धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७।२२ ] तण्हावग्गो [ ३५७ मुक्त हूँ, ( विमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अब ) किसको ( अपना गुरु ) बतलाऊँ ? जेतवन सक्क देवराज ३५४-सब्बदानं धम्मदानं जिनाति सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति । सब्बं रतिं धम्मरती जिनाति तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥ ( सर्वदानं धर्मदानं जयति सर्वं रसं धर्मरसो जयति । सर्वां रतिं धर्मरतिर्जयति तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥ २१ ॥ ) अनुवाद—धर्मका दान सारे दानोंसे बढ़कर है, धर्मरस सारे रसोंसे प्रबल है, धर्ममें रति सब रतियोंसे बढ़कर है, तृष्णाका विनाश सारे दुःखोंको जीत लेता है । जेतवन ( अपुत्रक श्रेष्ठी ) ३५५-हनन्ति भोगा दुम्मेधं नो चे पारगवेसिनो । भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अञ्ञे'व अत्तनं ॥२२॥ ( घ्नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः । भोगतृष्णाया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥ ) अनुवाद—( संसारको ) पार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि ( पुरुष ) को भोग नष्ट करते हैं, भोगकी तृष्णामें पड़कर (वह) दुर्बुद्धि परायेकी भाँति अपने हीको हनन करता है ।