धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६।३८ ] ब्राह्मणवग्गो [ १८५ अनुवाद-मानुष(-भोगोंके) कामोंको छोड़, दिव्य (भोगोंके) कामको भी ( जिसने ) त्याग दिया, सारे ही कामोंमें जो आसक्त नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ४१८-हित्वा रतिञ्च अरतिञ्च सीतीभूतं निरूपधिं । सब्बलोकाभिभुं वीरं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३६॥ (हित्वा रतिं चाऽरतिं च शीतीभूतं निरुपधिम् । सर्वलोकाऽभिभुवं वीरं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३६॥ ) अनुवाद-रति और अरति (=घृणा) को छोड़, जो शीतल-स्वभाव ( तथा ) क्लेशरहित है, ( जो ऐसा ) सर्वलोकविजयी, वीर है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगह (वेणुवन) वङ्गीस (थेर) ४१९-चुतिं यो वेदि सत्तानं उपपत्तिञ्च सब्बसो । असत्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३७॥ ( च्युतिं यो वेद सत्त्वानां, उपपत्तिं च सर्वशः । असक्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३७॥ ) अनुवाद-जो प्राणियोंकी च्युति (=मृत्यु) और उत्पत्तिको भली प्रकार जानता है, (जो) आसक्तिरहित सुगत (=सुंदर गतिको प्राप्त) और बुद्ध (=ज्ञानी) है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । ४२०-यस्स गतिं न जानन्ति देवा गन्धव्वमानुसा । खीणासवं अरहन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३८॥