धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ धनुर्वेदसंहिता ततस्तु विमलं तोयं पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥७२॥ पीपल, सेंधानमक, कूठ, इन तीनों को गोमूत्र में अच्छी पीसे, फिर इससे शस्त्र को लीपे पीछे उसको अग्नि में तपावे, वह मोर की गरदन के सदृश नीला हो जाय तपाने से औषधि को पी जाय पीछे स्वच्छ जल में बुझा दे॥७१-७२॥ अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां च वर्णनम् । सर्वलोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकीर्तिताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सिद्धयंति कस्यचित् ॥७३॥ अथ नाराच और नालीक और शतघ्नी का वर्णन करते हैं, जो बाण सब लोह के होते हैं वे नाराच कहे हैं, वे पांच मोटे पर बांधने से किसी को सिद्ध होते हैं॥७३॥ नालीका लघवो बाणा नलयंत्रेण नोदिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते मताः ॥७४॥ जो कि नलयंत्र से फेंके जाते हैं, छोटे छोटे बाण कहाते हैं उनका नाम नालीक है अर्थात् गोली का नाम नालीक बाण हैं, और नलयंत्र नाम बन्दूक का है, सो बहुत ऊंचे और दूर फेंकने में तथा गढ़युद्ध में काम आते हैं ॥७४॥ सिंहासनस्य रक्षार्थं शतघ्नीः स्थापयेद्गढे । रंजकं बहुलं तत्र स्थाप्यं च बहु धीमता ॥७५॥ तख्तकी रक्षा के लिये गढ़ में तोपें स्थापन करे और बहुत सी बारूद और गोले गोली भी स्थापन करे॥७५॥ अथ स्थानमुष्टचाकर्षणलक्षणम् स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नकर्मणाम् । मुष्टयः पंच समाख्याता व्यायाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥७६॥ इनके अनन्तर स्थान मुष्टि आकर्षण के लक्षण कहते हैं, अलग अलग काम में बाण प्रयोग करने के लिये स्थान आठ प्रकारके करने और पांच प्रकार की मुट्टी कही है, तथा पांच प्रकार के व्याय कहे हैं॥७६॥