्रमथितस्य जन्तोः तीव्ररागस्य शुभानुदर्शिनः । भूयः तृष्णा प्रवर्द्धते एष खलु दृढं करोति बन्धनम् ॥१६॥)