धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ धनुर्वेदसंहिता धनुषधारी को जानना चाहिये, यह शुभलक्षण वाला स्थानक है॥८३॥ अथ गुणमुष्टयः पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथाक्रमम् ॥८४॥ अब गुणकी मुष्टि कहते हैं, पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी ये पांच प्रकार गुण के हैं॥८४॥ दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रितोऽङ्गुष्ठमूलकम् । पताका सा च विज्ञेया नलिकादूरमोक्षणे ॥८५॥ जहां तर्जनी दीर्घ की जाय और अँगुठे को जड़ के पास हो, वह पताका जाननी, यह नलिका नाम वाण जिसमें रंजक और लोहकण भरे हों, उसके छोड़ने के लिये है॥८५॥ तर्जनीमध्यमामध्यमंगुष्ठो विशते यदि । वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थले नाराचमोक्षणे ॥८६॥ तर्जनी और मध्यमा के बीच में यदि अँगूठा प्रवेश हो, वह वज्रमुष्टि जाननी, मोटा लोह का वाण छोड़ने के लिये इसका उपयोग करना॥८६॥ अंगुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं सुसंस्थितम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥८७॥ अँगूठे के बीच में तर्जनी का अग्र रखे, वह सिंहकर्ण जानना, दृढ़ लक्ष्य के वेधने में उपयोगी है॥८७॥ अंगुष्ठनखमूले तु तर्जन्यग्रं च संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥८८॥ अँगूठे के नख की जड़ में तर्जनी का अग्रभाग धरे; वह मत्सरी जाननी, चित्रकारी के निशाने के वेधने में यह उपयोगी है॥८८॥