भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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८।१२ ] सहस्सवग्गो [ ५१ ( अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धापचायिनः । चत्तारो धर्मा वर्धन्ते आयुर्वर्णः सुखं बलम्* ॥ १० ॥ ) अनुवाद—जो अभिवादन शील है, जो सदा वृद्धोंकी सेवा करनेवाला है, उसकी चार बातें ( =धर्म ) बढ़ती हैं,—आयु, वर्ण, सुख और बल । जेतवन संकिच्च (=सांकृत्य) सामणेर ११०—यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो । एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झायिनो ॥ ११॥ ( यश्च वर्षशतं जीवेद् दुःशीलोऽसमाहितः । एकाहं जीवितं श्रेयः शीलवतो ध्यायितः ॥ ११ ॥ ) अनुवाद—दुराचारी और एकाग्रचित्तताविरहित (=असमाहित) के सौ वर्षके जीनेसे भी सदाचारी और ध्यानीका एक दिन का जीवन श्रेष्ठ है । जेतवन कोण्डन्न (थेर) १११—यो च वस्ससतं जीवे दुप्पञ्ञो असमाहितो । एकाहं जीवितं सेय्यो पञ्ञावन्तस्स झायिनो ॥ १२॥ ( यश्च वर्षशतं जीवेद् दुष्प्रज्ञोऽसमाहितः । एकाहं जीवितं श्रेयः प्रज्ञावतो ध्यायिनः ॥ १२ ॥ )

  • मनुस्मृतिमें है—"अभिवादनशीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः । चत्वारि संप्रवर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ( २।१२१ ) ।
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