धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ धनुर्वेदसंहिता हीन गांठवाला कुवला हुआ हो तो ऐसा शर नहीं ले पूरी गांठवाला अच्छा पका हुआ पीले रंग का समय पर ले॥५७॥ शरवंशा गृहीतव्या शरत्काले च गाधिज ॥५८॥ हे गाधिके पुत्र विश्वामित्र! वृश्चिक राशि के सूर्य मार्गशीर्ष में शर के बांस बाण बनाने को लेनी चाहिये॥५८॥ कठिनं वर्तुलं काण्डं गृह्णीयात्सुप्रदेशजम् । द्वौ हस्तौ मुष्टिहीनौ च दैर्घ्यं स्थौल्येकनिष्ठिका॥५९॥ कैड़े गोल अच्छे देश में उत्पन्न हुए शर लेवे, एक बाण दो हाथ लंबा हो, एक मुट्ठी कम अर्थात् पांच अंगुल न्यून दो हाथ लंबा एक बाण हो और कनिष्ठा (छोटी) अंगुली सा मोटा हो॥५९॥ विधेया शरमानेषु यत्नेष्वाकर्षयेत्ततः । इतने अनुमान के बाण बनावे पीछे यंत्र अर्थात् धनुष पर चढ़ावे॥ काकहंसशशादानां मत्स्यादक्रौंचकेकिनाम् । गृध्राणां कुरराणां च पक्षा एते सुशोभनाः ॥६०॥ कौवे, हंस, शशाद, बगुले, क्रौंचपक्षी, मोर, गीध, टटीहरी इनके पर बाण के बांधने में श्रेष्ठ हैं॥६०॥ षडंगुलप्रमाणेन पक्षच्छेदं च कारयेत् । दशांगुलमिताः पक्षाः शार्ङ्गिचापस्य मार्गणे ॥६१॥ योज्या दृढाश्चतुःसंख्याः सन्नद्धाः स्नायुतन्तुभिः । छः अंगुल के मान परों को काटे और शार्ङ्गधनुष पर चढ़ाने के बाण के लिये दश २ अंगुल के पर चार २ प्रत्येक बाण के खड़े तांत के तारों से वांधे॥६१॥ जैसे :- शरश्च त्रिविधो ज्ञेयः स्त्री पुमांश्च नपुंसकः ॥६२॥ अग्रस्थूलो भवेन्नारी पश्चात्स्थूलो भवेत्पुमान् ॥ समो नपुंसको ज्ञेयस्तल्लक्ष्यार्थे प्रशस्यते ॥ दूरपातो युवत्या च पुरुषो भेदयेद्दृढम् ॥६३॥ तीन प्रकारके बाण जानने चाहिये स्त्री पुरुष और नपुंसक जो आगे से भारी हो वह स्त्री बाण कहाता है, और पीछे जो भारी हो वह पुरुष,