भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता १९ अँगुष्ठाग्रे तु तर्जन्या मुखं यत्र निवेशितम् । काकतुण्डं च सा ज्ञेया सूक्ष्मलक्ष्ये सुयोजिता ॥८९॥ जहां तर्जनी का मुख अँगूठे के आगे निवेशित किया हो वह काकतुण्डी जानना, सूक्ष्म लक्ष्य में यह मुद्रा करनी॥८९॥ अथ धनुर्मुष्टिसंधानम् संधानं त्रिविधं प्रोक्तमध ऊर्ध्वं समं सदा । योजयेत्त्रिप्रकारं हि कार्येष्वपि यथाक्रमम् ॥९०॥ अब धनुष की मुष्टिका प्रकार कहते हैं, संधान तीन प्रकार का कहा है, अधःसन्धान १ ऊर्ध्वसन्धान २ और समसन्धान ३ ।। ऊपर १ नीचे २ बराबर ३ इनको जैसा कार्य हो उसमें यथाक्रम से ३ तीन प्रकार से योजना करै॥९०॥ अधश्च दूरपातित्वे समे लक्ष्ये सुनिश्चले । दृढास्फोटं प्रकुर्वीत ऊर्ध्वसंधानयोगतः ॥९१॥ दूर बाण फेंकने को अधःसन्धान करना जो अचल वस्तु हो उस पर समसन्धान करना और वस्तु को तोड़ने के लिये ऊर्ध्वसंधान करना॥९१॥ अथ व्यायाः कैशिकः केशमूले वै शरभृंगे च सात्विकः । श्रवणे वत्सकर्णश्च ग्रीवायां भरतो भवेत् ॥९२॥ अंस्के स्कंधनामा च व्यायाः पंच प्रकीर्तिताः ॥ केशों की जड़ में कैशिक और सात्विक शर श्रृंगतक और वत्सकर्ण कानतक, ग्रीवातक भरत और स्कन्धनाम व्याय कंधे तक, ये पांच व्याय अर्थात् बाण के खैंचने के प्रकार कहे हैं॥९२॥ कैशिकश्चित्रयुद्धेषु ह्यधोलक्ष्येपु सात्विकः । वत्सकर्णः सदा ज्ञेयो भरतो गूढभेदने ॥९३॥ दृढभेदे च दूरे च स्कंधनामानमुद्दिशेत् ॥