धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता १५ अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्ठविनिर्मितम् । मुखे च लोहकंटेन विद्धं त्र्यंगुलसंमितम् ॥६७॥ और गोपुच्छ बाण जानना शुद्ध काष्ठ का बना हुआ उसके मुख पर तीन अंगुल का लोह का कांटा विंधा हुआ होता है॥६७॥ बाणस्य फलकस्थाने (सेह) कंटकयोजनाद्गोपुच्छबाणो भवति । अनेन शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा कर्तव्यः ॥६८॥ बाण के फलक स्थान में (साई) का कांटा लगाकर गोपुच्छ बाण होता है, इससे निशाना और बाण फेंकने का अभ्यास करना चाहिये॥६८॥ अथ पायनम् इषुफलशरवशामूललेपनाद्व्रणोऽसाध्यो भवति । तच्चि- ह्नमेतत् । यस्मिञ्छरवंशासमूहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीतवर्णो भवति तस्य मूले विषमुत्पद्यते तन्मूलं ग्राह्यं स च सर्वदा पवनाभावेपि कम्पते इदमेव तल्लक्ष्मेति॥६९॥ अब फलों का पायन लिखते हैं, बाण के फल पर सरकण्डे की जड़ के लेप से घाव असाध्य होता है, उसकी पहिचान यह है कि, जिस झूँडे के समूह पर स्वाति की बूँद पड़ती है, वह पीले रंग का हो जाता है, उसकी जड़ में विष उत्पन्न होता है, वह जड़ लेनी चाहिये और वह सदा पवन भी न चलता हो तो भी कांपता रहता है, यही उसका चिह्न है॥६९॥ फलस्य पायनं वक्ष्ये दिव्यौषधिविलेपनैः । येन दुर्भेद्यवर्माणि भेदने तरुपर्णवत् ॥७०॥ फलों का पायन कहेंगे, दिव्य औषधियों के लेपन से जो किसी से भी न कटे, ऐसे कवचों को वृक्ष के पत्तों की तरह काट देवे॥७०॥ पिप्पली सैंधवं कुष्ठं गोमूत्रे तु सुपेषयेत् ॥ अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रतापयेत् ॥७१॥ शिखिग्रीवानुवर्णाभं तप्तपीतं तथौषधम् ।