भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता १३ और जो एकसार हो वह नपुंसक होता है वह नपुंसक बाण केवल निशाना सीखने के लिये ही है और जो स्त्री बाण आगे से भारी होता है, वह दूर जाकर मारता है, और जो पुरुष बाण होता है, वह दृढ़ अर्थात् (मजबूत) पदार्थ को भी छेद देता है और काट देता है॥६२-६३॥ अथ फललक्षणम् आरामुखं क्षुरप्रं च गोपुच्छं चार्द्धचन्द्रकम् ॥ सूचीमुखं च भल्लं च वत्सदंतं द्विभल्लकम् ॥६४॥ कर्णिकं काकतुण्डं च तथान्यान्यप्यनेकशः । फलानि देशभेदेन भवन्ति बहुरूपतः ॥६५॥ अब फल के लक्षण यह हैं, आरीकेसा मुखवाला १ खुरपेकासा २, गऊकी पूंछ के समान आकार वाला ३, आधे चांदक आकार ४, सुईकेसे मुखवाला ५ वरछड़ी के से मुखवाला ६, बछड़े के दांत के आकार वाला ७, दोभाल वाला ८ कर्णिक फूलकी पंखडीसा ९, कौवे की चोंच के आकार वाला १० ये दश प्रकार आकार बाण के लोहे की भाल के होते हैं और भी देश भेद से अनेक प्रकार के होते हैं॥६४-६५॥ अथैतेषां कर्माणि आरामुखेन चर्मच्छेदनम् क्षुरप्रेण बाणकर्तनम् वा बाहुक- र्तनम् गोपुच्छेन लक्ष्यसाधनम् अर्धचन्द्रेण ग्रीवामस्तकध- नुरादीनां छेदनम् सूचीमुखेन कवचभेदनम् भल्लेन हृदय- भेदनम् वत्सदन्तेन गुणचर्वणम् द्विभल्लेन बाणाव- रोधनम् कर्णिकेन लोहमयबाणानां छेदनम् काकतुण्डेन वेध्यानां वेधं कुर्यात् ॥६६॥ आरामुख से ढालछेदन, क्षुरप्रसे हाथ काटना, गोपुच्छ से निशाना मारना, अर्द्धचन्द्र से माथा गरदन बाण काटना, धनुष काटना, सूचीमुख से बस्तर छेदन, भल्ल से हृदय को फोड़ना, वत्सदन्त से धनुष की गुण काटना, द्विभल्ल से बाण रोकना, कर्णिक से लोहे के बाण काटना, काकतुण्ड से वेधन के योग्यों को वेध विचार से करे॥६६॥

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