धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[१८२ ] धम्मपदं [ २६।३०
अनुवाद—इस लोक और परलोकके विषयमें जिसकी आशायें (=चाह) नहीं रहगई हैं, जो आशारहित और आसक्तिरहित है, उसे , मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
जेतवन महामोग्गलान (थेर) ४११—यस्सालया न विज्जन्ति अञ्ञाय अकथंकथी । अमतोगधं अनुपत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२६॥ (यस्याऽऽलया न विद्यन्त आज्ञायाऽकथंकथी । अमृतावगाधमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२९॥) अनुवाद—जिसको आलय (=तृष्णा) नहीं है, जो भली प्रकार जानकर अकथ(-पद)का कहनेवाला है, जिसने गाढे अमृतको पालिया, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
श्रावस्ती (पूर्वाराम) रेवत (थेर) ४१२—यो'ध पुञ्ञञ्च पापञ्च उभो सङ्गं उपच्चगा । असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३०॥ (य इह पुण्यं च पापं चोभयोः संगं उपात्यगात् । अशोकं विरजं शुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३०॥) अनुवाद—जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनोंकी आसक्तिको छोड दिया, जो शोकरहित, निर्मल, (और) शुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।