धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ ] अरहन्तवग्गो [ ४५ ( पृथिवीसमो न विरुध्यते इन्द्रकीलोपमस्तादृक् सुव्रतः । ह्रद इवापेतकर्दमः संसारा न भवन्ति तादृशः ॥६॥ ) अनुवाद—वैसा सुन्दर व्रतधारी इन्द्रकीलके समान ( अचल ) तथा पृथिवीके समान जो क्षुब्ध नहीं होता; ऐसे ( पुरुष ) में कर्दमरहित सरोवरकी भाँति संसार (-मल ) नहीं रहता । जेतवन कोसम्बियासित तिस्स (थेर ) ६६—सन्तं तस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्मञ्च । सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥७॥ ( शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्म च । सम्यगाज्ञाविमुक्तस्य उपशान्तस्य तादृशः ॥ ७ ॥ ) अनुवाद—उपशान्त और यथार्थ ज्ञानद्वारा मुक्त हुये उस ( अहत् पुरुष ) का मन शान्त होता है, वाणी और कर्म शान्त होते हैं । जेतवन सारिपुत्र (थेर ) ६७—अस्सद्धो अकतञ्ञू च सन्धिच्छेदो च यो नरो । हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो ॥८॥ ( अश्रद्धोऽकृतज्ञश्च सन्धिच्छेदश्च यो नरः । हतावकाशो वान्ताशः स वै उत्तम पुरुषः ॥ ८ ॥ ) अनुवाद—जो ( मूढ-) श्रद्धारहित, अकृत (=बिना बनाये=निर्वाण )- ज्ञ, ( संसारकी ) संधिका छेदन करनेवाला, अवकाशरहित,