भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 213 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

१५६ ] धम्मपदं [ २४।२० ३५२--वीततण्हो अनादानो निरुत्तिपदकोविदो । अक्खरानं सन्निपातं जञ्ञा पुव्वापरानि च । स वे अन्तिमसारीरो महापण्णो'ति वुच्चति ॥१६॥ ( वीततृष्णोऽनादानो निरुक्तिपदकोविदो । अक्षराणां सन्निपातं जानाति पूर्वापराणि च । स वै अन्तिमशरीरो महाप्राज्ञ इत्युच्यते ॥१९॥) अनुवाद—जो तृणारहित, परिग्रहरहित, भाषा और काव्यका जान- कार है; और (जो) अक्षरोंके पहिले पीछे रखनेको जानता है, यह निश्चय ही अन्तिम शरीर वाला तथा महाप्राज्ञ कहा जाता है। वाराणसीसे गयाके रास्तेमें उपक ( आजीवक ) ३५३--सब्वाभिभू सव्वविदूहमस्मि सव्वेसु धम्मेसु अनूपलित्तो । सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं ॥२०॥ ( सर्वाभिभूः सर्वविदहमस्मि सर्वेषु धर्मेष्वनुपलिप्तः । सर्वजहः तृष्णाक्षये विमुक्तः स्वयमभिज्ञाय कमिहोद्दिशेयम् ॥ २० ॥) अनुवाद—मैं (राग आदि) सभीका परास्त करनेवाला हूँ, (दुःखोंसे मुक्ति पानेकी) सभी (बातों) का जानकार हूँ, सभी धर्मों (-पदार्थों) में अलिप्त हूँ, सर्वत्यागी, तृष्णाके नाशसे