धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता १७ अग्रतो वामपादश्च दक्षिणे चानुकुञ्चितम् । प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तद्वयसविस्तरम् ॥७७॥ बायां पैर आगे और दाहिना पीछे सुकड़ा हुआ यह दो हाथ की प्रत्यालीढ गति कहाती है॥७७॥ आलीढे तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चितम् । दक्षिणन्तु पुरस्ताद्वा दूरपाते विशिष्यते ॥७८॥ आलीढ गति में धनुषधारी को बायां पैर सकोड़ना, और दाहिना आगे कर बाण फेंके तो बाण दूर जाय॥७८॥ पादौ सविस्तरौ कार्यों समौ हस्तप्रमाणतः । विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥७९॥ एक हाथ के प्रमाण से पैरों को विस्तार के साथ करे, उसका नाम विशाख गति है, कूटलक्ष्य के वेधने में इसका उपयोग होता है॥७९॥ समपादैः समौ पादौ निष्कम्पौ च सुसंगतौ । असमे च पुरो वामे हस्तमात्रनतं वपुः ॥८०॥ समपादों से बराबर दोनों पैर बिना ही लिये खड़ा हो बाण फेंके, और असमगति में आगे बायां पैर एक हाथ आगे रहे और शरीर झुका हुआ॥८०॥ आकुञ्चितोरुद्वौ यत्र जानुभ्यां धरणीं गतौ । दर्दुरक्रममित्याहुः स्थानकं दृढभेदने ॥८१॥ जहां दोनों ऊरू सिकोड़ कर जानुओं को धरती पर टेके, वह दर्दुरक्रम कहा है। दृढ़स्थान को भेद करने के लिये॥८१॥ सव्यं जानु गतं भूमौ दक्षिणं च सुकुञ्चितम् । अग्रतो यत्र दातव्यं तं विद्याद्गरुडक्रमम् ॥८२॥ बायां तो पृथिवी पर हो और दंहिना सुकड़ा हुआ हो, आगे से जो दे उसको गरुड़क्रम जानना॥८२॥ पद्मासनं प्रसिद्धन्तु उपविश्य यथाक्रमम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानकं शुभलक्षणम् ॥८३॥ पद्मासन प्रसिद्ध है, इसका जैसा क्रम है वैसे बैठकर बाण मारे, ३