धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ११ ॥५२॥ तत्कालहतच्छागस्य तन्तुना वा गुणाः शुभाः । निर्लोमतन्तुसूत्रेण कुर्याद्वा गुणमुत्तमम् ॥५३॥ पक्ववं- शत्वचः कार्यो गुणस्तु स्थावरो दृढः । पट्टसूत्रेण सन्नद्धः सर्वकर्मसहो युधि ॥५४॥ प्राप्ते भाद्रपदे मासि त्वगर्कस्य प्रशस्यते । तस्यास्तत्र गुणः कार्यो पवित्रः स्थावरो दृढः ॥५५॥गुणाः कार्याः सुमुञ्जानां भंगस्नाय्वर्कवर्मिणाम् । अब गुणों के लक्षण कहते हैं हे विश्वामित्र! अब जैसी गुण करनी चाहिये उस गुण के लक्षण कहते हैं रेशम के सूतकी गुण करनी चाहिये छोटी अंगुली के समान मोटी धनुष के प्रमाण के अनुपात से स्वच्छ साफ किये तिहरा डोरों को बांटकर चिकनी गुणा बनाई हुई युद्ध में सब कामों को सहने वाली होती है चाहे उसको कितनी ही खैंचो टूटती नहीं यदि रेशम की डोरी न मिले तो हिरन की स्नायु नाड़ियों की तांत गुण के लिये लेले वा भैंस की आंतों की तांत ले अथवा उसी समय मारे हुए बकरे की तांत की गुण श्रेष्ठ होती है, रोम रहित तांत के सूत से गुण उत्तम बनती है, अथवा पके हुए बांस की छाल की दृढ़ गुण करे रेशम के सूत से बनी हुई गुण युद्ध में सब काम देती है, भादों का महीना आने पर आक की त्वचा भी गुण का काम दे सकती है, उसका वहां तथा सूत बांटकर गुण करे और क्षत्रियों को कपास मूंज भंग नाड़ी आक आदि की बनानी चाहिये॥५०-५५॥ अथ शरलक्षणानि अतः परं प्रवक्ष्यामि शराणां लक्षणं शुभम् । स्थूलं न चापि सूक्ष्मं च नापक्वं न कुभूमिजम् ॥५६॥ अब बाणों के लक्षण कहते हैं इससे आगे बाणों के शुभ लक्षण कहते हैं, न मोटे न पतले न कच्चे और न खोटी भूमि के उत्पन्न हुए सरकंडे ग्रहण करे॥५६॥ हीनग्रंथिविदीर्णं च वर्जयेदीदृशं शरम् । पूर्णग्रंथिसुपक्वं च पाण्डुरं समयाहृतम् ॥५७॥