भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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३५ ] चित्तवग्गो [ १७ द्वेष, मोह ) के फन्देसे निकलनेके लिए यह चित्त ( तडफडाता है ) । श्रावस्ती कोई ३५-दुन्निग्गहस्स लहुनो यत्थ कामनिपातिनो । चित्तस्स दमथो साधु चित्तं दन्तं सुखावहं ॥ ३॥ ( दुर्निग्रहस्य लघुनो यत्र-काम-निपातिनः । चित्तस्य दमनं साधु, चित्तं दान्तं सुखावहम् ॥ ३ ॥ ) अनुवाद—( जो ) कठिनाईसे निग्रह योग्य, शीघ्रगामी, जहाँ चाहता है वहाँ चला जानेवाला है; ( ऐसे ) चित्तका दमन करना उत्तम है; दमन किया गया चित्त सुखप्रद होता है । श्रावस्ती कोई उत्कण्ठित भिक्षु ३६-सुदुद्दसं सुनिपुणं यत्थ कामनिपातिनं । चित्तं रक्खेय्य मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं ॥४॥ ( सुदुर्दर्शं सुनिपुणं यत्र-कामनिपाति । चित्तं रक्षेत् मेधावी, चित्तं गुप्तं सुखावहम् ॥ ४ ॥ ) अनुवाद—कठिनाईसे जानने योग्य, अत्यन्त चालाक, जहाँ चाहे वहाँ ले जानेवाले चित्तकी, बुद्धिमान् रक्षा करे; सुर- क्षित चित्त सुखप्रद होता है । श्रावस्ती सङ्घरक्खित ( थेर ) ३७-दूरङ्गमं एकचरं असरीरं गुहासयं । ये चित्तं सञ्ञमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारबन्धना ॥५॥ २